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चांदनी चौक का ये लड़का वर्ल्ड फ्यूजन म्यूजिक का बड़ा नाम बन गया

जैज़ म्यूजिक का नाम सुना है? हां, हमने भी बस नाम ही सुना है. ये एक्चुअली एक म्यूजिकल फॉर्म है. इसी स्टाइल का एक डांस भी है. अगर आपको याद हो तो ये वही ‘जाज़’ डांस है जो इंग्लिश-विंग्लिश फिल्म में श्रीदेवी की बेटी सीखती है. लेकिन यहां बात डांस की नहीं म्यूजिक की हो रही है. दो म्यूजिकल फॉर्म ‘ब्लूज’ और ‘रैगटाइम’ से मिलकर बने इस जैज म्यूजिक की जड़ें अमेरिका में रहने वाली अफ़्रीकी-अमरीकी समुदाय से जुड़ी है. हालांकि अब ये शैली संगीत का अभिन्न अंग बन चुकी है और इसे विश्व भर में सुना जाता है. लेकिन इसके एक लीजेंड भारत से जुड़े हुए थे. जॉन मेयर नाम था उनका. इस म्यूजिकल फॉर्म में भारतीय संगीत का पुट मिला कर उन्होंने इसे ‘इंडो-जैज फ्यूज़न’ नाम दे दिया. और अपनी इस खास स्टाइल की वजह विश्व भर में जाने गए. इन्हें जैज-फ्यूज़न का जनक माना जाता है. लेकिन हमारे लिए उनसे जुड़ी जो सबसे खास बात है वो ये की वो कलकत्ता में पैदा हुए थे.

पैदाइश और शुरूआती जीवन

दिल्ली जैसे कलकत्ता में भी चांदनी चौक नाम का एक इलाका है. ब्रिटिश राज में वहां काफी अंग्रेज़ रहते थे. 28 अक्टूबर, 1930 को जॉन मेयर का जन्म उसी इलाके के एंग्लो-इंडियन परिवार में हुआ था. बचपन से ही गरीबी झेलने वाले इस बालक को संगीत से बेहद लगाव था. अपने इसी शौक के लिए वो बचपन से ही चर्च और थिएटर में वायलिन बजाते थे. लेकिन ये बात उनके माता-पिता को कतई पसंद नहीं थी. संगीत का ठोस ज्ञान उन्हें एक अच्छा संगीतकार बनने में मदद करेगा, इसी सोच के साथ उन्होंने अपने स्कूल में इंडियन और वेस्टर्न संगीत का विषय चुना.

चांदनी चौक मेटर स्टेशन कलकत्ता Source- Wikipedia
चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन कलकत्ता Source- Wikipedia

जॉन के पास स्कूल की फीस देने के लिए पैसे नहीं थे. लेकिन उनमे सीखने की ललक देखकर एक फ्रेंच टीचर उन्हें बिना किसी फीस के पढ़ाने लगे. और कभी-कभी तो स्कूल के बाद भी पढ़ाते थे. यहां से उनके संगीत का सफ़र शुरू हुआ. इसके बाद वो बम्बई चले गए और उस समय के मशहूर वायलिन वादक, ‘बॉम्बे सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा’ के संस्थापक और मशहूर संगीतकार जुबिन मेहता के पिता मेहली मेहता से वायलिन सीखने लगे. उन्हें वहां मेहली के सबसे अच्छे स्टूडेंट में से गिना जाता था. लेकिन उन्हें यहीं नहीं रुकना था. मेहली के यहां सीखने के दौरान ही बंबई के एक जैज बैंड में ड्रम बजाने लगे. क्योंकि उन्हें संगीत के अलग-अलग शैलियों के बारे में जानना था. ये सब करते रहने के दौरान ही मेहली की सलाह पर वे लंदन के रॉयल स्कूल ऑफ़ म्यूजिक के संपर्क में आये. यहां से 1952 में उन्हें स्कॉलरशिप मिलने लगी. अब उनका जो वक़्त पैसे कमाने में जाता था वो भी संगीत में ही लगने लगा. जिसका उपयोग उन्होंने अपने संगीत को और समृद्द बनाने के लिए  किया.

जुबिन मेहता अपने पिता के साथ.
जुबिन मेहता अपने पिता के साथ.

