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सरकार का मनमाना फैसला, जिसे विशाल भारद्वाज जैसे दिग्गज ने सिनेमा के लिए दुख का दिन बताया

FCAT यानी Film Certificate Appellate Tribunal को कानून मंत्रालय ने यकायक 6 अप्रैल 2021 को बंद कर दिया. कानून मंत्रालय ने नोटिस जारी करते हुए कहा कि अब से फ़िल्म निर्माता अगर CBFC (सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फ़िल्म सर्टिफिकेशन) के किसी फ़ैसले से असहमत होते हैं, तो वो FCAT के बजाय हाईकोर्ट जाकर अपनी याचिका दें. कानून मंत्रालय के इस फ़ैसले के बाद से कई फ़िल्ममेकर्स सोशल मीडिया पर अपना विरोध जता रहे हैं. आइए पूरे विस्तार से इस फ़ैसले के सभी पहलुओं को समझते हैं. जानते हैं कि FCAT क्या काम करता था? लेकिन उससे पहले हमें CBFC का कामकाज़ भी समझना होगा.

#क्या काम करता है CBFC?

फ़िल्म निर्माताओं को फ़िल्म रिलीज़ करने के लिए CBFC से सर्टिफिकेट लेना ज़रूरी होता है. जिसके लिए निर्माता अपनी फ़िल्म CBFC मेंबर्स को दिखाते हैं. जिसके बाद ज्यूरी फ़िल्म के कंटेंट के आधार पर तय करती है कि फ़िल्म को कौन सा सर्टिफिकेट देना है. अगर कोई फ़िल्म, मेंबर्स को रिलीज़ करने लायक ही नहीं लगती तो वो उस फ़िल्म को सर्टिफिकेट देने से मना भी कर देते हैं.

A सर्टिफिकेट – अगर फ़िल्म में गालियां, बहुत ज़्यादा हिंसा, नग्नता, सेक्स सीन्स होते हैं, तो फ़िल्म को A सर्टिफिकेट दिया जाता है. जिसका मतलब होता है ये फ़िल्म केवल वयस्कों के लिए है. (उदहारण- डेल्ही बेली, बैंडिट क्वीन…)

U/A सर्टिफिकेट – जिन फ़िल्मों में थोड़ी बहुत ही हिंसा या मामूली लव मेकिंग सीन्स होते हैं, उन फ़िल्मों को बोर्ड UA सर्टिफिकेट देता है. जिसका मतलब होता है कि ये फ़िल्म बच्चे भी देख सकते हैं. मगर माता-पिता की निगरानी में. (उदहारण- अग्निपथ, पद्मावत..)

इसके बाद U सर्टिफिकेट उन फ़िल्मों को दिया जाता है, जिसमें ज्यादा हिंसक या उतेजक सीन नहीं होते और जिसे पूरे परिवार के साथ देखा जा सकता है. (उदाहरण – गोलमाल, बर्फी..)

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अब ऐसे में कभी-कभार फ़िल्म निर्माताओं और CBFC मेम्बेर्स के बीच मतभेद हो जाते हैं. जैसे मेकर्स का मानना हो, उनकी फ़िल्म क्लीन है और हर उम्र का दर्शक देख सकता है, इसलिए उसकी फ़िल्म को U सर्टिफिकेट मिलना चाहिए. मगर CBFC के मुताबिक़ फ़िल्म में कुछ सीन्स बच्चों के देखने लायक नहीं हों और वो फ़िल्म को A सर्टिफिकेट दे रहे हों. ऐसे में रोल आता था  FCAT का. मेकर्स FCAT में जाकर अपना पक्ष रखते थे. और अगर FCAT मेंबर्स को फ़िल्म देख फ़िल्म मेकर्स के दावे में दम लगता था, तो वो CBFC को फ़िल्म को सही सर्टिफिकेट देने का आदेश देते थे.

जैसे 2016 में जब अनुराग कश्यप की फ़िल्म ‘उड़ता पंजाब’ को CBFC ने रिलीज़ करने से मना कर दिया था, तब अनुराग ने FCAT में ही जाकर गुहार लगाई थी. जिसके बाद FCAT ने मामले को देखा था. उनके आदेशानुसार फ़िल्म कुछ कट्स के बाद A सर्टिफिकेट के साथ रिलीज़ हुई थी. ऐसे ही 2017 में जब CBFC ने अलंकृता श्रीवास्तव की फ़िल्म ‘लिपस्टिक अंडर माय बुरखा’ को सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया, तब अलंकृता भी FCAT गईं. और FCAT ने CBFC को A सर्टिफिकेट देने के आदेश दिए. ‘साहेब बीवी और गैंगस्टर, ‘हरामखोर’ जैसी और भी कई फिल्में हैं, जो FCAT के बदौलत ही रिलीज़ हो पाईं हैं.

