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जब नेहरू को मवेशियों के रहने की जगह पर रहना पड़ा था

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‘चाचा’ के नाम से मशहूर भारत के पहले प्रधानमंत्री पंं. जवाहर लाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 को हुआ था.  27 मई 1964 को उनकी मौत के बाद देश के खासमखास लोगों ने सर्वसम्मति से फैसला किया कि चाचा नेहरू का जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाएगा. ये परंपरा तभी से चली आ रही है.  नेहरू से जुड़े किस्से पढ़े जाएं.

#1.

नेहरू का कद इतना बड़ा था कि कोई भी जल्दी उनके सामने बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था. राम मनोहर लोहिया उन लोगों में से थे, जिन्होंने नेहरू को कड़ी चुनौती दी. 1962 के लोकसभा चुनाव में लोहिया ने जहां-जहां नेहरू के खिलाफ प्रचार किया, वहां-वहां नेहरू की हार हुई. 1962 के चुनाव के एक साल बाद लोकसभा के उपचुनाव हुए और लोहिया भी लोकसभा पहुंच गए. उन दिनों उन्होंने एक पॉलिटिकल पैम्फलेट लिखा, जिसका टाइटिल था ‘एक दिन के 25 हजार रुपए’.

इस पैम्फलेट में लोहिया ने नेहरू के कुछ खर्चों का जिक्र करते हुए दावा किया कि ये खर्चे सरकारी कोष से किए जा रहे हैं. लोहिया ने कहा कि जिस भारत के 70% लोग रोज़ाना 3 आने से कम पर गुज़ारा करते हैं, वहां प्रधानमंत्री के ऊपर रोजाना 25 हजार रुपए खर्च होना शर्मनाक है.

इस पर नेहरू ने योजना आयोग का हवाला देते हुए कहा था कि योजना आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 70% जनसंख्या की रोज़ाना की आमदनी 15 आना है. इस पर लोहिया ने जवाब दिया था कि 15 आने आय के बावजूद नेहरू पर खर्च होने वाले 25 हजार रुपयों में लाखों आने होते हैं.

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#2.

नेहरू अपनी ऑटोबॉयोग्राफी में लिखते हैं,

”जब मैं अलीपुर जेल में था, तो मेरी तबीयत काफी खराब रहने लगी. कलकत्ता की आबोहवा और गर्मी से मुझे दिक्कत हो रही थी. फैसला हुआ कि मुझे देहरादून भेजा जाएगा. मै काफी खुश था कि वहां पहाड़ देखने को मिलेंगे. 7 मई को मुझसे अपना सामान समेटने और बाहर चलने को कहा गया. मै देहरादून जेल भेजा जा रहा था. महीनों की तन्हाई के बाद कलकत्ता के बीच होकर ठंडी-ठंडी हवा के बीच गुज़रना मुझे बहुत अच्छा लग रहा था.

मुझे अपने तबादले की खुशी थी और मै देहरादून और उसके आसपास के पहाड़ों को देखने के लिए काफी उत्सुक था. लेकिन वहां पहुंचकर मैंने देखा कि 9 महीने पहले इसी जेल से जाते समय इसकी जो हालत थी, वह अब नहीं रह गई थी. अब मै जिस जगह पर था, वह मवेशियों के रहने की जगह को साफ करके बनाई गई थी.

इतना तक तो ठीक था, लेकिन दूसरी जो तब्दीली इसमें की गई थी, वह ज़्यादा दुखद थी. कमरे की दीवारों को, जो पहले 10 फुट ऊंची थीं, उसे 5-6 फुट और बढ़ा दिया गया था. इससे पहाड़ियों को देखने की मेरी जो हसरत थी, वह खत्म हो चुकी थी. मुझे सिर्फ कुछ पेड़ों के सिरे ही दिखते थे. मै इस जेल में करीब 3 महीने तक रहा, लेकिन कभी पहाड़ों को नहीं देख सका.”

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#3.

एक बार नेहरू अपने सहयोगियों के साथ ग्रामीण इलाके से गुज़र रहे थे. रास्ते में चने का खेत देखा, तो उन्होंने चने खाने की इच्छा जताई. कार रुकी और लोग खेत में घुस गए. नेहरू ने सिर्फ फलियां तोड़ीं, लेकिन कुछ लोगों ने फलियों साथ-साथ चने के पेड़ भी उखाड़ डाले. उस पर नेहरू ने उन्हें डांटते हुए कहा, ‘जानवर हो क्या? पेड़ उखाड़ने से नुकसान होता है. ऐसा तो जानवर करते हैं.’

#4.

अपनी जीवनी में नेहरू अपने बचपन की एक कहानी बताते हैं,

”मेरे पिता जी का एक कमरा अलग से पढ़ने के लिए था, जिसमें तमाम किताबें थीं और दो कलम भी रखी रहती थीं. मैं अपने दोस्तों के साथ अक्सर उस कमरे में जाया करता था. एक बार मुझे पेन की ज़रूरत थी, तो मैंने एक पेन ले ली. शाम को अचानक शोरगुल की आवाज़ सुनाई पड़ी. पिता जी सबके ऊपर गुस्सा हो रहे थे. पता लगा कि यह सारी कवायद पेन की वजह से हो रही थी. पिता जी को लग रहा था कि किसी ने उनकी पेन चुराई है. जब उन्हें पता लगा कि पेन मैंने ली है, तो मेरी काफी पिटाई हुई. उस दिन मैंने सबक सीखा कि कभी भी पिता जी से चालाकी नहीं दिखानी है.”

दी लल्लनटॉप के लिए यह आर्टिकल शिव ने लिखा है.


देखें वीडियो, इंदिरा गांधी से जुड़े झूठ की पड़ताल:

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