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इंडिया ने ट्रम्प को जो दवा भेजी है, उसका सच क्या है?

कोरोना के समय में भारत और अमरीका के बीच थोड़ी रस्साकशी हुई है. Hydroxychloroquine को लेकर. कहा जा रहा है कि मलेरिया ठीक करने वाली इस दवा से ठीक हो जाएगा कोरोना का मरीज़. ट्रम्प ने भारत से मांग की. भारत ने भी बोला कि दवा भेजेंगे. फ़िकर नॉट.

लेकिन एक तरफ़ जहां इस दवा की सफलता को लेकर दावे किए जा रहे हैं, वहीं ये भी कहना है कि ये दवा कितनी कारगर है, इस बारे में हमें बहुत कम जानकारी है. 

पहले जानिए Hydroxychloroquine की कहानी 

पहले जानिए chloroquine के बारे में. मलेरिया के इलाज में इसका इस्तेमाल हुआ करता है. सबसे पहले 1934 में जर्मन वैज्ञानिकों ने इसे बनाया. क्विनीन नाम के पदार्थ से, जो सिंकोना पेड़ की छाल से निकलता है. Hydroxychloroquine भी इसी से मिलता जुलता है. ये अपने भाई chloroquine की तुलना में कम ज़हरीला होता है. इसका भी इस्तेमाल मलेरिया में किया जाता है. लेकिन इसके अलावा गठिया में भी Hydroxychloroquine का इस्तेमाल किया जाता है.

सस्ते में उपलब्ध है. भारत में दो कंपनियां भारी मात्रा में Hydroxychloroquine का निर्माण करती हैं. एक कम्पनी है Ipca और दूसरी है Zydus Cadila.

किनको खाने की सलाह दी जा रही है?

ICMR यानी इंडियन काउन्सिल फ़ॉर मेडिकल रीसर्च ने दो तरह के लोगों को Hydroxychloroquine खाने की सलाह दी. एक तो डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को, जो कोरोनावायरस के मरीज़ों का इलाज कर रहे हैं. और दूसरा उन लोगों को, जो कोरोनावायरस के मरीज़ के घर के लोग हैं. इसके साथ ही ये भी ख़बर चली कि कोरोनावायरस के जो हाई-रिस्क मरीज़ हैं, उन्हें भी Hydroxychloroquine की खुराक दी जानी चाहिए.

इसके पहले और बाद के कई मौक़ों पर अमरीकी राष्ट्रपति डानल्ड ट्रम्प ने एकाधिक मौक़ों पर हचककर Hydroxychloroquine की वकालत कर दी थी. ‘कोरोना का जादुई इलाज’ टाइप का माहौल बना दिया था. जिसके बाद Hydroxychloroquine की ख़रीद बढ़ गयी. लोगों घरों में भरने लगे. Hydroxychloroquine ज़्यादा खा लेने से कुछेक लोगों के मौत की भी ख़बर सामने आ गयी. 

क्या कोई रीसर्च है या बस हवा में तीर?

है रीसर्च. सबसे पहले फ़्रांस का रूख किया जाए. यहां के कुछ वैज्ञानिकों द्वारा किया गया रीसर्च प्रकाशित हुआ International Journal of Antimicrobial Agents (IJAA) में. इस रीसर्च में Hydroxychloroquine के साथ Azrithromycin भी दिया गया. 20 लोगों को दवाओं का ये कॉम्बिनेशन दिया गया. इन 20 लोगों में इन्फ़ेक्शन का रेट कम होता देखा गया. निष्कर्ष ये कि covid-19 के मरीज़ों में वायरस का इन्फ़ेक्शन Hydroxychloroquine और Azithromycin के इस्तेमाल से कम हो रहा है. 

