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सिर्फ इन्हीं तीन वजहों से MCD में जीती बीजेपी

बीजेपी ने दिल्ली नगर निगम का चुनाव फोड़ दिया. आम आदमी पार्टी कहने के लिए दूसरे नंबर पर है, लेकिन बहुत पीछे है. यूं समझ लीजिए कि अगर कांग्रेस एक धक्का और लगा देती, तो ‘आप’ तीसरे नंबर पर पहुंच जाती. फिलहाल हार जीत और सीटों का ग्राफ ये है.

mcd

हार से बौखलाई ‘आप’ सेना सारा दोष EVM के मत्थे मढ़ रही है. उनकी तरफ से विधायक अलका लांबा ने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुअ इस्तीफे की पेशकश कर दी है. दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन ने भी इस्तीफा दे दिया है. अन्ना हजारे ने वो टॉप सीक्रेट भी बताया जिसकी वजह से आम आदमी पार्टी हारी, वो बोले कि “उन्होंने हमारी बात नहीं सुनी इसलिए हार गए.” देख लो भैया, बुजुर्गन का आसिरबाद और सराप  दोनों खतरनाक होते हैं. उधर जीत से हुलसे अमित शाह ने भी कहा कि जनता ने स्पष्ट संदेश दे दिया है, कि दिल्ली की जनता निगेटिव पॉलिटिक्स नहीं कुबूल करेगी.

लेकिन बीजेपी की इस बंपर जीत के पीछे क्या वजह हैं, आइए बताते हैं.

#1. मोदी लहर 2.0

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने 2013 से जीत दर्ज करनी शुरू की. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की जीत में मोदी वसुंधरा, शिवराज और रमन के साथ एक अडीशनल फैक्टर रहे. 2014 के लोकसभा चुनाव तो थे ही मोदी पर जनादेश. उसके बाद भी महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड की जीत आईं. मगर इस मैजिक पर पहला बड़ा ब्रेक लगा दिल्ली विधानसभा चुनाव में. अमित शाह का किरण बेदी दांव बुरी तरह फेल रहा. मोदी के केजरीवाल पर कटाक्ष काम नहीं आए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

उसके बाद मोदी और शाह के नेतृत्व में बीजेपी बिहार में भी खेत रही. इसके बाद कहा गया कि मोदी मंत्र उतार पर है. फिर आए दो बड़े फैसले. पहले सर्जिकल स्ट्राइक और फिर नोदबंदी. और ब्रैंड मोदी फिर मार्केटिंग लायक हो गया. शाह भी दिल्ली-बिहार से सबक सीख चुके थे. नतीजतन, यूपी में बीजेपी की बंपर जीत. इससे पहले महाराष्ट्र स्थानीय निकाय में पार्टी जीत और यूपी के बाद उड़ीसा में पार्टी का शानदार प्रदर्शन. यही है मोदी लहर 2.0, जिसमें लेटेस्ट एडीशन हुआ है दिल्ली का. यूपी से सटा दिल्ली मोदी यूफोरिया में शामिल हो गया है.

#2. नए मनोज, नए पार्षद कैंडिडेट

दिल्ली में बीजेपी जनसंघ के दिनों से मजबूत थी. अकसर कांग्रेस से भी ज्यादा. साठ के दशक में यहां से अटल बिहारी जीते थे. नगर पालिका में भी जनसंघ इसी वक्त से काबिज रहा था. वजह थी, शरणार्थियों से दिल्लीवासी बने पंजाबियों में संघ की तगड़ी पैठ. प्लस बनिया-वैश्य वोटर. 90 के दशक में इसमें जाट वोटर भी जुड़ गया और बना बीजेपी का विनिंग कॉम्बिनेशन. इन तीन जातियों के साथ.

इसी के तहत कभी मदन लाल खुराना (पंजाबी) सदारत करते, कभी साहिब सिंह वर्मा (जाट). एक अपवाद सुषमा स्वराज रहीं, जिन्हें आखिरी मौके पर सत्ता बचाने उतारा गया, मगर प्याज के चढ़ते दामों ने शीला की दिल्ली में एंट्री करवा दी. उसके बाद भी बीजेपी इसी जातीय समीकरण के इर्द-गिर्द रही. कभी विजय कुमार मल्होत्रा (पंजाबी) या विजय गोयल (बनिया) पार्टी संभालते, तो कभी हर्षवर्धन (बनिया). मोदी दौर में इसमें बदलाव की पहली कोशिश हुई. लोकसभा चुनाव में किसी भी स्थापित नेता या गुट को टिकट नहीं मिला. सिर्फ हर्षवर्धन ही अपवाद रहे, क्योंकि पार्टी को सिब्बल का किला ध्वस्त करना था.

