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आपकी पर्सनल वॉट्सऐप चैट पढ़ने के लिए भारत इस संगठन में शामिल हो गया है

एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन (End-to-end encryption) बंदे की पर्सनल चैट को सिक्योर करने के लिए बनाई गई है. मगर दुनिया की किसी भी सरकार को ये फूटी आंख नहीं भाती है. UK (यूनाइटेड किंगडम) ने अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड के साथ मिलकर इंटेलिजेंस इशूज़ की एक ग्लोबल अलायंस बनाया है. नाम है Five Eyes (फ़ाइव आइज़). इसमें अब भारत और जापान भी शामिल हो गए हैं.

इस ग्रुप ने एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन के खिलाफ़ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए एक संदेश जारी किया है. ये कहते हुए कि एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन की आड़ में ये अपने प्लेटफॉर्म पर फ़ैलने वाली चाइल्ड पॉर्नोग्राफी जैसी गैरकानूनी गतिविधि को नज़रअंदाज़ न करें.

क्या है एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन

एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन, यानी कि एक ऐसा लॉक, जो इस बात की पुष्टि करता है कि जिन दो जनों के बीच चैट चल रही है, उनके सिवा उसे कोई और न पढ़ सके. न किसी देश की सरकार, न ही खुद वो प्लेटफॉर्म, जिस पर बातचीत हो रही है. एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन टेक्नॉलजी यूजर की प्राइवसी और पर्सनल चैट को सिक्योर करने के लिए बनाई गई है. हमें ये वॉट्सऐप, सिग्नल और आईफोन की iMessage जैसी ऐप्स में देखने को मिलती है.

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भांति-भांति के मैसेजिंग ऐप में एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन है.

इस टेक्नॉलजी के तहत आप जो मैसेज भेजते हैं, उस पर ताला लगा रहता है. और इसकी चाबी सिर्फ़ उसके पास होती है, जिसे मैसेज मिला है. हर नए मैसेज के लिए एक नए ताले-चाबी का कॉम्बिनेशन बन जाता है. इसीलिए किसी भी हैकर के लिए चैट को डीक्रिप्ट करना या बाहर से बैठे-बैठे चैट को खोलना बहुत मुश्किल होता है.

हां, कोई आपका पूरा का पूरा फ़ोन ही हैक कर ले, तो अलग बात है. अगर आप सोच रहे हैं कि फ़िर ये एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन वाली वॉट्सऐप चैट पत्रकारों के हाथ कैसे लग जाती है, तो आप यहां पर क्लिक करके इसके बारे में विस्तार से पढ़ सकते हैं.

भारत और अन्य 6 देशों को एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन से क्या दिक्कत है

भारत समेत इन देशों के ग्रुप का कहना है कि एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन वाली चैट प्रशासन को पूरी तरह ब्लॉक कर देती है, इसलिए कानूनी व्यवस्था को लागू करने में दिक्कतें पैदा होती हैं. इन देशों का कहना है कि न सिर्फ़ एंड-टू-एन्क्रिप्शन प्लेटफॉर्म पर आतंकवादी अपनी गतिविधियां बनाए हुए हैं, बल्कि सेक्शुअल प्रीडेटर्स भी चाइल्ड पॉर्नोग्राफ़ी आपस में साझा करते हैं.

इनका कहना है कि एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन की वजह से इन एक्टिविटी को न सरकार रोक सकती, न ही खुद ये सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म. ये कहते हैं कि एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन चलाने वाले टेक प्लेटफॉर्म को चाहिए कि वो इस प्रॉब्लम को इग्नोर करना बंद करें और इन क्रिमिनल ऐक्ट को रोकने में प्रशासन की मदद करें.

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इन देशों की सुनने के बाद फ़ेसबुक.

ये देश कहते हैं कि वो एन्क्रिप्शन को सपोर्ट करते हैं, मगर इस तरह नहीं कि किसी भी तरह के कॉन्टेन्ट के लिए लीगल एक्सेस तक न मिल सके. ये चाहते हैं कि कंपनियां अपनी एन्क्रिप्शन सर्विस इस तरह से बनाएं कि जरूरत पड़ने पर ये प्रशासन को कॉन्टेन्ट प्रोवाइड करा सकें.

भले ही ये मैसेज सारे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए था, मगर ये संदेश फ़ेसबुक के बारे में अलग से मेन्शन करता है. स्टेटमेंट कहता है कि फ़ेसबुक के 20% यूजर तो इन्हीं सात देशों में हैं और कंपनी की एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन पॉलिसी पब्लिक सेफ़्टी के लिए नुकसानदेह है.

फ़ेसबुक का क्या कहना है

फ़ेसबुक ने कहा है कि एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन लोगों की प्राइवेट इन्फॉर्मेशन को बचाने के लिए बहुत ज़रूरी है. फ़ेसबुक के स्पोक्सपर्सन ने कहा है-

“इन सभी (सातों) देशों में लोग अलग-अलग ऐप्स पर एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन मैसेजिंग पसंद करते हैं. ऐसा इसलिए है, क्योंकि ये इनकी चैट को हैकर, क्रिमिनल और विदेशी दखल से बचाती है. फ़ेसबुक हमेशा से ही अब्यूज़ को पहचानने, पकड़ने और रोकने के नए तरीके खोजने में आगे रहा है और ये आगे भी ऐसा करता रहेगा.”

क्या कोई बीच का रास्ता हो सकता है

साइबर पीस फाउंडेशन नाम की एक संस्था ने वॉट्सऐप और टेलीग्राम पर शेयर किये जाने वाले चाइल्ड सेक्शुअल अब्यूज़ मटीरियल पर एक स्टडी की है. ये एंड-टू-एन्क्रिप्शन वाले प्लेटफॉर्म पर चाइल्ड अब्यूज़ को रोकने के लिए एक सुझाव देते हैं- यूजर रिपोर्टिंग का. इन प्लेटफॉर्म पर रिपोर्ट का बटन तो है, मगर साइबर पीस का कहना है कि चाइल्ड अब्यूज़ रिपोर्ट करने के लिए एक अलग से मेकनिज़म होना चाहिए.

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चाइल्ड पॉर्नोग्राफ़ी रोकने का सुझाव!

ये कहते हैं कि यूजर के पास चैट में किसी भी मैसेज, फ़ोटो या वीडियो को चाइल्ड अब्यूज़ या किसी और तरह के प्रॉब्लमैटिक कॉन्टेन्ट के लिए टैग करने का ऑप्शन होना चाहिए, जिसके बाद यूजर के फ़ोन पर ही उस कॉन्टेन्ट की एक हैश वैल्यू बन जाए. इसके बाद इसे हैश रजिस्टर से मिलान कर लिया जाए.

सरल शब्दों में कहें, तो पहले रिपोर्ट करने पर मशीन इसकी जांच करे. इल्लीगल एक्टिविटी पाए जाने पर अथॉरिटी को कॉन्टैक्ट किया जा सके. अगर मशीन के रिजेक्ट किए जाने पर भी यूजर को लगे कि ये इल्लीगल कॉन्टेन्ट है, तो वो चैट के उस खास हिस्से को एक्सपोर्ट करके ह्यूमन वेरिफिकेशन के लिए भेज सके.


वीडियो: गूगल से दिक्कत के चलते पेटीएम ने मिनी ऐप स्टोर लॉन्च किया, पर इसमें बड़ा लोचा है

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