फ़्रांस के अलावा और चीन के वुहान से भी रीसर्च सामने आया. इन्स्टिट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी के शोधकर्ताओं का एक शोध मशहूर जर्नल नेचर के सेल डिस्कवरी में प्रकाशित हुआ. इस पर्चे में बताया गया कि कैसे hydroxychloroquine और chloroquine से कोरोना का इलाज किया जा सकता है. इस शोध के लिए अफ़्रीकन ग्रीन बंदर का इस्तेमाल किया गया. शोध में पाया गया कि chloroquine और hydroxychloroquine दोनों ने ही कोरोनावायरस को मनुष्य की कोशिकाओं में जाने से रोक दिया. चूंकि chloroquine की तुलना में hydroxychloroquine कम घातक है, इसलिए hydroxychloroquine का इस्तेमाल ज़्यादा करने की सलाह दी गयी. कहा गया कि इस दवा के क्लिनिकल ट्रायल से कोरोनावायरस की रोकथाम की जा सकती है. 

क्या कोई आंकड़ा भी है?

अभी तक तो नहीं. रीसर्च ही है. Hydroxychloroquine के इस्तेमाल से कितने लोग ठीक हुए? कितने नहीं? इस बारे में पुख़्ता-पक्का नहीं है. रीसर्च को छोड़ दें तो ख़बरें बताती हैं कि कोरोना के मरीज़ों को सिर्फ़ Hydroxychloroquine नहीं दिया जा रहा है. और भी दवायें दी जा रही हैं. तब मरीज़ ठीक हो रहे हैं. ऐसे में मरीज़ के ठीक होने में Hydroxychloroquine का कितना रोल है, कुछ साफ़ नहीं. लेकिन मौजूदा समय बड़े लेवल पर Hydroxychloroquine के साथ दो टेस्टिंग चल रही हैं. एक WHO द्वारा और एक Wellcome ट्रस्ट और बिल एंड मलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन की तरफ़ से. WHO वाले Hydroxychloroquine का इस्तेमाल देख रहे हैं तो दूसरे वाले Chloroquine का प्रभाव. इन दोनों टेस्टिंग के आंकड़े अभी सामने आने बचे हैं.

दवा बनाने वाली कम्पनियों का क्या कहना है?

भले ही आंकड़े अभी तक सामने न आए हों, लेकिन कम्पनियों को दवा बनानी है. एक्सपोर्ट करना है. क्योंकि सरकारें इस्तेमाल कर रही हैं. विदेशों को एक्सपोर्ट का वादा है. Ipca के ज्वाईंट मैनेजिंग डायरेक्टर अजीत कुमार जैन ने Indian Express से बातचीत में बताया,

“सरकार की मांग के अनुसार हम Hydroxychloroquine का प्रोडक्शन बढ़ा सकते हैं. हमारी Hydroxychloroquine बनाने की महज़ 10 प्रतिशत क्षमता का उपयोग ही घरेलू बाज़ार में हो सका है.”

लोग डरकर इस दवा को घरों में भरने ना लगें, इसलिए इस दवा को कुछ ही दवा की दुकानों पर उपलब्ध कराया जाएगा. क्योंकि, जैसा हमने पहले बताया, ये दवा आर्थ्राइटिस में भी इस्तेमाल में लाई जाती है. अजीत जैन ने बताया,

“मरीज़ अपने डॉक्टर से बात करें, और उन्हें पता चल जाएगा कि किस दुकान पर दवा उपलब्ध है. जब लॉकडाउन ख़त्म होगा, तो हमारी कोशिश करेंगे कि इस दवा को लोगों तक और आसानी से पहुंचाया जा सके.”

Zydus Cadila के प्रवक्ताओं ने भी जानकारी दी है कि पहले कम्पनी Hydroxychloroquine का 2-3 टन प्रति महीने उत्पादन करती थी. अब कम्पनी 20-30 टन प्रति महीने की गति से उत्पादन कर रही है. आगे आने वाले समय में इस दवा का कम्पनी 40-50 टन प्रति महीने की दर से प्रोडक्शन कर सकती है.


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