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क्या बिहार-नेपाल बॉर्डर पर फायरिंग की घटना का नक्शा विवाद से कोई कनेक्शन है?

दिन रविवार. तारीख 14 जून. दोपहर के बाद और सांझ ढलने से पहले का वक्त. आसपास दिख रहे सभी घरों की दीवार मिट्टी की है और छत फूस की. बाहर भैंसें, बकरियां और बैलें छितर के बंधे हैं. धूप इतनी तेज है कि इंसान से लेकर जानवर-चिड़ियां भी छाया तलाश रहे हैं. मिट्टी से बने इन घरों और आसपास बंधे माल-मवेशियों के बीच कुछ चौपहिया गाड़ियां खड़ी हैं. कुछ गाड़ियों की पहचान आगे लिखे विधायक, पूर्व विधायक, कांग्रेस अध्यक्ष और जिला परिषद से की जा सकती है. वहीं कुछ पर मीडिया, प्रेस, पत्रकार दर्ज है. इन गाड़ियों और आसपास बंधे मवेशियों के बीच से एक पतली गली, जिसे स्थानीय भाषा में ‘एकपेरिया’ कहते हैं, उस घर की ओर जा रही है, जिस घर के आगे पूरे गांव-टोले की जवान और बुजुर्ग महिलाएं जमा हैं. ये घर भी मिट्टी और फूस का ही है. घर के आगे दो भैंसें बंधी हैं. इसके आगे एक बंसबाड़ी है, जहां छांह है और वहां आदमियों का जमावड़ा है.

घर में एक दरवाजा है. दरवाजे पर टंगा बल्ब अभी भी जल रहा है. साड़ी के पल्लू से आधी मुंह ढंके महिलाएं एकटक दरवाजे की तरफ ही देख रही हैं. दरवाजे के बीचों-बीच नई सफेद साड़ी में लिपटी एक चौदह-पंद्रह साल की लड़की बैठी है. उसे कई महिलाओं ने पकड़ा हुआ है. वो आसपास खड़ी भीड़ से बेखबर है. शायद उसे कुछ महसूस नहीं हो रहा है. आखें खुली हैं, पर वो कुछ देख नहीं पा रही है. वो बस एकटक सामने की तरफ देख रही है. उसका सर, उसके घुटने पर टिका है. वो बस देखे जा रही है. आसपास खड़ी महिलाएं उसे निहार रही हैं. एक महिला फुसफुसाते हुए कह रही है, “खेले-खाए के उमर (खेलने-खाने की उम्र) में विधवा हो गई अब कौन सहारा होगा?”

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नेपाली गार्ड की गोली से मारे गए विकास की पत्नी (फोटो: विकास कुमार)

काफी देर से शांत खड़ी भीड़ में अचानक हलचल होने लगी. घर के पास खड़ी महिलाओं को संबोधित करते हुए एक आदमी तेज आवाज में कहता है, “थोड़ा जगह दे दीजिए. विधायक जी और उनके पति आ रहे हैं.”

आवाज सुनते ही महिलाएं एक तरफ हो जाती है और स्थानीय विधायक गायत्री देवी और उनके पति आते हैं. अभी तक जमीन पर बैठी बेसुध लड़की को आसपास की महिलाएं बांह से पकड़ कर खड़ा करवाती हैं. विधायक गायत्री देवी, उनके पति और उनके साथ आए कई अन्य लोग आसपास खड़े हो जाते हैं. विधायक के साथ आया गार्ड मोबाइल से फोटो-वीडियो कैद करता है.

फोटोशूट के बाद विधायक के साथ आया एक व्यक्ति ऊंची आवाज में कहता है,

“विधायक जी ने अभी अपने निजी कोष से 25,000 रुपए दिए हैं. उन्होंने वायदा किया है कि इनको (लड़की की तरफ इशारा करते हुए) आंगनबाड़ी सेविका के तौर पर लगवा दिया जाएगा.”

जब ये घोषणा खत्म होती है, तो विधायक धीरे से कहती हैं, “ऐसे घेरा मत लगाइए. थोड़ा हवा आने दीजिए. इसको थोड़ा दूध-वूध दीजिए. बहुत कमजोर है.” इतना कहते हुए वो और उनके पति वहां उपस्थिति सभी महिलाओं को प्रणाम करते हुए लौट गए.

विधायक जी के साथ आया पूरा अमला उस घर के आगे से चला गया है. सुबह से खड़ी महिलाएं बची हैं और वो अकेली उदास लड़की, जिसकी पहचान में अब संजू के अलावा ‘विधवा’ शब्द नत्थी हो गया है. दो साल पहले ही विकास उर्फ बिकेश और संजू की शादी हुई थी. शादी के बाद दिनों पंजाब के शहर लुधियाना चले गए थे. विकास वहां सिलाई का काम करता था.

