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क्या ये आदमी वामपंथ का 'केजरीवाल' बनना चाहता है?

ऋषभ
ऋषभ

ये ऋषभ श्रीवास्तव हैं. दी लल्लनटॉप के नए साथी. खूब पढ़ते हैं. खूब लिखते हैं. नॉलेज वाला हिस्सा ऋषभ का अच्छा-खासा भरा हुआ है. और ये लगातार उसे भर ही रहे हैं. साथ ही लिख भी रहे हैं. केरल में आई नई लेफ्ट सरकार के नए रंग-ढंग को इतिहास के आइने में अौर भविष्य की उम्मीदों के बीच परख रहे हैं. पढ़ें.

कल के अंग्रेजी अखबारों में पूरे पहले पेज पर एक विज्ञापन छपा. राजनैतिक विज्ञापन, नई सरकार का विज्ञापन, कवर पर नवनियुक्त मुख्यमंत्री की तस्वीर. ये पहली बार नहीं हुआ था. मोदी सरकार अौर केजरीवाल सरकार के चुनावी अभियान ऐसे विज्ञापनों से फले फूले हैं. लेकिन पहली बार ये हुआ कि  कॉर्पोरेट स्टाइल में ऐसा विज्ञापन कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार द्वारा छपवाया गया था.

केरल के नए मुख्यमंत्री पिन्नाराई विजयन आंखों में आशाएं और चेहरे पर मुस्कान लेकर कसमें खा रहे थे.

विज्ञापन में चार बातें दिखीं –

1.

मोटे अक्षरों में सबसे ऊपर लिखा हुआ ‘कमिटेड टू टर्न केरल इन टू ए ट्रूली गॉड’स अोन कंट्री’.

याने, एक कम्युनिस्ट सरकार भगवान का सहारा ले रही है, बातों में ही सही.

2.

’25 लाख नई नौकरियों का वादा’

सिंगुर, नंदीग्राम और लालगढ़ के बाद?

3. 

‘दि पिन्नाराई विजयन गवर्नमेंट इज कमिटेड टू कीप इट्स प्रॉमिसेज’

इसे पढ़कर मोदी सरकार और केजरीवाल सरकार के बाद उसी क्रम में लगती है विजयन सरकार.

4.

सबसे नीचे लिखा है छोटे छोटे अक्षरों में ‘गवर्नमेंट ऑफ़ केरल – पब्लिक रिलेशंस डिपार्टमेंट’

सवाल पूछा जाएगा कि सर्वशक्तिमान ‘पोलित ब्यूरो’ कहां है? वो पोलित ब्यूरो जिसने अच्युतानंदन को जनता के समर्थन के बावजूद मुख्यमंत्री पद से च्युत किया.

 

***

भारत में कम्युनिस्ट

1957 में केरल में दुनिया की पहली चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार बनी. जिसे महान लोकतांत्रिक नेता श्री जवाहरलाल नेहरु ने स्वतंत्र भारत में पहली बार, और पहली ही बार बेजा तरीके से धारा 356 का इस्तेमाल करते हुए 1959 में बर्खास्त कर दिया. इसके बाद कम्युनिस्ट पार्टी बंगाल में उलझ गयी. जहां पर इससे टूट के बने नक्सल आन्दोलन ने इसे काफी क्षति पहुंचाई. ये पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहुंच पक्की नहीं कर सकी. हालांकि राजनीति में इनके विचार गूंजते रहे.

साल 2004 लेफ़्ट के लिए ऐतिहासिक चुनाव था. लोकसभा में कम्युनिस्ट पार्टी के पास अब तक की सर्वाधिक 60 सीटें थीं. तुलना करें, 2014 में बनी लोकसभा में 9 सीटें हैं.

