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'माओवादी' बताकर CRPF ने 8 आदिवासियों का एनकाउंटर किया था, 8 साल बाद ये 'एक भूल' साबित हुई है

वाकया 17-18 मई, 2013 की दरम्यानी रात का है. छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के एडेसमेट्टा में आदिवासी ग्रामीण बीज पांडम त्योहार मनाने जुटे थे. तभी CRPF की कोबरा यूनिट के जवानों ने उस समूह पर हमला कर दिया. CRPF का दावा था कि ये लोग माओवादी थे. इस हमले को माओवादी एनकाउंटर कहा गया, जिसमें 4 नाबालिगों सहित 8 लोगों की मौत हुई थी. लेकिन 8 साल बाद अब इस कथित एनकाउंटर को एक ‘भूल बताया’ गया है.

दरअसल, बुधवार 8 सितंबर को छत्तीसगढ़ सरकार को इस घटना से जुड़ी एक न्यायिक जांच रिपोर्ट सौंपी गई. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, जांच करने वाले मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस वीके अग्रवाल ने रिपोर्ट में कहा है कि इस कथित एनकाउंटर में मारा गया कोई भी व्यक्ति माओवादी नहीं था और ये हमला ‘एक भूल थी.

अब सवाल उठता है कि क्या CRPF के जवानों ने पीड़ित ग्रामीणों की हत्या की. रिपोर्ट में कुछ अलग बात कही गई है. अखबार के मुताबिक, जस्टिस वीके अग्रवाल ने की रिपोर्ट कहती है कि सुरक्षाकर्मियों ने ‘घबराहट में गोलियां चलाई होंगी’. हालांकि पूर्व न्यायाधीश ने CRPF के कामकाज पर सवाल खड़े किए हैं.

रिपोर्ट में 3 बार ‘गलती’ शब्द का ज़िक्र

रिपोर्ट के मुताबिक़, 17 मई 2013 की रात को 25-30 लोग आदिवासी त्योहार बीज पांडम मनाने के लिए इकट्ठा हुए थे. तभी बहुत बड़ी संख्या में CPRF के सुरक्षाकर्मी वहां पहुंचे. CRPF ने दावा किया था कि उसकी टीम पर हमला किया गया था, जिसकी जवाबी कार्रवाई में जवानों ने गोलीबारी की. इसमें कुल 9 लोगों की मौत हुई थी. मरने वालों में 8 ग्रामीण और एक कान्स्टेबल शामिल था.

प्रतीकात्मक तस्वीर.
प्रतीकात्मक तस्वीर.

रिपोर्ट में इस कथित एनकाउंटर को तीन बार “गलती” बताया गया है. न्यायमूर्ति अग्रवाल ने कहा है कि मारे गए आदिवासी निहत्थे थे और उन पर 44 राउंड फ़ायरिंग की गई थी. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, 18 गोलियां तो एक ही कोबरा कांस्टेबल ने चलाई थीं. रिपोर्ट में फायरिंग की घटना को ‘गलत धारणा और घबराहट की प्रतिक्रिया’ का परिणाम बताया गया है.

रिपोर्ट में आगे कहा गया है,

‘अगर सुरक्षा बलों को आत्मरक्षा के लिए पर्याप्त गैजेट दिए जाते, अगर उनके पास बेहतर जमीनी खुफिया जानकारी होती और वे सावधान रहते तो घटना को टाला जा सकता था.’

रिपोर्ट के सारांश में भी यही कहा गया है,

‘सुरक्षा बलों के पास आत्मरक्षा के लिए पर्याप्त उपकरण नहीं थे. खुफिया जानकारी की कमी थी. यही वजह है आत्मरक्षा और ‘घबराहट’ में गोलीबारी की गई.’

Cobra Commando
CPRF का एक कोबरा कमांडो. (प्रतीकात्मक तस्वीर- आजतक)

कान्स्टेबल की मौत ‘फ़्रेंड्ली फ़ायर’ में हुई

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि ग्रामीणों की तरफ से कोई क्रॉस-फायर नहीं हुआ था और कोबरा कांस्टेबल देव प्रकाश की मौत ‘फ़्रेंड्ली फ़ायर’ के कारण हुई थी, ना कि ‘माओवादियों’ की गोली से.

रिपोर्ट के मुताबिक, घटना को लेकर एक ग्रामीण करम मंगलू ने दावा किया था कि उसने CPRF के लोगों को फ़ायरिंग रोकने की बात कहते सुना था. उसने कहा था,

‘जब फायरिंग चल रही थी, हमने अचानक उन्हें चिल्लाते हुए सुना, ‘रोको फायरिंग, हमारे एक आदमी को गोली लगी है.’

CRPF के काम में कई ख़ामियां

रिपोर्ट में कहा गया है कि मौके से CRPF ने दो राइफलें जब्त करने का बात कही थी. लेकिन कान्स्टेबल देव प्रकाश के सिर में गोली उन राइफ़ल से नहीं लगी थी. रिपोर्ट में इन राइफलों की ज़ब्ती को ‘संदिग्ध’ और ‘अविश्वसनीय’ बताया गया है. साथ ही CRPF अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा गया है कि कोई भी बरामद सामान फोरेंसिक लैब में नहीं भेजा गया.

रिपोर्ट में आगे लिखा है,

‘ऑपरेशन के पीछे कोई मजबूत खुफिया जानकारी नहीं थी. इकट्ठे हुए लोगों में से किसी के पास हथियार नहीं थे और ना ही वे माओवादी संगठन के सदस्य थे.’

खबर के मुताबिक़, जस्टिस वीके अग्रवाल की रिपोर्ट को छत्तीसगढ़ कैबिनेट ने स्वीकृति दे दी है.

यहां बता दें कि मई 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान आदेश दिया था कि इस घटना की जांच सीबीआई से कराई जाए. ये जांच अभी चल रही है.

ऐसे और भी मामले हैं

माओवादी का ठप्पा लगाकर आदिवासियों को मारने का ये अकेला मामला नहीं है. कड़वी हकीकत ये है कि ऐसी घटनाओं को लेकर सुरक्षा बल सवालों के घेरे में रहे हैं. मिसाल के लिए 2012 में सरकेगुडा में हुई घटना को लेते हैं. एडेसमेट्टा की तरह, सरकेगुडा ज़िले में जून 2012 में बीज पांडम समारोह के लिए भी लोग एकत्र हुए थे. वहां भी सुरक्षा बलों ने हमला किया था. इसमें नाबालिगों समेत 17 लोगों को मौत हुई थी.

सरकेगुडा मामले में भी जस्टिस वीके अग्रवाल ने ही जांच रिपोर्ट छत्तीसगढ़ सरकार को सौंपी है. इसमें भी सुरक्षाकर्मियों की गलती बताई गई है. हालांकि, इस रिपोर्ट पर राज्य सरकार ने अब तक मुहर नहीं लगाई है.


वीडियो- छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्यों बैठे हैं पुलिस के विरोध में?

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