एक कविता रोज़ में आज पढ़िए केदारनाथ अग्रवाल को- तुम मेरे लिए नहीं तुम मेरे लिए नहीं हो- न हो सकती हो
कि मैं अंगुलियों से हवाएं काटता रहता हूं.
ख़ुशनसीब हैं वह उड़ते चले जा रहे पखेरुओं के जोड़े
मेरी दिशा से ठीक विपरीत जिनकी दिशाएं हैं. आओ भी आओ भी,चलें,
फूल को छोड़ कर
गन्ध के साथ
आग की खोज में
रात को जीत कर जिएं ! आओ भी,चलें,
शब्द को छोड़ कर
अर्थ के साथ,
मर्म की खोज में
सिन्धु में डूब कर जिएं ! आओ भी,चलें
वेणु को छोड़ कर
नाद के साथ,
गूंज की खोज में
देश में गूंज कर जिएं ! मैं हूं अनास्था पर लिखा मैं हूं अनास्था पर लिखा
आस्था का शिलालेख
नितान्त मौन,
किन्तु सार्थक और सजीव
कर्म के कृतित्व की सूर्याभिमुखी अभिव्यक्ति;
मृत्यु पर जीवन के जय की घोषणा. न टूटो तुम न टूटो तुम
बस झुको यों
कि चूम लो मिट्टी
और फिर उठो. जल रहा है जल रहा है
जवान हो कर गुलाब,
खोल कर होंठ
जैसे आग
गा रही है फाग. आज नदी बिलकुल उदास थी आज नदी बिलकुल उदास थी.
सोई थी अपने पानी में,
उसके दर्पण पर-
बादल का वस्त्र पडा था.
मैंने उसको नहीं जगाया,
दबे पांव घर वापस आया. हम जिएं न जिएं दोस्त हम जिएं न जिएं दोस्त
तुम जियो एक नौजवान की तरह,
खेत में झूम रहे धान की तरह,
मौत को मार रहे वान की तरह.
हम जिएं न जिएं दोस्त
तुम जियो अजेय इंसान की तरह
मरण के इस रण में अमरण
आकर्ण तनी
कमान की तरह !
कुछ और कविताएं यहां पढ़िए:
'आओ भी, चलें, शब्द को छोड़ कर अर्थ के साथ'
आज केदारनाथ अग्रवाल (1 अप्रैल 1911 - 22 जून 2000) की बरसी है. पढ़िए उनकी कुछ कविताएं-
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फोटो - thelallantop
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‘जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख'
‘दबा रहूंगा किसी रजिस्टर में, अपने स्थायी पते के अक्षरों के नीचे’
वीडियो देखें- https://www.youtube.com/watch?v=Gcv71ct_HpE&t=134s
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