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क्रिप्टोगैमिक गार्डन, जहां डायनासोर के जमाने की असली चीजों से आप रूबरू हो सकते हैं

उत्तराखंड की वादियों में घूमने के लिए तो आप जाते ही होंगे. लेकिन इस बार वहां जाएं तो एक खास गार्डन में घूमकर आएं. ये कोई आम बगीचा नहीं है. ये है क्रिप्टोगैमिक गार्डन (cryptogamic garden). इस गार्डन में आपको डायनासोर यानी जुरासिक काल से धरती पर मौजूद पौधों की खास प्रजातियां देखने को मिलेंगी. खास इस मायने में कि ये पौधे बिना बीज या फूल के उगते हैं. पृथ्वी की प्राचीनतम प्रजातियों में से एक हैं. देश में ये अपनी तरह का पहला गार्डन है.

क्या खास है इस गार्डन में?

ये गार्डन बना है उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सिर्फ 99 किलोमीटर की दूरी पर. देववन में. 11 जुलाई को ही उद्घाटन के बाद इसे टूरिस्टों के लिए खोला गया है. ये गार्डन समुद्र तल से करीब 2700 मीटर की ऊंचाई पर है. ये करीब तीन एकड़ इलाके में फैला है. इसके अंदर करीब 76 प्रजातियों के पौधे हैं. ये अनोखे पौधे बीज या फूल से नहीं बल्कि शैवाल, काई, फर्न, कवक और लाइकेन की मदद से उगते हैं. इन पौधों को काफी नम मिट्टी की जरूरत भी होती है.

कुछ लोग सोच सकते हैं कि ऐसा क्या है इस गार्डन में, नम मिट्टी की मदद से हम भी अपने घर के गार्डन में इन पौधों को लगा लेंगे. लेकिन ऐसा पॉसिबल नहीं है. ये पौधे सिर्फ खास जगह पर ही उग सकते हैं. जहां प्रदूषण होता है, वहां ये पौधे नहीं हो सकते. मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान) संजीव चतुर्वेदी ने बताया कि इस क्रिप्टोगैमिक गार्डन को देववन में इसीलिए बनाया गया है, क्योंकि यहां प्रदूषण काफी कम है. साथ ही यहां की मिट्टी में मौजूद नमी इन पौधों के लिए उपयुक्त है. ये जगह क्रिप्टोगैमिक पौधों के लिए जन्नत की तरह है.

देश के पहले क्रिप्टोगैमिक गार्डन के बारे में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ट्वीट करके जानकारी दी. उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर बिना बीज के ही पैदा होने वाली प्राचीनतम वनस्पति प्रजातियों में से एक क्रिप्टोगैमिक प्रजाति के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए ये गार्डन स्थापित किया गया है.

उत्तराखंड वन विभाग की ओर से विकसित इस अनोखे गार्डन का उद्घाटनमशहूर एक्टिविस्ट अनूप नौटियाल ने किया. इसके लिए उन्होंने मैग्सायसाय पुरस्कार विजेता, मुख्य वन संरक्षक (अनुसंधान संजीव चतुर्वेदी) को धन्यवाद दिया. 

इस क्रिप्टोगैमिक गार्डन के महत्व के बारे में संजीव चतुर्वेदी ने बताया कि,

“टूरिस्ट्स के साथ-साथ स्कूल-कॉलेज के स्टूडेंट्स और क्रिप्टोगैमिक पौधों से जुड़ी रिसर्च करने वालों के लिए यह पार्क ज्ञान का भंडार है. इस क्रिप्टोगैमिक गार्डन में पौधों की 76 प्रजातियों को संरक्षित किया गया है.” 

अगर पूरे उत्तराखंड की बात करें तो राज्य में क्रिप्टोगैमिक पौधों की 539 से ज्यादा प्रजातियां हैं. यहां में शैवाल की 346, ब्रायोफाइट्स की 478 और टेरिडोफाइट्स की 365 प्रजातियां भी पाई जाती हैं. ब्रायोफाइट्स पौधों में खास बीजाणु होते हैं, जो इनके बीज का काम करते हैं. ये फंगी यानी कवक की तरह पनपते हैं. टेरिडोफाइट्स वो पौधे होते हैं, जो जिनमें बीज और पत्तियां नहीं होतीं. इन्हें धरती की शुरूआती वनस्पतियों में गिना जाता है.

बड़े काम के हैं क्रिप्टोगैमिक प्लांट्स

वन अनुसंधान केंद्र के प्रमुख संजीव चतुर्वेदी बताते हैं कि प्राचीन काल से ही इन पौधों को काफी चीजों के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. इत्र जैसे कॉस्मैटिक प्रोडक्ट्स और पूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाली धूप, हवन सामग्री आदि को बनाने में इनका प्रयोग भी होता है. इन क्रिप्टोगैमिक पौधों में मौजूद कवक (Fungi) को ब्रेड, बियर, वाइन जैसी चीज़ों को बनाने में भी महत्वपूर्ण माना जाता है. इसके अलावा इन क्रिप्टोगैमिक पौधों में मौजूद ब्रायोफाइट्स प्रदूषण को कंट्रोल करने में भी काफी कारगर होता है. ये मिट्टी के कणों को बांध लेते हैं. इससे जमीन में कटाव से बचाव होता है. इसके साथ ही जल प्रदूषण को भी कम करते हैं. 

(यह स्टोरी हमारे यहां इंटर्नशिप कर रहे माधव शर्मा ने लिखी है)


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