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शहीद होने वाले दिन मेजर केतन शर्मा ने परिवार को वॉट्सऐप किया - मेरी आखिरी तस्वीर

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17 जून, 2019. सोमवार का दिन. सुबह के सात बजे थे. मेजर केतन शर्मा ने अपने परिवार वाले वॉट्सऐप ग्रुप पर अपनी एक तस्वीर भेजी. साथ में मेसेज लिखा-

शायद ये मेरी आखिरी तस्वीर है.

कुछ घंटों बाद मेजर शर्मा नहीं रहे.

मेजर शर्मा 19 राष्ट्रीय रायफल्स का हिस्सा थे. 17 जून को अछाबल के बडूरा गांव में सेना ने एक जॉइंट ऑपरेशन चलाया. इसी के दौरान एक आतंकी की गोली मेजर को लगी. उन्हें बचाया नहीं जा सका. वॉट्सऐप पर लिखी उनकी वो आखिरी तस्वीर वाली बात सच हो गई. इंडियन एक्सप्रेस में सौम्या लखानी की रिपोर्ट छपी है.

मेजर केतन शर्मा मेरठ के रहने वाले थे. उनका घर छावनी इलाके में है. छुट्टियों में घर आए हुए थे. लगभग एक महीना यहां रहे. फिर 22 दिन पहले वो कश्मीर के लिए रवाना हो गए. 18 जून को दोपहर बाद मेजर शर्मा का शव यहां लाया गया. उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने कई लोग आए. जब मेजर की अंतिम यात्रा श्मशान की तरफ जा रही थी, तो रास्ते में जैसे सब रुक गया. सैकड़ों अनजान लोग कारवां के साथ हो लिए. उनकी मां ऊषा रोती हुई कह रही थीं-

मेरा शेर पुत्त गोलियों ते नहीं डरदा सी. कहां चला गया वो? मुझे बस इतना बता दो कि मेरा रानू (मेजर का घर में पुकारने का नाम) किस वक़्त लौटकर आएगा. मैं हाथ जोड़ती हूं मुझे मेरा बेटा लौटा दो.

मेजर शर्मा के परिवार में उनके पीछे उनकी मां ऊषा, पिता रविंदर, पत्नी इरा मंदर, चार साल की बेटी कायरा और छोटी बहन मेघा हैं. मेजर के चचेरे भाई अनिल ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया-

जब उसने वो आखिरी तस्वीर वाला मेसेज वॉट्सऐप पर भेजा, तो उसकी पत्नी ने तुरंत वहां जवाब दिया. उसके साले ने भी वहां लिखा. इस उम्मीद में कि वो सही-सलामत लौट आएगा. मगर केतन ने जवाब नहीं दिया. इरा और कायरा उस समय गाजियाबाद में थे. वहां इरा के माता-पिता रहते हैं. वहीं पर उन्हें खबर मिली कि केतन जख़्मी हो गया है. ये दोपहर दो बजे की बात होगी. साढ़े तीन बजते-बजते सेना के अधिकारी घर आए. हमें बताया गया कि केतन नहीं रहा.

मेजर के पिता रविंदर मोदीनगर के एक कारखाने में काम करते थे. अब रिटायर हो चुके हैं. बेटे की मौत पर कह रहे थे-

वो रोजाना हमें फोन करता था. उसकी मां की तबीयत ठीक नहीं थी, तो वो हमेशा मुझसे उनका खयाल रखने को कहता.

मेजर केतन शर्मा के परिवार ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि जब मेजर बीसेक साल के थे, तब गुड़गांव में उन्हें एक प्राइवेट सेक्टर की नौकरी मिल गई थी. बहुत अच्छा वेतन भी था. मगर उन्होंने वो नौकरी छोड़ दी और सेना में भर्ती होने की तैयारी में जुट गए. उनके एक रिश्ते के भाई निर्मल ने बताया-

उसके एक चाचा सेना से रिटायर हुए थे. और वो मेरठ के केंट इलाके में बड़ा हुआ. उसका हमेशा से सेना और सुरक्षा बलों के लिए थोड़ा झुकाव था. उसने NDA की परीक्षा भी दी कुछ बार, मगर पास नहीं हुआ. बाद में उसने कंबाइन्ड डिफेंस सर्विसेज़ एक्ज़ाम दिया और 2012 में लेफ्टिनेंट बन गया. उसके ही कुछ वक़्त बाद इरा से उसकी शादी हो गई. आखिरी बार जब मेरी उससे बात हुई थी, तो उसने मुझे कश्मीर बुलाया था. कहा, अमरनाथ यात्रा में आ जाओ. कि ये बिल्कुल सुरक्षित है. सेना लोगों को सुरक्षित रखेगी.

परिवार में हर किसी के पास अपनी-अपनी यादें हैं. कुछ साझा, कुछ निजी. मेजर शर्मा की बहन मेघा कहती हैं-

वो चौक देखिए. धूप का चश्मा लगाए उनकी एक तस्वीर वहां लगी है. वो एवन बेकर्स, हम यहां साथ आते थे. मुझे यकीन नहीं हो रहा कि भाई नहीं रहे. हमारे साथ ऐसा हो गया, मुझे एतबार नहीं हो रहा.


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