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71 दिन बाद एक बड़ा शहर प्यास से तड़पकर मर जाएगा!

दुनिया में आज तक पैदा हुए अरबों लोगों में से सबसे ज्यादा समझदार कौन था? कौन था, जो सबसे ज्यादा दूरदर्शी था?

मेरे पास इस सवाल का जवाब है. वो इंसान, जिसने ‘जल बिन सब सून’ की कहावत कही होगी? क्या उसे मालूम रहा होगा कि आने वाले वक्त में लोग पानी को तरसेंगे? कि ऐसा वक्त भी आएगा जब जमीन पानी देगी और न आसमान पानी बरसाएगा! जब चांद-तारों से आगे जाने वाली इंसानी नस्ल के सामने पानी के लिए तड़प-तड़पकर मरने की नौबत आ जाएगी! जैसी नौबत केपटाउन शहर के सामने आ गई है.

12 अप्रैल तक बारिश हो जाए, तो थोड़ी जान में जान आएगी. वरना उसके बाद जो होगा, वो बहुत मुश्किल होगा. आप बाहर से कितना पानी मंगवाएंगे? वो भी इतने बड़े शहर के लिए? और ऐसा भी नहीं कि दक्षिण अफ्रीका के बाकी शहरों की हालत कोई बहुत अच्छी हो. पिछले तीन साल से यहां सूखा पड़ रहा है.
12 अप्रैल तक बारिश हो जाए, तो थोड़ी जान में जान आएगी. वरना उसके बाद जो होगा, वो बहुत मुश्किल होगा. आप बाहर से कितना पानी मंगवाएंगे? वो भी इतने बड़े शहर के लिए? और ऐसा भी नहीं कि दक्षिण अफ्रीका के बाकी शहरों की हालत कोई बहुत अच्छी हो. पिछले तीन साल से यहां सूखा पड़ रहा है.

12 अप्रैल को केपटाउन का पानी खत्म हो जाएगा
विज्ञान वाली फिल्में हमें अक्सर ऐसे दिन दिखाती हैं. कि जल्द ही ऐसा दिन आएगा. जब न सांस लेने को हवा मिलेगी और न पीने को पानी होगा. आएदिन ऐसे रिसर्च आते हैं. हमें थोड़ा डर लगता है, मगर फिर मन में आता है कि इंसान कुछ न कुछ जुगाड़ तो खोज ही लेगा. अगर आपको ऐसा लगता है, तो आपको दक्षिण अफ्रीका का हाल देखना चाहिए. वहां केपटाउन नाम का शहर है. 12 अप्रैल को उस शहर का पानी खत्म हो जाएगा. अगर बारिश नहीं हुई, तो इस दिन से पानी की सप्लाई बंद हो जाएगी. इस दिन को ‘डे जीरो’ का नाम दिया गया है. इसके बाद लोगों के घर में लगा नल पानी नहीं देगा.

ये कोई मैदान नहीं है. यहां नदी बहा करती थी. पिछले तीन साल से पड़ रहे सूखे ने नदी को भी सुखा दिया.
ये कोई मैदान नहीं है. यहां नदी बहा करती थी. पिछले तीन साल से पड़ रहे सूखे ने नदी को भी सुखा दिया.

सदी का सबसे भयानक सूखा
इस दिन से शहर के किसी भी नल में पानी नहीं आएगा. लोग अपने घर से गैलन लेकर निकलेंगे. वहां जाएंगे, जहां सरकार पानी बांटेगी. थोड़ा-थोड़ा. ऐसा कब तक चलेगा, कोई नहीं बता सकता. पिछले तीन साल से पड़ रहे सूखे ने वहां लोगों को इस हाल में पटक दिया है. ये सूखा पिछली एक सदी में आया सबसे बुरा सूखा है. केपटाउन दुनिया का पहला ऐसा शहर है जिसे ऐसे दिन देखने पड़ रहे हैं. मगर वो अकेला नहीं रहेगा. अगर हम इंसान अब भी नहीं चेते, तो जल्द ही पूरी दुनिया केपटाउन जैसी हालत में नजर आएगी.

किसी जगह का एक खास भूगोल होता है. उसी के मुताबिक मौसम और जलवायु होती है. इसके मुताबिक प्लानिंग करने पर हालात को फिर भी काबू में रखा जा सकता है. पिछले तीन साल सूखा पड़ रहा था, फिर गन्ने और मक्के जैसी फसलों की खेती बंद क्यों नहीं की गई. इनकी खेती में बहुत ज्यादा पानी खर्च होता है.
किसी जगह का एक खास भूगोल होता है. इसके मुताबिक प्लानिंग करने पर हालात को फिर भी काबू में रखा जा सकता है. पिछले तीन साल से दक्षिण अफ्रीका में सूखा पड़ रहा था. ऐसे में गन्ने और मक्के जैसी फसलों की खेती बंद कर देनी चाहिए थी. इनकी खेती में बहुत ज्यादा पानी खर्च होता है.