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संजू के साथ फोटो खिंचवाती विधायक, उनके पति और उनके साथी (फोटो: विकास कुमार)

कोरोना की वजह से जब देशव्यापी लॉकडाउन लगा, तो हजारों-लाखों लोगों की ही तरह विकास और संजू भी सीतामढ़ी जिले के सोनबरसा प्रखंड में स्थित अपने गांव जानकी नगर-लालबानी लौट आए. लौटने के बाद 14 दिन पंचायत में बने क्वारंटीन सेंटर में रहे, फिर गांव आए.

नेपाल सीमा पर गई जान

12 जून की सुबह करीब 8 बजे से 9 बजे के बीच गांव से सटे भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय सीमा पर नेपाल सशस्त्र पुलिस बल की तरफ से की गई फायरिंग में संजू के पति विकास की जान चली गई और दो अन्य घायल हो गए. भारत-नेपाल सीमा पर ये अपने तरह की पहली घटना है. वो भी तब, जब नक़्शे को लेकर दोनों देशों में विवाद चल रहा है. दूसरी तरफ, भारत-चीन एक दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं. सवाल बनता है कि क्या भारत-नेपाल सीमा पर हुई फायरिंग का भी इन सब से कोई लेना देना है? सबसे बड़ा सवाल कि जो आजतक नहीं हुआ. वो 12 जून की सुबह क्यों हुआ? क्यों नेपाली सीमा की सुरक्षा में लगे जवानों ने आम भारतीय नागरिकों को निशाना बनाकर 10 राउंड और हवा में और पांच राउंड टारगेट करके फायरिंग की?

शुक्रवार की सुबह क्यों हुई थी फायरिंग?

भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय सीमा की लम्बाई लगभग 1750 किमी है. यह सीमा रेखा उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और सिक्किम जैसे राज्यों से होकर गुजरती है. अकेले बिहार से लगी सीमा की लम्बाई 720 किमी है. राज्य के सात जिले नेपाल के साथ सीमा साझा करते हैं, जिनमें पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल, अररिया और किशनगंज हैं. भारत की तरफ से सीमा की सुरक्षा के लिए सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) की तैनाती रहती है और नेपाल की तरफ से सशस्त्र पुलिस बल निगरानी करती है. हर जिले में कुछ चेक पोस्ट बने हैं, जिससे गाड़ियां उधर से इधर आती हैं और इधर से उधर जाती हैं. इन पोस्टों के अलावे जगह-जगह पर पिलर लगे हैं, जो बताती हैं कि ये भारत-नेपाल की सीमा है. इसके अलावे कुछ भी नहीं है.

कोरोना वायरस की मार पूरी दुनिया पर पड़ी, तो भारत-नेपाल भी इसकी चपेट में आए. दोनों देशों ने वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए अपने-अपने यहां लॉकडाउन लगाया. 23 मार्च को देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा करते हुए नेपाली वित्त मंत्री युवराज खाटीवाडा ने कहा-

सरकार ने दक्षिणी और उत्तरी, दोनों सीमाओं को सील करने का फैसला किया है, क्योंकि समूचे दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्वी एशिया कोरोना वायरस की महामारी से प्रभावित हैं. लोगों के सीमा पार आवागमन से नेपाल में बीमारी फैलने का बड़ा जोखिम है.

कोरोना वायरस के फैलाव को कम करने की वजह से लिए गए इस फैसले ने सीमा के इर्द-गिर्द बसे हजारों गांवों की वर्षों पुरानी दिनचर्या बदल दी. हिंदी के जाने माने पत्रकार और ‘जनसत्ता’ अखबार के संपादक प्रभाष जोशी के साथ पत्रकारिता कर चुके नागेंद्र प्रसाद सिंह कहते हैं-

एक नहीं. दो नहीं. एक परिवार के चार-चार, पांच-पांच संबंध सीमा के उस पार हैं. हमारे खेत नेपाल की सीमा में हैं और हम बरसों से उधर वैसे जाते रहे हैं, जैसे भारत की सीमा में स्थित अपने खेतों में जाते रहे हैं. लेकिन लॉकडाउन की सख्ती ने पहली बार सीमा का एहसास करवा दिया. किसान अपनी फसल नहीं काट पाए. बेटी अपनी मां के दाह संस्कार में नहीं जा सकी. सीमा पर खड़े नेपाली जवान और इधर रहने वाले आम लोगों को पहली बार कुछ अलगाव महसूस हुआ.

