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यूपी-बिहार के कई शहरों में क्यों नहीं रिलीज़ हो पाई फिल्म Article 15?

पुराने पुरखों ने सिखाया था कि झूठ के पांव नहीं होते. माने झूठ चल नहीं सकता. लेकिन हमने थोड़ी उम्र गुज़ारकर देखा कि वाक़ई झूठ के पांव नहीं होते. पंख होते हैं. झूठ को अब रेंगने चलने दौड़ने की ज़रूरत नहीं. वो तो आज़ादी के बाद हौले-हौले आसमान का बादशाह बन बैठा है. सच चलता घिसटता रहता है. लेकिन ज़मीन पर रहने वाले लोग हमेशा आसमान की मानते हैं. इसीलिए उनके भगवान भी आसमान में रहते हैं. दूर ऊपर.

कभी-कभी ही सही लेकिन इन आसमानी ताक़तों को कुछ सच चुनौती देते हैं. रेंगते घिसटते ही सही. लेकिन उड़ते हुए झूठ को उसकी हैसियत याद दिलाते हैं. ये काम ज़्यादातर कला और कलाकार करते आए हैं. दुनिया भर में. जब सब डरे हों तो कविता हिम्मत देती है, गीत जोश भरते हैं. फ़िल्में रास्ता दिखाती हैं. ऐसी ही एक फ़िल्म इधर आई ‘आर्टिकल 15’. संविधान के आर्टिकल पंद्रह की बात करती फ़िल्म. बराबरी के हक़ की बात करती फ़िल्म. और इसी बात पर ख़ूब बवाल भी हुआ. फ़िल्म को बैन कराने की मांग होने लगी. कुछ आसमानी लोग थे जिन्हें ये सच पसंद नहीं आया. फ़िल्म को रोकने के नाम पर तोड़ फोड़, झगड़ा झंझट शुरू किया गया. कहीं-कहीं इसका असर फ़िल्म पर पड़ा भी.

# जब इस फ़िल्म के डायरेक्टर ने कहा ‘क्या कर सकते हैं’

‘आर्टिकल 15’ के निर्देशक हैं अनुभव सिन्हा. वही जिन्होंने मुल्क फ़िल्म बनाई थी. तब भी बराबर का बावेला हुआ था. कुछ को फ़िल्म नहीं पसंद आई थी. ऐसा अक्सर हो जाता है. लोग इस बात के लिए ख़ुद को जलाने की धमकी कभी नहीं देते कि, अस्पतालों में पर्याप्त डॉक्टर और कॉलेजों में ठीक संख्या में टीचर आएं. लेकिन फ़िल्म दिखाने पर तेल छिड़कने लगते हैं. अनुभव सिन्हा अपने ट्विटर हैंडल पर दर्शकों के ये पूछने पर कि ‘मेरे शहर में फ़िल्म बैन क्यों की गई?’, कहते हैं ‘क्या कर सकते हैं’. और बात सच भी है, सिनेमाकार क्या फ़ोर्स बन सकता है?

तो ‘आर्टिकल 15’ के ट्रेलर रिलीज़ से ही इन आत्मदाहियों का बवाल शुरू हो गया था. इसी धंधे की पुरानी खिलाड़ी है करणी सेना. उन्होंने भी रोका, हल्ला मचाया. तो फ़िल्म के डिस्ट्रीब्यूटरों ने उनके लिए अलग से स्पेशल स्क्रीनिंग रखवाई. करणी सेना ने फ़िल्म देखी और बाक़ायदा लेटर ऑफ़ अप्रूवल भी जारी किया. जिसे अनुभव ने अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर किया

# इसी तरह के और भी बवाल हुए

ट्रेलर की रिलीज़ से ही इस फ़िल्म को ‘ब्राह्मण’ विरोधी बताकर कई ब्राह्मण संगठनों ने भी ‘हो हो तो तो’ की थी. इन्हीं में से एक था अंतर्राष्ट्रीय ब्राह्मण महासंघ. कई जगह फ़िल्म को बैन करवाने की कोशिशों के बीच इन भाई लोगों को भी स्पेशली फ़िल्म दिखाई गई. तो इस महासंघ ने भी चिट्ठी लिखी कि ‘सिग्नल ग्रीन कर दो’. फ़िल्म में कोई दिक्कत नहीं है.

# कई शहरों में फ़िल्म पर रोक लगी भी

जिस प्रदेश की राजधानी के सबसे बड़े अस्पताल के बाहर हर दिन दर्जनों लोग इस उम्मीद में मर जाते हैं कि ‘उनका नंबर आएगा’, ऐसे प्रदेश में आन्दोलन, धरना प्रदर्शन हुए. अस्पतालों के लिए नहीं. फ़िल्म रोकने के लिए. जैसे आर्टिकल 15 फ़िल्म रोककर ही इन अनगिनत मौतों पर काबू पाया जा सकता है. लोग गिरफ्तारियां दे रहे हैं. ताकि फ़िल्म रुक जाए. सच का चलना तो दूर, रेंगना भी इन्हें पसंद नहीं आता.

