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किसका डर है कि अयोध्या मसले में सुन्नी वक्फ बोर्ड रिव्यू पिटीशन नहीं फ़ाइल कर रहा?

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अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है. विवादित ज़मीन मंदिर पक्ष को. सरकार को आदेश कि तीन महीनों में कमिटी बनाए. ट्रस्ट बने. मंदिर का निर्माण ट्रस्ट के अधीन. बाकी मुस्लिम पक्ष के लिए ये फैसला कि उन्हें अयोध्या में पांच एकड़ की ज़मीन दी जाए. फिर वे मस्जिद बना सकते हैं.

इस फैसले से थोड़ी नाराज़गी है. मुख्य मुस्लिम पक्ष सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड ने तो कह दिया कि हम सुप्रीम कोर्ट में फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए याचिका नहीं दायर करेंगे. नो टू रिव्यू पिटीशन. अब मामला आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने हाथों में ले लिया. कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड करे न करे, हम तो पुनर्विचार याचिका दायर करेंगे.

ठीक है. लेकिन क्या ठीक है? मामला बढ़ गया. सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन ज़ुफार फारूक़ी ने तो कह दिया था कि वो रिव्यू पिटीशन नहीं फ़ाइल करना चाहते. अदालत का फैसला मंज़ूर. लेकिन अब जो बातें सामने आ रही है, पता चल रहा है कि शायद कोई डर है, कोई बात है, जो ज़ुफार फारूक़ी को डरा रही है, और यही कारण है कि ज़ुफार फ़ारूकी इस मामले में रिव्यू पिटीशन फ़ाइल नहीं करने का निर्णय ले चुके हैं.

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किस बात का डर? बोर्ड के सदस्य और इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील इमरान माबूद खान ने इन्डियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा है,

“फारूक़ी ने वक्फ की कई सम्पत्तियों को गैर कानूनी तरीके से ट्रांसफर किया है. वे दबाव में हैं कि अगर उन्होंने रिव्यू पिटीशन फ़ाइल करने का निर्णय लिया तो उनके खिलाफ जांच बिठा दी जाएगी. इसलिए वो पूरी कोशिश करेंगे कि बोर्ड रिव्यू पिटीशन फ़ाइल न करे.”

हाल में ही फारूक़ी पर यूपी में दो बड़े मुक़दमे दर्ज किये गए हैं. उनके खिलाफ पहला केस इस साल अगस्त 19 को रामपुर में दर्ज किया गया. आज़िम नगर थाने में दर्ज इस FIR के मुताबिक़, फारूक़ी के 86 बीघे की शत्रु संपत्ति पर क़ब्ज़ा कर लिया. इस FIR में उनके अलावा 8 और लोगों के नाम दर्ज हैं. वहीं दूसरी FIR कोतवाली थाने में दर्ज की गयी है. इसमें उनके और अन्य लोगों के खिलाफ शिकायतकर्ता नसीमा ख़ातून के पति के साथ मारपीट करने और उन्हें उनके घर से बेदखल करने का मामला दर्ज किया गया.

माबूद खान ने कहा,

“अगर पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि वो इस मामले में रिव्यू पिटीशन फ़ाइल करेगा तो सुन्नी वक्फ बोर्ड को समर्थन करना चाहिए. हो सकता ही कि रिव्यू पिटीशन कोर्ट में टिक न पाए, लेकिन फ़ाइल ज़रूर किया जाना चाहिए.”

माबूद खान ही नहीं. सुन्नी वक्फ बोर्ड के अन्य सदस्य अब्दुल रज्ज़ाक खान ने भी आजतक से बातचीत में कहा है,

“चेयरमैन ने अपना बयान दिया है. ये चेयरमैन का अपना सोचना है. ये बोर्ड का फैसला नहीं है. बोर्ड की मीटिंग 26 नवंबर को होनी है. इस मीटिंग के बाद हम बोर्ड अपना रास्ता तय करेगा. लेकिन मेरे हिसाब से बोर्ड को इस मामले में रिव्यू पिटीशन फ़ाइल करना चाहिए.”

लेकिन ज़ुफार फारूक़ी ने इस मामले में किसी भय या प्रेशर की मौजूदगी के इंकार कर दिया. उन्होंने कहा,

“बहुत सारे लोग तो कह रहे हैं कि रिव्यू पिटीशन नहीं फ़ाइल किया जाना चाहिए. क्या वो सब लोग प्रेशर में हैं? जो केस मेरे खिलाफ दायर किये गए हैं, वे सारे केस राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं. और उन केसों का इस मामले से कोई लेना देना नहीं है. और अगर मैं सच में डरा हुआ होता, तो मैं इस मामले से दावा वापिस लेने की याचिका दायर कर चुका होता.”

New Delhi: All India Babri Masjid Action Committee (aibmac) Convener And Sunni Waqf Board's Advocate Zafaryab Jilani Talks To The Media Outside The Supreme Court After The Hearing In Ayodhya Title Dispute Case Came To An End, In New Delhi On Oct 16, 2019. After 40 Days Of Hearing, The Supreme Court On Wednesday Reserved The Judgement In The 70 Year Old Politically Vexing Ayodhya Title Dispute. The Court Now Has Asked Counsel From Both Sides To Submit Their Written Submissions On The Moulding Of Relief In The Matter. (photo: Ians)
ज़फरयाब जिलानी. | IANS

इस मामले में हमें सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से केस लड़ रहे वकील ज़फ़रयाब जीलानी से बात की. उन्होंने कहा,

“जब से मैंने AIMPLB के साथ रिव्यू पिटीशन फ़ाइल करने की बात की है, तब से हमारे और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बातचीत नहीं हो सकी है. वे रिव्यू पिटीशन नहीं फ़ाइल करना चाहते हैं, ये उनका फैसला है. मैं इस पर और कुछ नहीं कहना चाहता हूं.”

आगामी 26 नवम्बर में सुन्नी वक्फ बोर्ड की बड़ी मीटिंग होगी, जिस मीटिंग में ये डिसाइड किया जाएगा कि क्या सुनी वक्फ बोर्ड इस मामले में रिव्यू पिटीशन फ़ाइल करेगा? उसके बाद ही तस्वीर थोड़ी साफ़ हो सकेगी.


लल्लनटॉप वीडियो : क्या होती है पुनर्विचार याचिका और कौन इसे दाख़िल कर सकता है?

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