जब भी जासूसी या इंटेलीजेंस सर्विसेज़ की बात होती है, तो दिमाग में कुछ गिनीचुनी एजेंसियों के नाम आते हैं. Russia की KGB, Israel की Mossad, India की R&AW, यूके की MI6 या अमेरिका की CIA. लगभग-लगभग हर बड़े और समृद्ध देश के पास, छोटी ही सही, अपनी इंटेलिजेंस एजेन्सी होती है. कई बार तो कुछ देशों की खुफिया एजेंसीज मिलकर अपना नेटवर्क बना लेती हैं, ताकि आपस में एक दूसरे के काम की खुफिया जानकारी शेयर कर सकें. लेकिन एक देश आज भी है जो अपने आपको विकसित देश कहता है, उसके पास बुलेट ट्रेन का नेटवर्क है, टेक्नॉलजी के क्षेत्र में बहुत एड्वान्स भी है, वहां life expectancy भी बढ़िया है. लेकिन उस देश के पास अपनी इंटेलिजेंस एजेंसी आज की तारीख तक में नहीं है. हम बात कर रहे हैं जापान की.
जिस जापान ने 80 साल तक नहीं बनाई खुफिया एजेंसी, अब अचानक क्यों बदला फैसला?
Japan के पूर्व PM Shinzo Abe ने जापान की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए, 2013 में National Security Council बनाया था. लेकिन जापान के पास कोई ऐसी Centralized Intelligence Agency नहीं थी. अब PM Sanae Takaichi ने देश की एक डेडिकेटेड एजेंसी बनाने के लिए हरी झंडी दे दी है.


जापान के पास अपनी कोई डेडिकेटेड इंटेलिजेंस एजेंसी नहीं है, जो उसे विदेशी ख़तरों के बारे में आगाह कर सके. अभी तक तमाम पुलिसिया और मिलिट्री तंत्र से आ रही फुटकर सूचनाएं ही जैपनीज़ इंटेलिजेंस की बैकबोन हैं. लेकिन अब वो समय नहीं रहा कि जापान लिबिर-लिबिर करेगा. अब जापान को भी चाहिए फुल इज्जत. और जापान ने कहा है कि हम भी बनाएंगे अपनी ख़ुफ़िया एजेंसी. वो ही एजेंसी, जिसका स्वाद इस दुनिया ने आख़िरी बार दूसरे वर्ल्ड वॉर के समय चखा था. और काम ऐसा कि एजेंसी ने तब मैन्युअल तरीके से पर्ल हार्बर का हिसाब-किताब बना दिया था.
समंदर की गहराई कितनी? जहाज़ों का शेड्यूल क्या? एंटी-एयरक्राफ्ट गन और वॉरशिप्स की तैनाती कहां-कहां हैं? ये सब डेटा जापान ने गुपचुप तरीके से जुटाया, और अमरीका को कानोंकान ख़बर नहीं हुई. और इसी डेटा के आधार पर इम्पीरियल जैपनीज़ नेवी ने अपना अटैक प्लान तैयार किया था. तब से लेकर अब तक जापान के पास डेडिकेटेड ख़ुफ़िया एजेंसी नहीं थी, लेकिन अब होगी एक सेंट्रलाइज़्ड इंटेलिजेंस एजेंसी.
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल अचानक से जापान को इंटेलीजेंस एजेंसी बनाने का प्लान क्यों सूझा? इसका जवाब मिलता है न्यूयॉर्क टाइम्स के एक आर्टिकल से. इस आर्टिकल को लिखा है - जेन ब्रैडली, माइकल स्विट्ज़ और एडम गोल्डमैन ने. 12 जुलाई को छपी इस रिपोर्ट का शीर्षक था How Putin Turned Japan Into a Den of Spies. इंटरनेट पर खोजेंगे तो मिल जाएगा. इस खबर में दावा किया गया कि जापान में रहकर कुछ रशियन लोग अपना अलग ही इंटेलिजेंस नेटवर्क चला रहे हैं. इस काम में उन्हें मदद कर रहा है जापान का anti-espionage कानून जो कि है ही नहीं.
ऐसे में अगर कोई विदेशी आदमी जापान की धरती पर बैठकर अपने देश के लिए ख़ुफ़ियागिरी कर रहा है, और जापान में पकड़ा जाता है, तो उसका बचकर निकलना आसान हो जाता है. और एक तरफ तो जापान के espionage लॉ माने जासूसी के कानून बहुत कमज़ोर हैं. पर दूसरी तरफ टेक इंडस्ट्री बहुत शानदार है. जो कि दूसरे देश के जासूसों के लिए, जापान में ही रहकर जासूसी करने के लिए एकदम मुफीद है. खासकर रूसी जासूसों के लिए, जो कि उनकी पनाहगाह बन गया है. रिपोर्ट में कहा गया कि इसी लूपहोल का फायदा उठाकर रशिया ने अपनी गोटी जापान में सेट कर दी.
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रिपोर्ट में कहा गया है कि फरवरी 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद, पश्चिमी देशों ने रूस की इंटेलिजेंस और हथियार बनाने की क्षमता को कमजोर करने के लिए कई रूसी जासूसों को निकाल दिया था. साथ ही क्रेमलिन से जुड़ी कंपनियों को बैन कर दिया था. अधिकारियों के मुताबिक, पश्चिमी देशों से निकाले गए ये दर्जनों रूसी जासूस अब जापान में हैं.
रिपोर्ट ये भी दावा करती है कि Japan की राजधानी टोक्यो में रशियन मिलिट्री इंटेलिजेंस की एक सीक्रेट यूनिट है, जिसे 20th Directorate कहा जाता है. इसकी भूमिका को कभी भी सार्वजनिक नहीं किया गया है. इसमें काम करते हैं जासूस, जो डिप्लोमैट्स या व्यापारियों का भेष बनाकर वॉर में काम आने वाली टेक्नोलॉजी को खरीदने या चुराने का काम करते हैं और उसे तस्करी के जरिए रूस भेजते हैं. 20th Directorate की देखरेख एक आदमी करता है. नाम है Maksim Vladimirovich Filchenkov. इस आदमी की उम्र 49 साल है. रिपोर्ट के मुताबिक ये व्यक्ति रूस की मिलिट्री इंटेलिजेंस एजेंसी G.R.U. का पूर्व अधिकारी है.
Filchenkov, Aeroflot में काम करता है. Aeroflot रूस की सबसे बड़ी एयरलाइन कंपनियों में से एक है. Aeroflot ने आज से 94 साल पहले, 25 फरवरी 1932 माने सोवियत यूनियन के दौर में अपने ऑपरेशन शुरू किए थे. लेकिन सोवियत संघ के टूटने के बाद, 1992 में Aeroflot को लगभग 400 रीजनल एयरलाइंस में बांट दिया गया था, जिन्हें इनफॉर्मली Babyflots कहा जाता था. बाद में इसको एक ओपन जॉइंट-स्टॉक कंपनी की तरह बनाया गया. कहते हैं कि सोवियत काल से ही G.R.U. के जासूस पश्चिमी देशों की टेक्नोलॉजी चुराने के लिए Aeroflot की नौकरियों का इस्तेमाल अपने कवर के रूप में करते आए हैं.