बंगाल और केरल में कम्युनिस्ट सरकारें थीं. पर बंगाल में दो बार लेफ़्ट को तृणमूल कांग्रेस ने पटखनी दे दी. इस बार के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस घोटालों, गुंडई इत्यादि में फंसने के बावजूद भारी बहुमत से जीत के आई है. पर केरल में कम्युनिस्ट पार्टी जीती है. और इसे लेफ्ट पॉलिटिक्स के लिए एक लाइफलाइन माना जा रहा है.

यही नहीं, कम्युनिस्ट पार्टी जो कि 1925-30 में फैक्ट्री वर्कर और मजदूरों के सहयोग से बनी थी अब वर्किंग क्लास के सपोर्ट के मामले में तीसरे नंबर पर है. बीजेपी की भारत मजदूर संघ और कांग्रेस की इंटक पहले और दूसरे नंबर पर हैं. वहीं जेएनयू में ‘भारत विरोधी’ नारों को लेकर लेफ्ट की विचारधारा पर ही सवाल खड़े कर दिए गए हैं.

फिर आम आदमी पार्टी की कार्यशैली ने लेफ्ट की खाली हुए जगह को भरना शुरू कर दिया है. गरीबों और मजदूरों का मसीहा बनने के अलावा उन्होंने भगवान को भी लेफ्ट की तरह नकारा नहीं है. वो भगवान का धन्यवाद करना नहीं भूलते. कम्युनिस्ट विचारधारा में धर्म को ‘जनता की अफीम’ कहा जाता है. लेकिन लेफ्ट भी यह समझता है कि भारतीय राजनीति में भगवान और धर्म सदा से एक निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं.

ये जरूर है कि केरल में पिछली कम्युनिस्ट सरकारों ने सफलतापूर्वक काम किया है. पर केरल के लोग सबसे ज्यादा खाड़ी देशों में काम करते हैं. अगर वहां हर देश में सऊदी अरब के ‘निताक़त’ (लोकल लोगों को पहले रोजगार से जुड़ा) जैसा कानून आता है तो केरल शायद ही इसके लिए तैयार है.

***

क्या ऐसा कह सकते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी इन कमजोरियों को समझा है और उसी के अनुसार काम करने का मन बनाया है? ऐसा लगता है कि पार्टी ने इस विज्ञापन के जरिये ऐलान किया है कि अब वो हर नई चीज को रिजेक्ट करने के बजाय उसे अपनाकर आगे बढ़ेंगे. अौर इसे बड़े परिवेश में रखकर देखें तो भारतीय राजनीति के लिए अच्छा संकेत माना जाना चाहिए. हमारे संविधान में लेफ्ट पॉलिटिक्स के आदर्शवाद को पूरी जगह मिली है. अगर कम्युनिस्ट पार्टी अपने आदर्शवाद को ध्यान में रखते हुए नई चीजों को अपनाती है तो भारतीय राजनीति में एक नई बहस का सूत्रपात होगा.

केरल में लेफ्ट का यह नया चेहरा खुद लेफ़्ट के भीतर हो रहे परिवर्तनों का चेहरा है. प्रभात पटनायक जैसे वामपंथी विचारक भी भारतीय लेफ़्ट की राजनीति में इन्नोवेशन की ज़रूरत को रेखांकित कर रहे हैं. जिन तीन मुद्दों पर लेफ्ट को समर्थकों के भीतर ही बीते वर्षों में कोसा गया, उन्हें पटनायक ने फिर से रेखांकित किया है.

ये मुद्दे थे कम्युनिस्ट पार्टियों का इमरजेंसी को समर्थन, नब्बे के दशक में पार्टी (सीपीएम) का ज्योति बासु को देश का प्रधानमंत्री बनने से रोकना, अौर यूपीए सरकार से न्यूक्लियर डील पर समर्थन वापस लेना. ‘दि हिन्दू’ में अपने आलेख में पटनायक लिखते हैं कि हालांकि इन मुद्दों पर लेफ़्ट के अपने तर्क हैं, लेकिन यह सही बात है कि भारतीय कम्युनिस्टों ने पूंजीवादी वैश्वीकरण अौर उससे जुड़ी नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ़ कोई वैकल्पिक वैकासिक रणनीति नहीं तैयार की. यही उसके पतन का सबसे बड़ा कारण बनी है.

