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'पूछो, मां-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्यों हैं'

प्रिय पाठकों,

आज सफ़दर हाशमी (12 अप्रैल,1954 – 2 जनवरी, 1989) का जन्म हुआ था.  सफ़दर एक शानदार नाटककर और निर्देशक थे. कलाकार और गीतकार भी. सफ़दर हाशमी एक ऐसा नाम है जिसके बिना भारत के थिएटर का इतिहास अधूरा है. उनके नुक्कड़ नाटकों ने आम जनता तक थिएटर की पहुंच आसान की. ये नाटक विरोध-दर्ज़ करने का माध्यम भी बने. आइए उनके जन्मदिन पर पढ़ते हैं उनकी एक कविता – पढ़ना लिखना सीखो. इस कविता/गीत को बहुत पहले दूरदर्शन ने अपने एक – राष्ट्रीय साक्षरता मिशन वाले ऐड के लिए यूज़ किया था. तब इसकी लोकप्रियता ने आसमान छू लिया था. 


पढ़ना लिखना सीखो

पढ़ना-लिखना सीखो, ओ मेहनत करने वालो,
पढ़ना-लिखना सीखो, ओ भूख से मरने वालो.

क ख ग घ को पहचानो, अलिफ़ को पढ़ना सीखो,
अ आ इ ई को हथियार, बनाकर लड़ना सीखो.

ओ सड़क बनाने वालो, ओ भवन उठाने वालो,
खुद अपनी किस्मत का फैसला, अगर तुम्हें करना है.
ओ बोझा ढोने वालो ओ रेल चलने वालो,
अगर देश की बागडोर को कब्ज़े में करना है.

क ख ग घ को पहचानो, अलिफ़ को पढ़ना सीखो,
अ आ इ ई को हथियार, बनाकर लड़ना सीखो.

पूछो, मजदूरी की खातिर लोग भटकते क्यों हैं,
पढ़ो,तुम्हारी सूखी रोटी गिद्ध लपकते क्यों हैं.
पूछो, मां-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्यों हैं,
पढ़ो,तुम्हारी मेहनत का फल सेठ गटकते क्यों हैं.

पढ़ो, लिखा है दीवारों पर मेहनतकश का नारा,
पढ़ो, पोस्टर क्या कहता है, वो भी दोस्त तुम्हारा.
पढ़ो, अगर अंधे विश्वासों से पाना छुटकारा,
पढ़ो, किताबें कहती हैं – सारा संसार तुम्हारा.

पढ़ो, कि हर मेहनतकश को उसका हक दिलवाना है,
पढ़ो, अगर इस देश को अपने ढंग से चलवाना है.

पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो,
पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो.


(साल 2016 का नवम्बर. इस गुनगुने महीने में ‘आज तक’ ने एक दो दिवसीय साहित्य उत्सव के बहाने कुछ सरगर्मियाँ पैदा कीं. इन सरगर्मियों को बढ़ाने में एक बड़ा किरदार ‘लल्लनटॉप कहानी कॉम्पिटिशन’ का भी रहा. यह हिन्दी के इतिहास में पहला मौक़ा था जब साहित्य के किसी समारोह में इस तरह की कोई प्रतियोगिता आयोजित की गयी. कहानी मौके़ पर ही लिखनी थी-हिन्दी में और देवनागरी लिपि में-आयोजकों द्वारा दी गयी कलम और कॉपी पर. कहानी अपने मनचाहे विषय पर लिखने की छूट थी. सुबह से शाम तक का वक़्त था-एक मौलिक और सर्वथा अप्रकाशित-अप्रसारित कहानी गढ़ने-रचने के लिए. इस प्रक्रिया में देश के अलग-अलग स्थानों से आये क़रीब 500 कहानीकारों ने हिस्सा लिया और कहानी लिखी. इन कहानियों में से 16 कहानियाँ चुनकर यह किताब बनी है. इस चयन के बारे में बेशक यह कहा जा सकता है कि इसमें कहानीकार नहीं कहानियाँ पढ़ने को मिलेंगी. इस सन्दर्भ में और स्पष्टीकरण आत्मप्रशंसा में ले जायेगा. इसलिए इससे बचते हुए ये कहानियाँ अब आपके सामने हैं…)

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