म्यूजिक फ्यूज़न का आईडिया

रॉयल स्कूल ऑफ़ म्यूजिक में उन्हें तुलनात्मक संगीत देखने और सीखने को मिला. इस तरह के संगीत में दो या दो से ज्यादा क्षेत्रों के संगीत के बीच तुलना की जाती है. जिसके बाद जॉन को म्यूजिक फ्यूज़न का आईडिया आया. 1953 से 1958 तक वे लंदन फिल्हार्मोनिक ऑर्केस्ट्रा में वायलिन प्ले करते थे. उसी दौरान एक अन्य संगीतकार येहुदी मेनुहिन ने जॉन के मशहूर ‘सोनाटा वायलिन’ पर बेहद ख़ूबसूरत परफॉरमेंस दिया. जिसके बाद इन्हें जानने वालों की तादाद बढ़ गई. हालांकि 1958 के बाद उन्होंने फिल्हार्मोनिक ऑर्केस्ट्रा छोड़ दिया और रॉयल फिल्हार्मोनिक चले गए. वहां उनकी मौजूदगी भर से ही वहां के अन्य कलाकार अभिभूत हो गए. जॉन को अब लोग जानने लगे थे. जिसके कारण उनका करियर अब ऊपर उठ रहा था.

कम्पोजीशन की शुरुआत

उनकी रॉयल स्कूल ऑफ़ म्यूजिक के दौरान बनाई भारत और पश्चिमी संगीत के फ्यूज़न ‘रागा म्यूजिक’ के बाद बड़े संगीतकारों की नज़र भी उनपर पड़ी. लेकिन प्रोफेशनल कम्पोजीशन का मौका उन्हें साल 1964 में मिला जब मशहूर म्यूजिक प्रोड्यूसर डेनिस प्रेस्टन ने उन्हें अप्रोच किया. डेनिस उस वक़्त अटलांटिक रिकार्ड्स के लिए एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे. डेनिस ने जॉन से एक छोटी जैज पीस तैयार करने को कहा जिसका इस्तेमाल वो अपने आने वाले एल्बम में करना चाहते थे. लेकिन समस्या ये थी की उन्हें वो पीस अगले दिन ही रिकॉर्ड करना था. जॉन के लिए ये बड़ा मौका था और वो इसे हाथ से जाने नही देना चाहते थे. उन्होने रात भर जागकर वो धुन तैयार की और अगले दिन रिकॉर्ड भी करवा दिया.

लेकिन 6 महीने बाद उन्हें प्रेस्टन ने बताया की अटलांटिक रिकार्ड्स के मालिक को उनका वो पीस बहुत पसंद आया और वो उनके साथ एक फ्यूज़न एल्बम करना चाहते हैं. जिसमे इंडियन पार्ट के लिए उन्हें पंचक का इस्तेमाल करना था. इस फ्यूज़न एल्बम में जॉन को इंडियन और जो हैरिअट को वेस्टर्न वाला हिस्सा करना था. इस एल्बम में इनके एक और पार्टनर भी थे जिसका नाम रिक लैर्ड था. ये वही रिक थे जो आगे चलकर महाविष्णु ऑर्केस्ट्रा के बेस प्लेयर बने.

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इस एल्बम के बाद जॉन और जो की जोड़ी ने ढेरों गाने साथ में किये. इनकी बनाई हुई धुन ‘अक्का राग’ का इस्तेमाल बीबीसी के क्विज शो ‘आस्क द फैमिली’ के लिए भी किया गया था. ये शो साल 1967 से 1984 के बीच प्रसारित होता था. जॉन मेयर ने ढेरों गाने कंपोज़ किये हैं, जिनमे ‘शांता चौरागा’, ‘मंडल की राग संगीत’, ‘प्रभांद’, ‘कलकत्ता नगर’, ‘मुल्तानी’, ‘रागमाला’, और ‘कॉस्मिक आई’ खास हैं.

अपने जिंदगी के आखिर तक वो इंग्लैंड में ही रहे. 09 मार्च, 2004 को गाड़ी से धक्का लगने की वजह से उनकी मौत हो गयी. इनकी मौत के बाद इनके 3 स्टूडेंट्स ने इनके बैंड को जिंदा रखा. वो नियमित अंतराल पर इस बैंड से परफॉरमेंस करते रहते हैं. ये उनकी तरफ से जॉन को एक ट्रिब्यूट है.


ये स्टोरी श्वेतांक शेखर ने की है.


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