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पुलित्ज़र अवॉर्डी डॉक्टर ने बताए, कोरोना की दवा तैयार होने के चार प्रोसेस

इंडिया टुडे ई-कॉन्क्लेव चल रहा है. इसके ज़रिये कोरोना वायरस के दौर में अलग-अलग फील्ड के लोगों से बात की जा रही है. वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिये. 17 अप्रैल को कैंसर सर्जन डॉक्टर सिद्धार्थ मुखर्जी कॉन्क्लेव से जुड़े. सेशन में उनसे बात की इंडिया टुडे ग्रुप के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई ने. क्या बातें हुईं, जानते हैं..

अमेरिका से क्या सीख सकता है भारत?

डॉ. सिद्धार्थ अमेरिका में रहते हैं. वहां कोविड-19 की वजह से 34 हज़ार से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं. भारत ऐसे में अमेरिका से क्या सीख सकता है? इसके जवाब में डॉ. सिद्धार्थ बोले –

“पहली बात, जो सीखी जा सकती है, वो है- तैयार रहना. मैं आपको एक उदाहरण देता हूं. अमेरिका में पहला केस आया- 20 जनवरी को. पहली कोरोना वायरस डिटेक्शन किट कब आई? मार्च के पहले हफ्ते में. यानी करीब-करीब 40 दिन का अंतर. इतनी ख़राब तैयारी. इस केस से भारत ही नहीं, पूरी दुनिया समझ सकती है कि तैयारी कैसी ‘नहीं’ होनी चाहिए.”

कोरोना इतना ख़तरनाक कैसे है?

“कोरोना के साथ सबसे ख़तरनाक बात ये है कि जो बीमार नहीं हैं, वो भी बीमारी फैला रहे हैं. मुमकिन है कि कोई इंसान कोरोना इंफेक्टेड हो, लेकिन बीमार नहीं हो. लेकिन वो कैरियर हो सकता है, जो दूसरे को बीमार कर सकता है. कोरोना वायरस का ये लक्षण इसे अपने कज़िन्स सार्स और मर्स से भी ज़्यादा ख़तरनाक बनाता है.

दूसरा ख़तरा- इसका हर इंफेक्टेड व्यक्ति सुपर स्प्रेडर है. एक्स्पोनेंशियल ग्रोथ. यानी एक से दो, दो से चार, चार से आठ, आठ से… ये ख़तरनाक है.”

इलाज और वैक्सीन की क्या स्थिति है?

इस बात पर डॉ. सिद्धार्थ ने पूरा प्रोसेस समझाया. उन्होंने बताया कि जब किसी वायरस की दवा या वैक्सीन तैयार की जाती है, तो उसके कई प्रोसेस या विकल्प होते हैं.

पहला फेज़ होता है कि आपके पास अभी अलग-अलग बीमारी की जो दवाएं हैं, उससे ही कोई दवा तैयार करें. जैसा कि आप हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन का नाम सुन रहे हैं, जिससे कुछ शायद फायदा हो सके.

दूसरा- एंटीबॉडीज़ की मदद से. किसी बीमार होकर स्वस्थ्य हुए व्यक्ति के शरीर की एंटीबॉडीज़ की मदद से आप पूल तैयार करें, जिससे बाकियों को फायदा पहुंचाया जा सके. लेकिन इसके साथ दिक्कत ये है कि इतनी बड़ी तादाद में एंटीबॉडीज़ लाएं कहां से?

तीसरा तरीका- कोई नई दवा ढूंढ लें. इसका भी प्रोसेस है- कॉम्बिनेशन ढूंढना, फिर एनिमल टेस्टिंग, फिर ह्यूमन टेस्टिंग और तब जाकर कहीं लैब से बाहर आना.

अब आता है – वैक्सीन तैयार करना. ये सबसे लंबा और सबसे ज़िम्मेदारी वाला काम है. आप वैक्सीन ऐसे व्यक्ति को लगाते हैं, जिसे कोई बीमारी नहीं है. आप उसे भविष्य की बीमारी से बचा रहे हैं. इसलिए भारी ज़िम्मेदारी वाला काम है. इसमें कम से कम 18 से 20 महीने का वक्त है.

डॉ. सिद्धार्थ ने और क्या-क्या कहा. पॉइंटर्स में जानते हैं

अगर कोरोना वायरस की कोई दवा या वैक्सीन तैयार होती है, तो उसका भारत में तैयार होना भी बेहद ज़रूरी है.

भारत की बड़ी आबादी है. ज़रूरत भी ज़्यादा होगी. अगर दवा का लाइसेंस किसी दूसरे देश के पास होता है और भारत वहां से इंपोर्ट करता है तो ज़ाहिर है कि दवा के दाम ज़्यादा होंगे और भारत की काफी आबादी उसे अफोर्ड ही नहीं कर पाएगी. इसलिए ज़रूरी है कि दवा भारत में बने.

फिलहाल जब तक कोरोना का कोई ठोस इलाज या वैक्सीन नहीं आ जाती, तब तक ये समझ लीजिए कि इसका कोई एक सॉल्यूशन नहीं है. कॉम्बिनेशन ऑफ सॉल्यूशन है, जिसका सबसे बड़ा तरीका है- लॉकडाउन. लेकिन लॉकडाउन हमेशा तो रख नहीं सकते. तो इसे हटाएं कैसे?

लॉकडाउन हटाने के चार प्रोसेस हैं- टेस्टिंग, आइसोलेशन, यूनिवर्सल फेशियल मास्किंग. ज़्यादा से ज़्यादा टेस्ट करें, करते रहें. जब तक कि वैक्सीन या दवा न आ जाए. जिसके भी ज़रा सा भी इंफेक्टेड होने का शक हो, उनके लिए आइसोलेशन और क्वारंटीन जारी रखें. और मास्क ज़रूर, ज़रूर, ज़रूर लगाएं. इससे कम से कम आप वायरस का ट्रांसफर तो रोक ही सकते हैं.

डॉ. सिद्धार्थ मुखर्जी को 2010 में लिखी उनकी किताब ‘कैंसर – द एंपरर ऑफ ऑल मालाडीज.’ के लिए पुलित्ज़र अवॉर्ड मिल चुका है.


क्या! एक गिलास गरम पानी का गरारा और कोरोना होने का चांस खत्म?

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