पिन्नाराई विजयन की नई रणनीति की आलोचना हो सकती है, हो रही है. लेकिन स्पष्ट है कि इसी आलोचना में कई लेफ़्ट समर्थक वैकल्पिक लड़ाई का नया मसौदा भी देख रहे हैं.

***

लेफ्ट और राइट

अभी तक की बहसों में लेफ्ट और राइट को महान दार्शनिक मोहनीश बहल के सार्वभौमिक सिद्धांत ‘एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते’ के अनुसार पारिभाषित किया जाता था. लम्बे समय तक लेफ्ट को सिर्फ गरीबों का और राइट को सिर्फ अमीरों का प्रतिनिधि माना जाता था. लेकिन आज जनता की समस्याअों को इस तरह के एकायामी लेंस से नहीं सुलझाया जा सकता.

अगर आप हमारे मोहल्ले के बरमेसर काका से पूछेंगे लेफ्ट-राईट के बारे में तो वो खैनी चबाते बोलेंगे, ‘भईया, इधर देखो. प्रैक्टिकली समझाता हूं. अगर तोहार बिजली बिल कम आता है तो इसके दो कारण हो सकते हैं… 

  • तोहरे मोहल्ले में बिजली के पोल हैं ही नहीं.

  • बिजली एतनी महंगी है कि आप पोल देखकर ही संतोष कर लेते हो.

पहला केस लेफ्ट पॉलिटिक्स है और दूसरा केस राइट पॉलिटिक्स. लेकिन जनता ये ‘लेफ्ट-राइट’ नहीं समझती. वो परेशानी का हल चाहती है अौर ऐसा हल चाहती है जो बाद में खुद ज़्यादा बड़ी समस्या ना बन जाए.

गौर से देखें तो जनता की समस्याअों का हल इन दोनों के बीच में कहीं है. विश्व भर में लेफ्ट के साथ एकाधिकारवादी लक्षण जोड़े जाते हैं.

लेकिन भारतीय लेफ़्ट लोकतांत्रिक व्यवस्था में रचा-बसा लेफ्ट है. यह इसकी कमजोरी नहीं, इसकी ताकत है. यही लोकतांत्रिक गुण इसे मौके अौर परिस्थिति के अनुसार बदलाव अौर नई रणनीतियों के खिलाफ़ खड़े होने में सक्षम बनाते हैं.

इस रौशनी में विजयन की नई पहल को भी सकारात्मक तरीके से देखा जा सकता है, कि वो वैचारिक विरोधी को भी साथ लेकर चल रहे हैं. लेकिन पिन्नाराई विजयन को यह समझना होगा कि जनता उनमें ‘दूसरा केजरीवाल’ नहीं चाहती. लेफ़्ट की मौलिकता भी उनकी ताकत है, अौर भारतीय राजनीति में उनके बचे रहने के, उनकी उपयोगिता का तर्क है. उन्हें चुनावी राजनीति में जीतने के लिए किसी अन्य की प्रतिलिपि होने की ज़रूरत नहीं. ये कितना घातक कदम हो सकता है. यह सबक लेफ़्ट को हिन्दीपट्टी में अपनी अदृश्य उपस्थिति से सीखना चाहिए.

और हां. चलते चलते इस तस्वीर पर भी नजर डाल लीजिए. एक प्रतिबद्ध वामपंथी कार्यकर्ता ने अपनी फेसबुक वॉल पर चिपकाई है. जनकवि गोरख की कविता समेत. ये बहुत कुछ कह देती है. कि बदलते चमकीले झकाझक लाल ने नई राह में किन साथियों को बिसार दिया. ताकि फिर कोई प्रसेनजीत बोस सवाल न उठाए. आलाकमान पर. आलाकमान बहुत जाना पहचाना लगता है न. हंसिया हथौड़ा वालों को ये नई कमान मुबारक.

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