काश बारिश हो जाए…
दक्षिण अफ्रीका के बाकी शहरों का हाल भी कुछ अच्छा नहीं है. लेसोथो नाम की एक जगह है यहां. पहाड़ों के ऊपर. राजशाही है यहां. चारों ओर से दक्षिण अफ्रीका से घिरा हुआ. जोहेन्सबर्ग, प्रीटोरिया और साउथ अफ्रीका की ज्यादातर इंडस्ट्रियों को जो पानी मिलता है, वो लेसोथो से ही जाता है. सूखे की वजह से यहां बांध में पानी दिनोदिन तेजी से घटता जा रहा है. जो बचा है, वो भी खत्म होने की कगार पर है. लेसोथो में पानी खत्म होना पूरे साउथ अफ्रीका के लिए खतरे की घंटी है. कुछ लोग सलाह दे रहे हैं कि यहां का पानी फिलहाल बचाकर रखा जाए. ताकि और बुरी स्थिति आने पर उसे इस्तेमाल किया जा सके. मगर सरकार मजबूरी में लेसोथो के बांधों का सहारा ले रही है. उसे उम्मीद है कि शायद आने वाले दिनों में बारिश हो जाए और हालत सुधरे.

दक्षिण अफ्रीका में नवंबर आमतौर पर भी बेहद गर्म होते हैं. मगर इस साल ये सामान्य से भी बहुत ज्यादा गर्म था. कई महीने पहले ही मौसम विभाग ने इसकी भविष्यवाणी कर दी थी. ये भी बताया गया था कि प्रशांत महासागर में 'अल नीनो' डिवेलप हो रहा है और इसके कारण बारिश की संभावनाएं और मर जाएंगी.
दक्षिण अफ्रीका में नवंबर आमतौर पर भी बेहद गर्म होते हैं. मगर इस साल ये सामान्य से भी बहुत ज्यादा गर्म था. कई महीने पहले ही मौसम विभाग ने इसकी भविष्यवाणी कर दी थी. ये भी बताया गया था कि प्रशांत महासागर में ‘अल नीनो’ डिवेलप हो रहा है और इसके कारण बारिश की संभावनाएं और मर जाएंगी.

‘डे जीरो’ के बाद क्या होगा?
सरकार लोगों से पानी के इस्तेमाल में कंजूसी बरतने की अपील कर रही है. ‘डे जीरो’ के बाद क्या होगा, सरकार इसकी तैयारियों में जुटी है. पानी की बर्बादी रोकने के लिए सख्त कानून बनाए गए हैं. फिलहाल लोगों को दिन का 50 लीटर पानी मिल रहा है. इसी में नहाना, धोना, खाना, पीना सब करना है. अगर कोई इससे ज्यादा पानी खर्च करता मिलेगा, तो उसे सजा दी जाएगी.

केपटाउन और दक्षिण अफ्रीका की हालत देखकर ये सोचना कि ये हजारों किलोमीटर दूर की बात है, बेवकूफी होगी. मौसम का मिजाज पूरी दुनिया में बदल रहा है. बारिश के समय बारिश नहीं होती. सहारा रेगिस्तान और सऊदी अरब में बर्फबारी हो जाती है. गर्मी के मौसम में कुछ जगहों का तापमान 53-54 डिग्री तक पहुंच जाता है. ये सब जलवायु परिवर्तन की तस्वीरें हैं.
मौसम का मिजाज पूरी दुनिया में बदल रहा है. बारिश के समय बारिश नहीं होती. सहारा रेगिस्तान और सऊदी अरब में बर्फबारी हो जाती है. गर्मी के मौसम में कुछ जगहों का तापमान 53-54 डिग्री तक पहुंच जाता है. ये सब जलवायु परिवर्तन की तस्वीरें हैं. जहां तक दक्षिण अफ्रीका की बात है, तो वहां तय सीमा से ज्यादा पानी खर्च करने वालों पर कानूनी कार्रवाई हो रही है.

अब नहीं सुधरे, तो संभलने का मौका नहीं मिलेगा
लोग बहुत आगे के सपने देखते हैं. अच्छा-अच्छा सोचते हैं. मगर सच तो ये है कि आज से 10 साल बाद जीवन कैसा होगा, इसे भी ठीक-ठीक बता पाना मुश्किल है. ‘जलवायु परिवर्तन’ और ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ हमारा और इस धरती का बहुत बुरा हाल करने वाले हैं. हम अब भी नहीं सुधरे, तो फिर चीजें सुधारने का मौका नहीं बचेगा. संभलने का मौका हम खो देंगे.


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