अब वापस Filchenkov पर लौटते हैं. Filchenkov, पहली बार फरवरी 2024 में टोक्यो आया था। फिर उसने वहाँ बैठे-बैठे जापानी लॉजिस्टिक्स कंपनियों और वियतनाम, उज्बेकिस्तान, श्रीलंका जैसे तीसरे देशों के रास्ते, प्रतिबंधित मिलिट्री पार्ट्स और चिप्स को खरीदकर रशिया में भेजना शुरू कर दिया. और ये सब आराम से हफ़्तों-महीनों तक चलता रहा.
रूस की मिसाइल में मिली जापानी टेक्नोलॉजीइसके बाद आया मई 2026 का एक दिन. एक रूसी Kh-101 क्रूज मिसाइल ने कीव में एक रिहायशी इमारत पर अटैक किया. इसमें कम से कम 24 लोगों की जान चली गई. अटैक के बाद जांचकर्ताओं ने मलबे की छानबीन की. इसमें उन्होंने पाया कि उस मिसाइल को गाइड करने के लिए उन जापानी कलपुर्जों का इस्तेमाल किया गया था, जिनके रूस को एक्सपोर्ट करने पर बड़े पैमाने पर बैन लगा हुआ है. यूक्रेन के कान खड़े हो गए. जांच तेज की गई तो पता चला कि यूक्रेन पर दागे जा रहे 90 फीसद बैलिस्टिक मिसाइल्स में जापानी टेक लगा हुआ है.

