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CBI का वो ऑफिसर, जिसने भगोड़े कारोबारी विजय माल्या के सारे पैंतरे फेल कर दिए

शराब कारोबारी विजय माल्या को भारत लाए जाने की उम्मीदें एक बार फिर जगी हैं. ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट से 14 मई को माल्या को उस समय झटका लगा, जब कोर्ट ने प्रत्यर्पण के खिलाफ अपील की अनुमति मांगने का उसका आवेदन खारिज कर दिया. माल्या के प्रत्यर्पण की प्रक्रिया 28 दिन में पूरी करनी होगी. प्रत्यर्पण का यह मामला IDBI बैंक के 900 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी से जुड़ा है.

माल्या के खिलाफ 9,000 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी के मामले की भी जांच चल रही है. भारतीय स्टेट बैंक की अगुवाई में 17 बैंकों ने 2005 से 2010 के दौरान माल्या को किंगफिशर एयरलाइंस के कारोबार के लिए बिजनेस लोन दिए. माल्या को कर्ज देने वालों में एसबीआई के अलावा पंजाब नेशनल बैंक और आईडीबीआई बैंक भी हैं.

लंदन में मिली कामयाबी के पीछे कौन है?

विजय माल्या के भारत लाए जाने के मामले में लंदन में मिली इस कामयाबी के पीछे सीबीआई के एक अधिकारी का नाम सामने आ रहा है. सुमन कुमार. पीटीआई की खबर के मुताबिक, सीबीआई के अधिकारी सुमन कुमार की चुनौतीपूर्ण और सावधानीपूर्वक जांच के साथ ही लंदन की उनकी यात्राएं तीन साल बाद रंग ले आई हैं. सुमन कुमार को अक्टूबर, 2015 में मुंबई के बैंकिंग धोखाधड़ी और प्रतिभूति प्रकोष्ठ के डीएसपी के तौर पर माल्या के खिलाफ मामले की जांच का जिम्मा सौंपा गया था. कुमार सीबीआई में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक हैं.

माल्या के खिलाफ 9,000 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी के मामले की भी जांच चल रही है. (फोटो: रॉयटर्स)
माल्या के खिलाफ 9,000 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी के मामले की भी जांच चल रही है. (फोटो: रॉयटर्स)

पीटीआई की खबर के मुताबिक, गंभीर आरोपों के बावजूद कर्ज देने वाले बैंकों ने माल्या के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज नहीं कराया. इससे सीबीआई के लिए मुश्किल खड़ी हो गई. हालांकि एजेंसी ने अपने सूत्रों पर आधारित जानकारी का इस्तेमाल किया और माल्या के खिलाफ 900 करोड़ रुपये की कथित कर्ज धोखाधड़ी मामले में केस दर्ज कर जांच शुरू की. सुमन कुमार को इस मामले की जांच सौंपी गई.

मुश्किल कानूनी लड़ाई लड़ने में मदद की

माल्या 2016 में देश से भाग गया. उसे वापस इंडिया लाने के लिए सीबीआई को ब्रिटेन की अदालत में मुश्किल कानूनी लड़ाई लड़नी थी. सीबीआई के तत्कालीन अतिरिक्त निदेशक राकेश अस्थाना ने विशेष जांच दल के प्रमुख के रूप में मामले की बागडोर संभाली. अस्थाना और सुमन कुमार इस मामले की जांच करने वाली टीम के अगुवा रहे. उन्होंने बार-बार लंदन के चक्कर लगाए. यह सुनिश्चित किया कि मामले की एक भी सुनवाई न छूटे. उन्होंने क्राउन प्रॉसिक्यूशन सर्विस के साथ तालमेल बनाया, जो लंदन की अदालतों में माल्या के खिलाफ मुकदमा लड़ रही थी. यह काम मुश्किल था, क्योंकि यूरोप, विशेष रूप से ब्रिटेन में प्रत्यर्पण के मामलों में भारत का रेकॉर्ड बहुत बुरा रहा है. सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के सक्रिय समर्थन से क्राउन प्रॉसिक्यूशन सर्विस यह मुकदमा लड़ रही थी.

माल्या 2016 में देश से भाग गया. उसे वापस इंडिया लाने के लिए सीबीआई को ब्रिटेन की अदालत में मुश्किल कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है. (फाइल फोटो)
माल्या 2016 में देश से भाग गया. उसे वापस इंडिया लाने के लिए सीबीआई को ब्रिटेन की अदालत में मुश्किल कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है. (फाइल फोटो)

चौकस जांच की

सुमन कुमार ने तय किया कि माल्या के खिलाफ धोखाधड़ी का एक ठोस मामला बनाया जाए. इसके लिए भारत में चार्जशीट दायर की गई. भारत के लिए यह अनिवार्य था कि वह माल्या के खिलाफ ऐसे सबूत पेश करे, जो ब्रिटेन के कानून के तहत दंडनीय अपराध हों. कुमार ने अपनी चौकस जांच के बल पर इसे कथित धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले के तौर पर स्थापित करने में कामयाबी हासिल की. उन्होंने अपनी जांच में जो निष्कर्ष निकाले, उससे भारत को माल्या के प्रत्यर्पण के समर्थन में निर्णायक तर्क पेश करने में कामयाबी मिली. अब माल्या की अपील लंदन की सुप्रीम कोर्ट में भी खारिज हो गई है.

मिल चुका है राष्ट्रपति पुलिस पदक 

सुमन कुमार ने 23 साल की उम्र में उप-निरीक्षक के तौर पर सीबीआई में कदम रखा था. कुमार का सफेदपोश अपराधों की जांच में शानदार रिकॉर्ड रहा है. तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें साल 2002 के सीबीआई के सर्वश्रेष्ठ जांच अधिकारी के स्वर्ण पदक से नवाजा था. सीबीआई की पारंपरिक जांच शैली में माहिर सुमन कुमार (55) को 2008 में सराहनीय सेवा के लिए पुलिस पदक, 2013 में उत्कृष्ट जांचकर्ता और 2015 में राष्ट्रपति पुलिस पदक से भी सम्मानित किया जा चुका है. 2015 में उन्होंने माल्या मामले की जांच शुरू की थी.


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