# बैंडिट क्वीन की सेंसरबोर्ड से जंग 

FCAT की अहमियत का सबसे बड़ा उदहारण है फ़िल्म ‘बैंडिट क्वीन’. जब शेखर कपूर अपनी इस फ़िल्म को लेकर CBFC में गए थे, तब CBFC ने पूरी फ़िल्म में हिंसा और अश्लीलता का हवाला देते हुए सौ से ऊपर कट लगा दिए थे. अपनी पूरी फ़िल्म छंटती देख शेखर कपूर FCAT गए और फ़िल्म के साथ न्याय करने की मांग की. तब बॉम्बे हाईकोर्ट के जज लेंटिन जे और FCAT की तीन मेंबर्स सारा मोहम्मद, सरयू वी दोषी और रीना कुमारी ने बैठकर फ़िल्म देखी. फ़िल्म देखने के बाद उन्होंने CBFC को बिना कोई सीन काटे A सर्टिफिकेट देकर फ़िल्म रिलीज़ करने के आदेश दिए. उस वक़्त जज लेंटिन जे ने CBFC के प्रवक्ता से मज़ाकिया अंदाज़ में कहा था, “आपको सरकार रोम तो भेजेगी नहीं. एक काम कीजिए, खुजराहो ही हो आइए. ताकि आपको निर्वस्त्रता, नग्नता और अश्लीलता के बीच का फर्क समझ आ जाए.”

 Bandit Queen के रोल में सीमा बिस्वास.
Bandit Queen के रोल में सीमा बिस्वास.

# अब मिलेगी तो सिर्फ तारीख

तो इतनी ज़रूरी FCAT को भंग कर दिया गया है. अब अगर फ़िल्म मेकर्स CBFC के किसी फ़ैसले से असहमत होते हैं, तो उन्हें कोर्ट के चक्कर लगाने होंगे. यहां कई सवाल उठ खड़े होते हैं. कोर्ट में कोई बेहद अर्जेंट मसला न हो, तो जल्दी तारीख नहीं मिलती. ऐसे में कोई बड़ी फिल्म का निर्माता तो रसूख से जल्द सुनवाई करा लेगा, लेकिन अगर किसी छोटी फिल्म के मसले को कोर्ट ने अर्जेंट नहीं माना तो? उसके मेकर्स तो कोर्ट के चक्कर काटने में ही खर्च ही जाएंगे. एक सवाल ये भी है कि क्या जज साब ऐसे तमाम केसेस में दो-तीन घंटे की फ़िल्म देखना अफोर्ड कर पाएंगे? दूसरी बात फ़िल्मों का आंकलन करने के लिए फ़िल्म की समझ होना भी बेहद ज़रूरी है. ऐसे में कचहरी में कानून की समझ रखने वाले जज साब फिल्मों को कला के तराजू पर क्या उचित ढंग से तौल पाएंगे?

अजीत निनान का ये कार्टून काफ़ी दूरदर्शी निकला.
अजीत निनान का ये कार्टून काफ़ी दूरदर्शी निकला.

#फ़िल्ममेकर्स की नाराज़गी

FCAT भंग होने की खबर आने के बाद कई फ़िल्ममेकर्स ने अपनी नाराज़गी सोशल मीडिया के ज़रिये जताई. ‘ओमकारा’,’हैदर’ जैसी फिल्मों के डायरेक्टर विशाल भरद्वाज ने ट्वीट कर लिखा,

सिनेमा के लिए सबसे दुखद दिन. 6 अप्रैल 2021.

‘स्कैम 1992′,’शाहिद’ जैसी फ़िल्मों और सीरीज के डायरेक्टर हंसल मेहता ने भी ट्विटर पर अपनी नाराज़गी व्यक्त करते हुए लिखा, क्या हाईकोर्ट के पास इतना ज्यादा वक़्त है कि वो फिल्मों का सर्टिफिकेशन करे ? कितने निर्माता कोर्ट जाने में सक्षम होंगे? FCAT का भंग होना बिलकुल ही एकपक्षीय और मनमाना फ़ैसला है. वो भी इस वक़्त क्यों? ये फ़ैसला आखिर लिया ही क्यों ?  


ये स्टोरी दी लल्लनटॉप में इंटर्नशिप कर रहे शुभम ने लिखी है.


वीडियो: एक्ट्रेस महिमा चौधरी ने बताया उनके एक्सीडेंट के बाद मीडिया ने कैसी-कैसी बातें की!

 

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