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जिस फ़ैक्टरी से निकली गैस ने तबाही मचाई, उसे क्लीयरेंस ही नहीं मिला था!

आंध्र प्रदेश में मौजूद LG पॉलीमर्स से हुए गैस रिसाव में 11 लोगों की जान चली गयी, जबकि 200 से ज़्यादा लोग घायल हैं. LG पॉलीमर्स के बारे में एक बड़ी खाबर सामने आ रही है. ख़बर ये कि LG पॉलीमर्स के पास प्लांट चलाने के लिए पर्यावरण का क्लीयरेंस नहीं था. पिछले साल 10 मई को LG पॉलीमर्स ने स्टेट लेवल इन्वायरॉन्मेंट इम्पैक्ट अथॉरिटी (SEIAA) को दिए अपने हलफ़नामे में LG पॉलीमर्स ने इस बात को स्वीकार किया था. 

इंडियन एक्सप्रेस ने इस बाबत ख़बर छापी है. कहा है कि 1997 से लेकर 2019 तक के दरम्यान कम्पनी के पास पर्यावरण के स्तर पर फ़ैक्टरी चलाने के लिए अनुमति नहीं थी. बताते चलें कि ये अनुमति या क्लीयरेंस हर छोटी-बड़ी फ़ैक्टरी को राज्य सरकार की संस्थाओं से लेनी होती है. अख़बार ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि कम्पनी ने बिना क्लीयरेंस मिले ही अपने प्रोडक्शन की क्षमता बढ़ा दी थी. अपने हलफ़नामे में कम्पनी ने इस बात का भी ज़िक्र किया था कि वो आगे से ऐसी ग़लती नहीं करेगी.

LG पॉलीमर्स ने Mcdowell and company से ये प्लांट 1997 में ख़रीदा था. मई 2019 में कम्पनी ने पर्यावरण क्लीयरेंस के लिए आंध्र प्रदेश सरकार के पास प्रस्ताव भेजा. मौक़ा था प्रोडक्शन बढ़ाने का बहाना ढूँढने का. स्टायरीन से जुड़े प्रोडक्ट बनाने वाला ये प्लांट 415 टन प्रतिदिन निर्माण करता था. लक्ष्य था 655 टन प्रतिदिन निर्माण करने का.  तो मई 2019 में LG पॉलीमर्स ने अपने यूनिट बढ़ाने का प्रस्ताव राज्य सरकार के पास भेजा था. यूनिट को विस्तार देने की अंतिम अनुमति केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से मिलती है. तो राज्य सरकार के SEIAA से ये प्रस्ताव गया केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास. वहां कुछ दिनों तक मामला लम्बित रहा. आख़िर में नवम्बर 2019 में कम्पनी का प्रस्ताव ये बोलकर ख़ारिज कर दिया गया कि कम्पनी की रुचि विस्तार के प्रोजेक्ट में नहीं है. 

एक और बात है. 1997 में तो LG पॉलीमर्स ने ख़रीदा. उसके पहले 1982 से इसे चला रही Mcdowell and company ने कुछ रिस्क देखे थे. फ़ैक्टरी के आसपास बहुत सारी आम रिहाईश थी. लोगों के घर थे. तभी Mcdowell ने ये निर्णय लिया कि प्लांट में स्टायरीन के प्रोडक्ट और अल्कोहल से जुड़ी चीज़ें नहीं बनाई जायेंगी. 

लेकिन LG पॉलीमर्स ने 1997 में इस प्लांट को लिया. और निर्णय लिया कि स्टायरीन के प्रॉडक्ट्स का निर्माण बदस्तूर जारी रहेगा. 

जबकि नियम क़ानून भी कहते हैं कि स्टायरीन एक ख़तरनाक और ज़हरीला रसायन है. ख़तरनाक रसायन के रखरखाव, प्रोडक्शन और ट्रांसपोर्ट से जुड़ी 1989 में आयी नियमावली ही ये कहती है. ये भी कहा गया है कि स्टायरीन को 17 डिग्री से नीचे के तापमान में रखना चाहिए. लेकिन मई 2019 में दिए अपने हलफ़नामे में कम्पनी ने इस बात को नहीं माना है. कहा है कि स्टायरीन बच्चों, बूढ़ों, महिलाओं के स्वास्थ्य पर कुछ ख़ास असर नहीं डालेगा. अलबत्ता LG पॉलीमर्स अपनी यूनिट के विस्तार के कार्य में आसपास के गांवों में मौजूद लोगों को लगाना चाहती थी. दलील ये कि ऐसे में मज़दूरों को रहने की जगह मुहैया कराने की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी. 

लेकिन इन्हीं गांवों में 11 लोगों की जान जा चुकी है. 200 से ज़्यादा लोग घायल हैं. और हमारे सवाल हैं. सवाल LG को भेजे लम्बा वक़्त हो चुका है. लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं.


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