गुजरीत का इस्तीफा पिछले 10 दिन से 'पेंडिंग अप्रूवल' बना हुआ था. कैप्टन 18 जनवरी, 2018 को राहुल गांधी से मिले और 'विचार-विमर्श' के बाद गुरजीत का इस्तीफा मंज़ूर कर लिया. कैप्टन पर ये इस्तीफा मंज़ूर करने का बहुत दबाव था. लेकिन अपने सबसे करीबी नेता और पंजाब कांग्रेस के फंड मैनेजर्स में से एक को यूं ही नहीं जाने देना चाहते थे. दबाव प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से भी था. ED ने राणा को बुलावा भेज रखा था ताकि उनसे उनके बेटे के बारे में पूछताछ हो सके. इल्ज़ाम है कि राणा के बेटे ने विदेशों में अवैध तरीके से पैसा जोड़ा है.
करोड़पति नौकर वाले नेता जी

राणा गुरजीत
नेताओं के यहां बरकत हो तो लोग आंखें कम तिरछी करते हैं. लेकिन गुरजीत का मामला अलग था. 16 मार्च, 2017 को पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनी. इसके 2 महीने बाद 19-20 मई को पंजाब में 94 रेत और बजरी की खदानों की नीलमी हुई, इंटरनेट पर. चार दिन बाद 25 मई,2017 को द ट्रिब्यून अखबार ने एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि गुरजीत के कम से कम चार कर्मचारियों को खदान का ठेका मिला - कुक अमित बहादुर, कुलविंदर पाल सिंह, गुरविंदर सिंह और बलराज.
नेपाली मूल का अमित बहादुर 10,000 महावारी पर गुरजीत का कुक था. फिर भी उसने शहीद भगत सिंह नगर (नवांशहर) ज़िले के सैदपुर गांव में मिली रेत खदान के लिए 26.51 करोड़ रुपए का इंतज़ाम कर लिया था. यही नहीं, अमित बहादुर और बलराज सिंह राणा गुरजीत से जुड़ी तीन कंपनियों में डायरेक्टर भी थे. अमित बहादुर की कंपनियों ने राणा गुरजीत को 25 करोड़ का लोन भी दिया था.
इस सब के जवाब में राणा गुरजीत के पास कहने को यही था कि उनके सभी कर्मचारी खदान नीलामी से पहले ही नौकरी छोड़ चुके थे.जांच भी 'अपने' आदमी को दी कैप्टन ने
29 मई, 2017 को कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस मामले की जांच हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज से करवाने का ऐलान किया. लेकिन जिस जज को इसके लिए चुना गया, उसने फिर सवाल खड़े किए. जांच पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में जज रहे जस्टिस जे एस नारंग (रिटायर्ड) को दी गई. जस्टिस नारंग वही थे, जिनका बेटा राणा हरजीत सिंह की ओर से बतौर वकील अदालतों में पेश होता रहता था.
गुरजीत ने इस्तीफे की पेशकश की, लेकिन वो नामंज़ूर हुआ और आखिरकार अगस्त 2017 जांच कमीशन ने भी उन्हें क्लीन चिट दे ही दी.लेकिन द ट्रिब्यून अपनी खबर पर कायम रहा. 4 जनवरी, 2018 को छपी एक रिपोर्ट में अखबार ने दावा किया कि गुरजीत सिंह के कर्मचारी (जो गुरजीत के मुताबिक उनकी नौकरी छोड़ चुका था) बलराज सिंह ने रेत खदान नीलामी के लिए अपना पता राणा शुगर मिल, बटर सिविया गांव, अमृतसर दिया था. ये शक्कर मिल राणा गुरजीत के परिवार की थी. ये बड़ा सबूत था जो बताता था कि रेत खदान नीलामी में जमकर धांधली हुई है और गुरजीत का उससे सीधा संबंध था.

राणा गुरजीत सिंह के पास पंजाब के दो सबसे मलाइदार मंत्रालय हैं. सिंचाई और बिजली.
इन्हीं दिनों प्रवर्तन निदेशालय ने गुरजीत सिंह के बेटे इंदर प्रताप सिंह के खिलाफ भी जांच शुरू कर दी. इंदर पर इल्ज़ाम है कि उसने विदेशों में अवैध तरीकों से पैसा बटोरा, 100 करोड़ लगभग.
गुरजीत पक्के कांग्रेसी हैं. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में जब सिख विरोधी दंगों के कुछ केस दोबारा खुलवाने की बात की, तो उन्होंने बयान दिया - सिर्फ इसलिए कि 1984 में दिल्ली में कांग्रेस की सरकार थी, पार्टी को दंगों के लिए दोषी नहीं बताया जा सकता.इतना होते तक कैप्टन पर गुरजीत का इस्तीफा लेने का दबाव बनने लगा. कैप्टन के लिए गुरजीत का इस्तीफा इतना जटिल मामला था कि उन्होंने राहुल गांधी मिले बिना उसे कबूल नहीं किया.

अमरिंदर सिंह दो मुद्दों पर चुनाव जीतकर आए थे, ड्रग्स और अवैध उत्खनन. (फोटोः पीटीआई)
पंजाब में अवैध उत्खनन पर द ट्रिब्यून के पत्रकार विश्व भारती ने काफी काम किया है. दी लल्लनटॉप ने उनसे बात की. उन्होंने हमें बताया,
''पांजाब कैबिनेट में कैप्टन के सबसे करीब कोई था तो वो थे राणा गुरजीत. इसलिए उन्हें पंजाब के दो सबसे मलाइदार विभाग मिले - सिंचाई और बिजली. गुरजीत पंजाब कांग्रेस के लिए 'मनीबैग' भी थे. वो पार्टी के लिए फंड की 'व्यवस्था' करते थे. इसलिए भी उनका इस्तीफा लेना कैप्टन के लिए आसान नहीं था.''तो गुरजीत के जाने से नुकसान क्या होगा?
''बिना मनीबैग पार्टियां चला नहीं करती. लेकिन पंजाब में मनीबैग्स की कोई कमी नहीं. कांग्रेस अभी सत्ता में है, पैसा वो हर हाल में जुटा लेगी. कैबिनेट में कोई नया नेता शामिल हो जाएगा. नुकसान होगा छवि का. वादा करप्शन फ्री गवर्मेंट का था, जो पूरा करने में कांग्रेस से बड़ी भूल हो गई है, वो भी सत्ता में आने के बहुत कम समय के भीतर.''
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