इलाहाबाद (सॉरी प्रयागराज) में सिविल लाइन के पीवीआर में फ़िल्म ना दिखाने को लेकर प्रदर्शन हुआ. पुलिस और प्रदर्शनकारियों में हल्की झड़प के बाद मामला शांत किया जा सका.

# हरिद्वार और रुड़की में फ़िल्म अटकी

आर्टिकल-15 फिल्म के प्रदर्शन को लेकर हरिद्वार और रुड़की में बवाल हुआ. ब्राह्मण समाज के लोगों के विरोध को देखते हुए रुड़की में फिल्म आर्टिकल-15 के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई. एएसडीएम ने सिविल लाइंस कोतवाली प्रभारी को शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं.

# कानपुर में भी नहीं चलने दिया शो

शुक्रवार को जैसे ही कानपुर के सिनेमाघरों में फ़िल्म पहुंची विरोध शुरू हो गया. रेव थ्री, सपना पैलेस, हीरपैलेस, आईनाक्स सिनेमाघरों में फिल्म की टिकट बिक्री की सूचना पर राष्ट्रीय ब्राह्मण महासंघ के कार्यकर्ता भड़क उठे. भारी विरोध के चलते कई सिनेमाघरों ने आनन-फानन शो रद करने की सूचना दी तो सिनेप्रेमी भड़क उठे और अपना पैसा वापस मांगने लगे.

शो कैंसिल होने की सूचना
शो कैंसिल होने की सूचना

# पटना में भी हुआ है बवाल

भूमिहार ब्राह्मण एकता मंच के नेता व कार्यकर्ता शनिवार की दोपहर गांधी मैदान थाना क्षेत्र में स्थित मोना सिनेमा के बाहर जमा हो गए. उन्‍होंने शो को रद करने की मांग की. उधर, पाटलिपुत्र-कुर्जी रोड स्थित ‘सिनेपोलिस’ के बाहर बीच सड़क पर कार्यकर्ता शो बंद करने की मांग को ले धरना पर बैठ गए. विरोध को देखते हुए दोनों जगह शो रद करने पड़े.

# सिनेमा हॉल में पुलिस ने रुकवाई स्क्रीनिंग

अनुभव सिन्हा ने ये ट्वीट करके पूछा है कि ‘क्या कोई कुछ करेगा’

# सोशल मीडिया से सुप्रीम कोर्ट तक हल्ला

सड़क पर धरना प्रदर्शन हो रहे हैं. सोशल मीडिया पर हेट पोस्ट डाले जा रहे हैं और एक आधा संगठन सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गए हैं कि फ़िल्म को बैन किया जाए. सुप्रीम कोर्ट में डाली गई इस याचिका पर अभी कोई बात हुई नहीं है.

# भोपाल में भी रोकी गई फ़िल्म

भोपाल में एक डीबी मॉल है. फ़िल्म को वहां भी प्रदर्शन से रोका गया है.

हल्ला हपाड करते प्रदर्शनकारी
हल्ला हपाड करते प्रदर्शनकारी

# फ़िल्म की रिलीज़ के बाद छावनी बन गया है बदायूं

असल में फ़िल्म ‘बदायूं कांड’ में मारी गई दो बहनों की बात भी करती है. इसीलिए फ़िल्म की रिलीज़ के बाद बदायूं के उस इलाके में काफ़ी पुलिस फ़ोर्स भी तैनात की गई है जहां की घटना है. ताकि कोई अप्रिय घटना ना हो.

बदायूं में ड्यूटी पर तैनात फ़ोर्स के जवान
बदायूं में ड्यूटी पर तैनात फ़ोर्स के जवान

कुल मिलाकर इस तरह की ख़बरें हताश करने वाली हैं. लेकिन सदियों से चले आ रहे आसमानी झूठ भले ही कितने चमकीलें लगें, पर होते झूठ ही हैं. इस बार सिनेमाघरों में सच जीत रहा है. लोग अपने परिवार के साथ जाकर आर्टिकल 15 देख रहे हैं, सराह रहे हैं. गौरव सोलंकी ने अपनी कलम से जो सिरा पकड़ा है वो अनंत संभावनाओं की ओर खुलता है. क्योंकि देश चलता है ‘एक क़िताब से’. नाम है संविधान. जिसकी शपथ लेकर कोई भी जन सेवक सेवा करने निकलता है. संविधान, जो इस मुल्क की सरहद में रहने वाले हर ज़िंदा इंसान को बराबर का सूरज, बराबर की हवा, बराबर पानी और बराबर आसमान देने की बात कहता है. तो देर किस बात की, जाइए देख आइए बराबरी की बात करने वाली इस फ़िल्म को.


वीडियो देखें:

मूवी रिव्यू: आर्टिकल 15

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