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डलहौजी रोड का नाम दारा शिकोह रोड रखने से क्या होगा, इतिहास से उसका पन्ना ही फाड़ दो

इतिहास बदला तो नहीं जा सकता है, न ही उससे भागा जा सकता है. तो उससे पीछा छुड़ाने के बड़े नायाब तरीके इस्तेमाल किए जाते हैं. जैसे सोमवार को राष्ट्रपति भवन के पास स्थित डलहौजी रोड का नाम बदलकर दाराशिकोह रोड कर दिया गया. डलहौजी गुलाम भारत का ब्रिटिश गवर्नर जनरल था. 1848 से 1856 तक. और दाराशिकोह शाहजहां का बेटा, औरंगजेब का सबसे बड़ा भाई था. जिसे बाद में खुद औरंगजेब ने उसके बेटे के सामने कत्ल करवा दिया था.

इसाई पादरियों के साथ दारा शिकोह
इसाई पादरियों के साथ दारा शिकोह

खैर इतिहास की बात चली है तो चलते हैं एक साल पीछे. इसी तरह औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर दिया था. क्योंकि औरंगजेब हिंदुओं का दुश्मन और निर्दयी शासक था. डलहौजी रोड का नाम दारा शिकोह के नाम से रिप्लेस करने के पीछे लॉजिक ये है कि वो सर्व धर्म समभाव वाला आदमी था. हिंदू धर्म पर ज्यादा अत्याचार नहीं किए. इसलिए उसका नाम यहां इस्तेमाल किया जा सकता है. इतिहास में क्या लिखा है इस बेस पर ये काम नहीं हो रहा. क्योंकि पिछले साल ही अकबर रोड का नाम बदलकर महाराणा प्रताप रोड किया जा रहा था. और इतिहास की किताबों में दर्ज है कि अकबर भी दारा शिकोह की तरह ही कट्टरता से दूर सभी धर्मों को एक साथ लेकर चलने वाला बादशाह था. उस वक्त बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा था कि अकबर एक कसाई था. राजपूत सेना, उसी करणी सेना की फ्रेंचाइजी जिसने इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने के लिए संजय लीला भंसाली को लप्पड़िया दिया था. उसी राजपूत सेना के लोकेंद्र कावली ने कहा था कि अकबर विदेशी आक्रमणकारी था. तो भैया जिस लॉजिक के अकबर बाहरी था उसके हिसाब से दारा शिकोह कैसे अंदरूनी हो गया?

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वाह जी वाह, इतिहास को निचोड़कर ऐसा कड़वा रस निकालने का एक्सपीरिएंस नए नवेले इतिहासकारों को ही हो सकता है. अगर अपनी हार और अपने पर सैकड़ों साल पहले हुए अत्याचार को पचा नहीं पा रहे हो तो क्या करोगे? हमारे पास कोई टाइम मशीन तो है नहीं कि उसमें बैठकर हम इतने साल पीछे जाएं और अकबर की विशाल पैदल सेना, महारथी, घुड़सवार जो हाथ में तलवारें नचा रहे हों, उन पर चार ग्रेनेड बरसा दें और एक कोई छोटा एटम बम. काम खतम हो जाए. इतिहास हमारा अविजित गौरवशाली हो जाए. हम ऐसा नहीं कर पाएंगे सच है. लेकिन हमने इतिहास को आज बदलने का बढ़िया तरीका निकाला है.

हम ये मान ही नहीं सकते कि औरंगजेब की शिवाजी से लड़ाई पॉलिटिकल थी, धार्मिक नहीं. अकबर- महाराणा प्रताप का झगड़ा राजनैतिक था, धार्मिक नहीं. अगर धार्मिक होता तो बाहर से आने वाली हजार लोगों की सेनाएं यहां के दस हजार लोगों की बस्ती को मात नहीं देतीं. अगर ये लड़ाई उस वक्त धार्मिक होती तो हिंदू धर्म के लोग जाति भूलकर आक्रमणकारियों का मुकाबला करते और उन्हें खदेड़ देते. लेकिन धर्म से ज्यादा जातियों में बटा हमारा समाज सबको लड़ने की इजाजत नहीं देता था. वर्णों के हिसाब से धंधे बटे थे जिसमें लड़ने और राज करने का काम सिर्फ क्षत्रियों का था. बाकी सब सोचते थे “कोउ नृप होय हमें का हानी.” तो जब उस वक्त राज्य बचाने की, जमीन बचाने की ही व्यवस्था नहीं थी तो कोई इतना खाली बैठा था कि धर्म बचाता.

मगर जो हमने तब न किया अब करेंगे. इतिहास में जो भी काले पन्ने हैं या तो उनका कलर चेंज कर देंगे या फाड़ के फेंक देंगे. जैसे सन 1615 को हम इतिहास से मिटा देंगे. इसी साल ब्रिटेन से कलमुहां टॉमस रो जहांगीर के पास आया था और उसको फुसलाकर भारतवर्ष को गुलामी की तरफ धकेला. 1857 हटा देंगे. तब हमारी क्रांति असफल हो गई थी. अंग्रेजों ने हमारे लोगों पर बहुत अत्याचार किए थे. फिर 1947 हटा देंगे. पाकिस्तान अलग हो गया. दंगों में दोनों देश बर्बाद हो गए. इन सालों के अलावा उन लोगों के नाम भी इतिहास से मिटा देंगे जिन्होंने किसी भी सामाजिक काम में भाग लिया. हम गांधी को मिटाने में लगे हैं. भगत सिंह को टीशर्ट में छपवाकर कुकर्म कर रहे हैं. उनकी आइडियॉलजी का पता नहीं. वो बेचारे धर्म के नुकसानों को चीखते चिल्लाते चले गए, यहां कट्टर हिंदू उनके नाम का झंडा लेकर अपना धर्म बचा रहे हैं. ऐसे ही इतिहास बदलेगा. जय महाकाल.

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