बीजेपी नेता हर्षवर्धन
बीजेपी नेता हर्षवर्धन

बाकी छह पर लोकसभा के लिहाज से नए चेहरे दिए गए. इसमें सिर्फ रमेश बिधूड़ी और प्रवेश वर्मा ही पहले विधायक रहे थे. एक-दो बार. बाकी 4 नए. उदित राज, मीनाक्षी लेखी, महेश गिरि और मनोज तिवारी. उसके बाद संघ से आए और पद संभालने से पहले शायद ही चर्चा में रहे सतीश उपाध्याय को जिम्मेदारी दी गई संगठन अध्यक्ष की. मगर विधानसभा में हार के बाद फिर बदलाव किया गया. और ताज सजा मनोज तिवारी के सिर, जिन्हें दिल्ली की गुटीय राजनीति का कोई अनुभव नहीं था. उनका अपना कोई गुट नहीं था. वह तो मोदी लहर में पूर्वांचली वोटरों के कोटे से सांसदी का टिकट पा गए थे. स्टार प्रचारकों में एक और नाम जुड़ गया था.

मगर मनोज तिवारी को आगे रख अमित शाह दिल्ली बीजेपी के गुटों पर स्ट्राइक करना चाहते थे. उसी के तहत एमसीडी चुनाव में सब पार्षदों के टिकट भी काट दिए गए. शुरू के कुछ दिनों में चिल्ल-पौं हुई. फिर वह भी शांत. पांच-सात जगह ही निष्कासन वगैरह करना पड़ा. मनोज तिवारी भी सयाने निकले. मोदी के नाम को आगे रखकर सुर साधा. इससे सफाई, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पीछे छूट गए. नतीजा. एमसीडी में बीजेपी की जीत की हैट्रिक.

एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी
एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी

#3. केजरीवाल को थैंक यू नोट भेजो

67-3, स्क्रीन पर चमकते इस आंकड़े ने बीजेपी को तगड़ी शॉक वेव्स दी थीं. मगर उसके बाद क्या हुआ. केजरीवाल झटके पर झटका खुद खाते रहे. कभी उनके मंत्री पर फर्जी लॉ डिग्री का इल्जाम लगा. कभी सेक्स सीडी सामने आई. विधायक भी एक-एक कर बगावत करने लगे. सब केजरीवाल पर तानाशाही का इल्जाम लगाते. और केजरीवाल. वह एलजी और मोदी सरकार पर इल्जाम लगाते.

पब्लिक सब देख रही थी. फिर उसने ये भी देखा कि सीएम साहब कैबिनेट समेत पंजाब-गोवा विजय पर निकल गए. फिर मुंह चिढ़ाते होर्डिंग भी नजर आए. और आखिर में आया खिसियाना बयान. ‘ईवीएम के दम पर जीत रहे हैं जी.’ पब्लिक, जिसने बड़ी उम्मीद से नई राजनीति को गले लगाया था, आजिज आ गई. स्क्रीन पर आंकड़ा बदल गया है. इस दर से तो अगले चुनाव में केजरीवाल नेता प्रतिपक्ष भी नहीं रह पाएंगे.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल

केजरीवाल की हार और बीजेपी की जीत में दो फैक्टर और रहे. छोटू-छोटू से. एक स्वराज पार्टी की आमद. ऐसा वोटर जो साफ राजनीति चाहता है, जिसके लिए बीजेपी और कांग्रेस विकल्प नहीं हैं. वो अब मजबूरी में झाड़ू पर टिका नहीं रहा. उसके पास योगेंद्र यादव की सीटी का ऑप्शन आ गया. हर वॉर्ड में हजार पांच सौ ही सही, वोट उनकी तरफ गए.

उधर कांग्रेस ने नए सिरे से खुद को पुनर्गठित किया. पुराने पड़ चुके नेताओं को किनारे लगाया. चुनाव भर शीला दीक्षित, जयप्रकाश अग्रवाल, जगदीश टाइटलर खुनखुनाते रहे. युवाओं में एक बस अरविंदर लवली ही रूठे. नए लोगों को टिकट मिला, तो उन्होंने नए दम से चुनाव लड़ा. इसका फायदा क्या हुआ. विधानसभा के जीरो की तरह डब्बा गुल नहीं हुआ. तीन में से दो नगर पालिकाओँ में वे दूसरे नंबर पर रहे, जो कांग्रेस के लिए संजीवनी समान है. माकन के नेतृत्व में कांग्रेस जितनी भी, जैसी भी एंटी इनकमबैंसी थी, बीजेपी के खिलाफ, उसका फायदा उठाने में सफल रहे. बीजेपी से नाराज लोगों को ‘आप’ से ज्यादा कांग्रेस में भरोसा हुआ.

कौन जीता? मोदी या ईवीएम? कौन हारा? केजरीवाल या केजरीवाल?


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