दस्तावेज़ों और इंटरव्यू के ज़रिए यूक्रेन के अधिकारियों ने जापान को इस बात के सबूत सौंपे कि उसकी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल रूसी हमलों में किया जा रहा है. जापान ने सुना और इशारे किए कि अब वो सीरियस है. उसने विरोध किया, रूसी हमलों की आलोचना की और जापान अब कुछ सख्त कदम उठाने की ओर बढ़ता दिख रहा है. क्योंकि जापान को अंदाजा हो गया कि खुद की खुफिया एजेंसी न होने से, और जासूसरोधी क़ानून न होने से उसकी ज़मीन का ग़लत इस्तेमाल किया जा रहा है.
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जासूसों का स्वर्ग कहलाता रहा जापानकोल्ड वॉर के समय से ही सोवियत एरा के जासूस जापान को ‘जासूसों का स्वर्ग’ बुलाते रहे हैं. लेकिन रशिया के साथ-साथ चाइना और नार्थ कोरिया से बढ़ते खतरों को देखते हुए जापान ने अपनी एजेंसी बनाने का ऐलान किया है. जापान के लोगों को चिंता है कि ये देश साइबर अटैक, disinformation माने झूठी खबरें और इंडस्ट्रियल espionage की मदद से उन्हें टार्गेट न करें. इसलिए ये घटनाक्रम एक बड़ा कारण है कि जापान इस दिशा में काम कर रहा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भी बार-बार अमेरिका के सहयोगियों पर अपनी रक्षा पर पर्याप्त खर्च न करने और अमेरिकी मदद पर निर्भर रहने का आरोप लगाया है. दूसरी तरफ खबर लीक होते ही रशियन जासूस ने बोरिया-बिस्तर बांध लिया. New York Times ने Filchenkov से बात करने, मिलने की, तमाम कोशिशें कीं. पर कभी ये जवाब मिला कि वो है नहीं. तो कभी खुद उसने बात करने से मना कर दिया. साफ हो गया कि Filchenkov का हिसाब-किताब सही तो नहीं ही था.

अब अगला बड़ा सवाल कि ऐसा क्या हुआ था कि जापान को इंटेलिजेंस एजेंसी के कॉन्सेप्ट को रद्दी के टोकरे में डालना पड़ा था. इसके लिए चलिए सेकंड वर्ल्ड वॉर के समय.1941 से 1945. जापान और अमेरिका के बीच युद्ध हुआ. इसकी शुरुआत 7 दिसंबर 1941 को पर्ल हार्बर में अमेरिकी नौसैनिक ठिकाने पर जापान के अचानक किए गए हमले से हुई थी. लेकिन अगस्त 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराए गए. इसके बाद जापान ने बिना शर्त आत्मसमर्पण किया. और जंग खत्म हुई.

जंग के बाद जापान के लिए बहुत कुछ बदल गया. द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार ने वहां के लोगों के मन में स्टेट इंटेलीजेंस के प्रति एक गहरा अविश्वास पैदा कर दिया था. ऐसा इसलिए था क्योंकि युद्ध के समय काम करने वाली Special Higher Police, जिसे तोक्को कहा जाता था, उसने अपने ही लोगों की जासूसी शुरू कर दी. उस समय इस पुलिस द्वारा किए जाने वाले अरेस्ट और टार्चर आम दृश्य हो गए.
फिर युद्ध खत्म होने के तुरंत बाद 1947 में तैयार किए गए जापान के संविधान के Article 9 ने हमेशा के लिए युद्ध का त्याग कर दिया और फिर जापान की कभी भी अपनी कोई विदेशी खुफिया एजेंसी नहीं रही. इसके बजाय, जापान सुरक्षा और खुफिया जानकारियों के लिए ज़्यादा हद तक अमेरिका पर निर्भर हो गया.
जापान ने बनाई थी National Security Councilजापान के पूर्व प्रधानमंत्री, शिंजो आबे ने जापान की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए, 2013 में National Security Council (NSC) बनाया था. साल 2014 में आर्टिकल 9 की परिभाषा को फिर से गढ़ा गया. इसके तहत 1954 में बनी Japan Self-Defense Forces (JSDF) को और ज्यादा शक्तियां मिलीं. बाद में, साल 2015 में 'Legislation for Peace and Security' कानून संसद में पास हुआ.
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अब इस नए रिफॉर्म को जापान में होने वाला अब तक का सबसे बड़ा सिक्युरिटी ओवरहॉल भी माना जा रहा है. प्रधानमंत्री सनाए टकाईची के अंडर में जापान की नई खुफिया एजेंसी बनाने का कानून मई में संसद के लोअर हाउस से पास होने के बाद, अपर हाउस से पास हो गया था. इसे लेकर टकाईची की आलोचना भी हो रही है. इस आलोचना में चीन भी शामिल है. चीन ने उन पर मिलिटरिज्म को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है. साथ ही खुद जापान के भीतर भी कुछ सांसदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस नई एजेंसी की निगरानी के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, और यह कदम देश के शांतिवादी आदर्शों माने pacifist ideals के खिलाफ जाता है.
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