आप सोच रहे होंगे कि 12 जून की सुबह हुई फायरिंग का मार्च के आखिर में लगे लॉकडाउन से क्या लेना-देना, जबकि सच्चाई यही है कि इस दिन हुई झड़प और फायरिंग का लगभग 80 दिन से चले जा रहे लॉकडाउन और सीमाबंदी से ही लेना-देना है. सीमा के इस पार रह रहे लोग अपने तैयार फसल को खेत में ही खराब होते हुए देखते रहे. वो अपने लगाए आम के बाग-बगीचों से दूसरों को आम तोड़ते देखते रहे और इन सारी वजहों से एक तनाव का माहौल बनता गया, जिसके फलस्वरूप 12 जून की सुबह फायरिंग की घटना हुई.

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पिलर संख्या 319, इसी के पास शुक्रवार को गोली चली थी. (फोटो: विकास कुमार)

इस दिन सुबह-सुबह जानकीनगर-लालबंदी गांव के निवासी लगन राय के परिवार के सदस्य उस पार से मुलाकात करने आ रहे अपने सबंधियों से मिलने के लिए सीमा पर पहुंच गए. सीमा पर लगे पिलर संख्या 319/1 के पास एक आम का बगीचा है. इसी बगीचे में बैठकर दोनों पक्ष बातचीत कर रहा था, तभी नेपाली गार्ड्स आए. लॉकडाउन का हवाला देते हुए गार्ड्स ने परिवारों को वहां से चले जाने के लिए कहा. आम दिनों के मुकाबले गार्ड्स थोड़े ज़्यादा सख़्त थे. लगन राय ख़ुद बताते हैं-

गार्ड्स परिवार के साथ बदतमीजी कर रहे थे. मैंने आगे बढ़कर उन्हें रोका, तो मुझे मारने लगे. मैं भारत की तरफ भागा. मेरे परिवार की महिलाएं भागीं. वो मुझे भारत की सीमा में से पकड़कर ले गए, फिर हवाई फायरिंग करने लगे.

लगन राय को नेपाल के गार्ड्स गिरफ़्तार करके ले गए थे और बाद में उन्हें छोड़ा गया. लगन राय घटना के बारे में बताते तो हैं, लेकिन कुछ जरूरी डिटेल्स छुपा लेते हैं या बताना भूल जाते हैं.

नाम जाहिर न करने की शर्त पर कई चश्मदीद घटना का विवरण कुछ यूं देते हैं-

लगन राय का परिवार मिलने आया. मौके पर आए गार्ड्स ने रोका. लगन राय ने गार्ड्स कहा कि तस्करों को तो आप लोग रोकते नहीं, लेकिन हम जैसे आम लोगों को मिलने से रोकते हैं. ये कहते हुए वो और उनके परिवार के लोग थोड़े ग़ुस्से में थे. हल्ला सुनकर आसपास के खेतों में काम कर रहे किसान-मजदूर और क्रिकेट खेल रहे लड़के जमा हो गए. हल्ला-हंगामा होने लगा. नारेबाज़ी भी हुई. तब तक सभी महिलाएं जा चुकी थीं. तभी एक गार्ड ने हवाई फायरिंग शुरू कर दी.

गोली चली, तो एक लड़के की मौत हुई और दो घायल हुए. घायल उदय ठाकुर की भाभी इंद्रासन देवी ने कहा-

मेरे देवर के पास किसी का फोन आया था कि बॉर्डर पर झगड़ा हो रहा है. वो वहां चला गया. नेपाली सुरक्षा बल के जवानों ने गोली चला दी. फायरिंग होते ही उदय भागा, तो उसके पैर में गोली मार दी.

अगर लगन राय की मानें, तो कहा-सुनी शुरू होने के साथ ही नेपाली गार्ड्स ने फायरिंग शुरू कर दी और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. वहीं अगर दूसरे चश्मदीदों की मानें, तो कहा-सुनी शुरू होने के काफी देर बाद जब भीड़ सीमा के इस पार जमा हो गई, हो-हल्ला बढ़ गया, तो गार्ड्स ने फायरिंग की. उन्होंने पहले 10 राउंड हवा में फायरिंग की. उसके बाद ही उन्होंने सामने से गोली चलाई.

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नेपाली फोर्स के सीमा पर बने अस्थाई कैम्प के सामने और नो मैंस लैंड पर बैठा लड़का. (फोटो: विकास कुमार)

जानकीनगर-लालबंदी से सटा हुआ एक दूसरा गांव है. नाम है सोहरवा. इस गांव के भिखारी महतो को पूरा इलाका ‘मास्टर साहब’ कहता है. वो इलाके के एक सरकारी स्कूल में मास्टर हैं और इस समाज में आए कई बड़े बदलावों के वाहक भी बताए जाते हैं. ‘दी लल्लनटॉप’ से बात करते हुए वो कहते हैं-

देखिए, ये ठीक उसी तरह की घटना थी, जैसी आए दिन हमारे देश में घटती रहती है. पुलिस और ग़ुस्साए लोगों में झड़प. लाठीचार्ज और फायरिंग. जाहिर तौर से घटना दुखद है. एक व्यक्ति की मौत हुई है, दो घायल हैं. लेकिन भारत-नेपाल के हालिया सीमा विवाद या नक़्शा विवाद से इसका कोई लेना-देना नहीं है. मैं ये इसलिए साफ कर रहा हूं, क्योंकि टीवी पर बार-बार इसे उसी से जोड़ा जा रहा है.

