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प्राइवेट कॉलेजों में मेडिकल की फीस घटने वाली है?

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मेडिकल की पढ़ाई. यानी डॉक्टर बनाने वाला कोर्स. डॉक्टर कि जिन्हें भगवान का दर्जा मिला हुआ है. ये पढ़ाई देश में सबसे महंगे कोर्सेस में से एक है.

मगर केंद्र सरकार का नया फैसला मेडिकल की पढ़ाई को सस्ता और आसान कर सकता है. अगर स्वास्थ्य मंत्रालय, बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स की रिपोर्ट को हरी झंडी दिखा दे, तो इस पढ़ाई के लिए लगने वाली फीस 90 प्रतिशत तक घट सकती है.

2018 में राष्ट्रपति ने मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया को भंग कर दिया था. उसके स्थान पर बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स को लाया गया था. जब तक मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया की जगह कोई नई संस्था नहीं आ जाती, ये बोर्ड ही देश में मेडिकल एजुकेशन से जुड़े मुद्दों पर काम करेगा. बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स ने रिकमेंड किया है कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में MBBS की फीस 8 लाख से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. ये फीस प्राइवेट कॉलेजों की 50 पर्सेंट सीटों पर लागू होगी.

6 नवंबर 2019 को हेल्थ मिनिस्ट्री ने मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया के बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स को निर्देश दिया. निर्देश कुछ ऐसा था, प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई की फीस को रेगुलेट किया जाए. सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों की फीस में बहुत ज्यादा असंतुलन न हो. मेडिकल की पढ़ाई सबकी पहुंच में हो, प्रतिभाशाली स्टूडेंट्स पैसों की कमी की वजह से शिक्षा के बुनियादी अधिकार से वंचित न रह जाएं. सरकार ने इसके लिए रास्ता निकालने की कोशिश की है.

National Medical Commission Bill
नेशनल मेडिकल कमीशन बिल का खूब विरोध हुआ था. (फोटो : पीटीआई)

ये निर्देश मिलने के बाद बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स ने क्या किया. उन्होंने कई पॉइंट्स पर बात की. सबसे खास पॉइंट ये था कि सरकारी कॉलेज और प्राइवेट कॉलेज में मेडिकल की फीस में कितना अंतर है? फिलहाल, प्राइवेट कॉलेजों में MBBS की पढ़ाई के लिए 30 लाख से 1.2 करोड़ तक की फीस ली जाती है. जबकि MS (मास्टर ऑफ़ साइंस) और MD (Doctorate of Medicine) के लिए 1 से 3 करोड़ रुपये तक की सालाना फीस ली जाती है.

सरकारी कॉलेजों की बात करें तो. एम्स यानी कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, देश के टॉपमटॉप मेडिकल कॉलेजों में से एक है. यहां MBBS की फीस लगभग 10 लाख रुपये सालाना है. आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल कॉलेज में इसी कोर्स की सालाना फीस 6 लाख रुपये है. सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पूरे कोर्स की फीस 5 लाख रुपये के अंदर होती है. इन कॉलेजों में फीस इतनी कम इसलिए होती है क्योंकि इनमें केंद्र और राज्य सरकारें भारी मात्रा में सब्सिडी देती है.

8 अगस्त को संसद के पिछले सेशन में सरकार ने नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल को पास करवाया था. नेशनल मेडिकल कमीशन नाम की  संस्था मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया की जगह लेगी. 1956 के इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट में फीस के रेगुलेशन को लेकर कोई ज़िक्र ही नहीं था.

2019 के नेशनल मेडिकल कमीशन एक्ट में ये बात गंभीरता से दर्ज की गई थी. इस एक्ट का 10वां सेक्शन नेशनल मेडिकल कमीशन को अधिकार देता है. प्राइवेट मेडिकल कॉलेज और डीम्ड यूनिवर्सिटीज की 50 पर्सेंट सीटों की फीस और दूसरे चार्जेज को निर्धारित करने का.

नेशनल मेडिकल कमीशन अगले साल फरवरी-मार्च तक काम करना शुरू कर देगा. कमीशन के शुरू होते ही फीस वाला मामला सुलटा लिए जाने की उम्मीद है.


वीडियो : नेशनल मेडिकल बिल कमीशन 2019 में ऐसा क्या है जिसके विरोध में इतने डॉक्टर्स आ गए हैं

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