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प्रशांत भूषण मामले पर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस कुरियन जोसेफ़ ने खरी-खरी बात कही

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को सुप्रीम कोर्ट ने ‘कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट’ का दोषी माना है. कोर्ट मामले पर 20 अगस्त को सजा सुनाएगा. मामला था दो ट्वीट का. इन ट्वीट को कोर्ट ने अदालत की अवमानना माना है. इस बीच तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं. अदालत से जुड़े लोगों ने पक्ष-विपक्ष में अपनी बात कही है. अब सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस कुरियन जोसेफ ने भी इस मामले पर एक बयान जारी किया है. उन्होंने कहा है कि मामले की सुनवाई पांच या सात जजों की संवैधानिक बेंच को करनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के 450 से ज्यादा वकीलों ने भी सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट को चिट्ठी लिख डाली.

न्यायमूर्ति जोसेफ ने सुझाव दिया है, “न्याय की विफलता की आशंका से भी बचना चाहिए”

# और क्या कहा रिटायर्ड जस्टिस ने?

उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति सीएस कर्नन के खिलाफ मुकदमे में अवमानना ​​का फैसला सात न्यायाधीशों की पीठ द्वारा पारित किया गया था. इस तरह के महत्वपूर्ण मामलों को कोर्ट के भीतर मौजूदगी में विस्तृत रूप से सुना जाना चाहिए, जहां व्यापक चर्चा और व्यापक भागीदारी की गुंजाइश हो.

रिटायर्ड जस्टिस जोसेफ़ ने न्याय की मूलभूत प्रणाली पर कहा-

‘भारत के सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने न्यायालय की अवमानना ​​के दायरे और सीमा पर कुछ गंभीर प्रश्नों को सुनने का निर्णय लिया है. भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक स्वत: संज्ञान मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को अंतर-अदालत की अपील का अवसर मिलना चाहिए, क्योंकि आपराधिक मामलों में सजा की अन्य सभी स्थितियों में, दोषी व्यक्ति के पास अपील के माध्यम से दूसरे अवसर का अधिकार है. अदालत की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 19 के तहत, एक अंतर-अदालत अपील प्रदान की जाती है, जहां उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश द्वारा आदेश पारित किया जाता है, तो मामले में डिवीजन बेंच सुनवाई करती है, जिसकी अपील भारत के सर्वोच्च न्यायालय में निहित है.

यह सुरक्षा शायद न्याय के अंत की आशंका से बचने के लिए भी प्रदान की गई है. क्या अन्य संवैधानिक न्यायालय, भारत के सर्वोच्च न्यायालय में भी इस तरह की सुरक्षा नहीं होनी चाहिए, जब एक स्वत: संज्ञान आपराधिक अवमानना ​​मामले में सजा हो?’

रिटायर्ड जस्टिस जोसेफ़ ने ये भी कहा-

‘न्याय किया जाना चाहिए, भले ही आसमान गिर पड़े’- ये न्यायालयों द्वारा न्याय के प्रशासन का मूलभूत आधार है. लेकिन अगर न्याय नहीं किया जाता है या न्याय विफल होता है, तो आसमान निश्चित रूप से गिर जाएगा. भारत के सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा नहीं होने देना चाहिए.

वर्तमान अवमानना ​​मामले केवल एक या दो व्यक्तियों से जुड़े नहीं हैं, बल्कि न्याय से संबंधित देश की अवधारणा और न्यायशास्त्र से संबंधित बड़े मुद्दे हैं. इन जैसे महत्वपूर्ण मामलों को शारीरिक मौजूदगी में विस्तृत रूप से सुना जाना चाहिए, जहां व्यापक चर्चा और व्यापक भागीदारी की गुंजाइश है. लोग आ सकते हैं और लोग जा सकते हैं, लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायालय को सर्वोच्च न्याय के न्यायालय के रूप में हमेशा के लिए रहना चाहिए.’

फ़िलहाल वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को सज़ा सुनाई जानी बाक़ी है. 20 अगस्त को कोर्ट अवमानना मामले में उन्हें सज़ा सुनाएगा.


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