वो आगे कहते हैं-

हो सकता है कि जिस नेपाली गार्ड ने पहले फायरिंग की, वो अति-राष्ट्रवाद का शिकार हो और काठमांडू से आ रहे बयानों से उसे बल मिलता हो. ठीक उसी तरह, जैसे इस दूर-दराज के गांव में भी कई लोग अति-राष्ट्रवाद के रोग से ग्रसित हैं और दिल्ली से आने वाले कुछ बयानों से बल पाते हैं. बात-बात पर नारेबाजी और अलगाव की बात करने लगते हैं. भलाई इसी में है कि इस फायरिंग को नेपाल-भारत के मौजूदा नक़्शा विवाद या सीमा विवाद से न जोड़ा जाए. अगर ये उससे जुड़ गया और कहीं सीमा पर और सख़्ती बढ़ गई, तो दोनों तरफ़ के हजारों परिवार बिलट जाएंगे. बर्बाद हो जाएंगे.

भिखारी महतो अकेले नहीं हैं. फायरिंग के बाद इस घटना को जिस तरह से नेपाल-भारत के हालिया सीमा विवाद से जोड़ा जा रहा है, उससे सीमा के पास बसे कई गांव और शहर डरे हुए हैं. सबको डर है कि कहीं सख़्ती बढ़ गई, तो वो अपने खेतों में अनाज नहीं उपजा पाएंगे. बागीचों से आम, कटहल और जामुन नहीं तोड़ पाएंगे. अपने संबंधियों से बेरोक-टोक मिल नहीं पाएंगे.

सीमा पार से है बेटी-रोटी का संबंध

10 जून को नेपाल के ब्रह्मपुरी से एक बारात सीमा के इस पार सीतामढ़ी जिले के ही रीगा ब्लॉक के पटनिया गांव में आई. शादी हुई, लेकिन इसी बीच सीमा पर फायरिंग हो गई और दूल्हा-दुल्हन इसी तरफ फंस गए. वो हालात सामान्य होने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि अपने घर जा सकें. भारत-नेपाल सीमा से लगे हर गांव की यही कहानी है. इतना ही नहीं सोनबरसा की घटना ने दोनों देशों के सीमावर्ती बाजारों का व्यवसाय चौपट कर दिया है. खुली सीमा और बेरोकटोक आवाजाही के कारण नेपाली के महोत्तरी और धनुषा जिला तक के लोग अपने दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति को लेकर भारतीय बाजारों पर निर्भर थे. अब उनके कम आने से बाजारों की रौनक घट गयी है. साथ ही नेपाली लोगों की दैनिक जरूरतों की पूर्ति में भी परेशानी हो रही है.

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भारत-नेपाल सीमा से सटे गांवों का रिश्ता बतलाता है शादी का ये कार्ड. (फोटो: विकास कुमार)

बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जो रहते हैं सीमा के इस पार, लेकिन खेती-किसानी करने के लिए हर रोज उस तरफ जाते हैं. इंदरवा, सीतामढ़ी के ही सोनबरसा प्रखंड का एक गांव है. इस एक गांव का लगभग 400 एकड़ जमीन सीमा के उस तरफ है. सोनबरसा गांव के रहनिहार और स्थानीय जिला परिषद के प्रतिनिधि वीरेंद्र यादव कहते हैं-

नेपाल से लगी सीमा को भी भारत-पाकिस्तान बनाने की तैयारी दिख रही है. एक मामूली कहा-सुनी को लेकर हुई गोलीबाजी के बाद जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है, वो सीमा के दोनों तरफ रह रहे हजारों परिवारों को उजाड़ देगा. सब बर्बाद हो जाएंगे. सरकारों को संयम से काम लेना होगा. स्थानीय लोगों को सुरक्षा बलों से उलझना नहीं होगा. मीडिया के एक तबके को अपनी रिपोर्टिंग से आग भड़काना बंद करना होगा. अगर ये सब नहीं हुआ, तो इस इलाके की दुर्दशा निश्चित है.


रिपोर्ट- विकास कुमार


वीडियो- भारतीय सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने चीन-नेपाल सीमा विवाद पर क्या कहा?

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