पहले एक सवाल. अगर दुश्मन का ड्रोन करीब ₹19 लाख का है और उसे आसमान में गिराने के लिए आपका जवाब करोड़ों रुपये का इंटरसेप्टर है, तो हर बार जीत किसकी हो रही है? ड्रोन गिर तो गया, लेकिन अगर ऐसे हमले दर्जनों या सैकड़ों की संख्या में होने लगें, तो क्या आपकी air defence व्यवस्था ज्यादा देर तक ये खर्च उठा पाएगी? यही वो सवाल है जिसने अमेरिका समेत दुनिया की बड़ी सैन्य ताकतों को एक बार फिर "लो कास्ट एयर डिफेंस" (low cost air defence) और "काउंटर ड्रोन टेक्नोलॉजी" की तरफ देखने पर मजबूर कर दिया है.
लखटकिया ड्रोन को गिराने में स्वाहा हुए 19 करोड़, 'सस्ते एंटी ड्रोन' पर अमेरिका को क्यों हो रहा भरोसा?
Guardian drone interceptor: यूक्रेन और मिडिल ईस्ट की जंग ने ड्रोन युद्ध का नया गणित सामने रखा है. सस्ते attack drones को रोकने के लिए करोड़ों रुपये के interceptors इस्तेमाल करने की समस्या के बीच अमेरिका और उसकी defence industry low-cost counter-drone systems पर जोर दे रही है. Powerus का करीब ₹4.8 लाख वाला Guardian इसी बदलाव की मिसाल है.

इस पूरे खेल को समझने के लिए Powerus के गार्डियन-1 का दिया एक आंकड़ा काफी है. कंपनी के मुताबिक Shahed-136 या Geran-2 जैसे वन-वे अटैक ड्रोन की कीमत करीब $20,000 (लगभग ₹19.1 लाख) हो सकती है. दूसरी तरफ, उसे रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाले मौजूदा इंटरसेप्टर्स की कीमत $500,000 से $2 मीलियन (लगभग ₹4.8 करोड़ से ₹19.1 करोड़) तक पहुंच सकती है. यानी निशाना लाखों का और उसे रोकने का हथियार करोड़ों का. Powerus इसी असमानता को "मिसाइल मैथ" की समस्या बताता है.
अब कहानी में एंट्री होती है गार्डियन की. 23 अगस्त 2026 की Jerusalem Post रिपोर्ट ने The New York Times के हवाले से गार्डियन इंटरसेप्टर की कीमत करीब $5,000 (लगभग ₹4.8 लाख) बताई. उसी रिपोर्ट में UAE में इसकी असेंबली और ईरानी ड्रोन्स के खिलाफ कम लागत वाले ड्रोन इंटरसेप्टर्स की बढ़ती जरूरत का जिक्र है. यानी सवाल अब ये नहीं रह गया कि ड्रोन को गिराया जा सकता है या नहीं. असली सवाल ये है कि उसे कितने खर्च में गिराया जा सकता है.
इसे दुकान वाली मिसाल से समझिए. मान लीजिए कोई चोर ₹1 लाख का सामान उठाकर भाग रहा है और उसे रोकने के लिए आप ₹10 लाख का हथौड़ा खरीद लेते हैं. चोर पकड़ा गया, सामान बच गया, लेकिन अगर अगले दिन ऐसे 20 चोर और आ जाएं तो समस्या चोरों से ज्यादा आपके हथौड़ों की कीमत बन जाएगी.
ड्रोन युद्ध में यही गणित कहीं ज्यादा बड़े पैमाने पर सामने आ रहा है. एक सस्ता अटैक ड्रोन सिर्फ अपने टारगेट को नुकसान पहुंचाने नहीं आता. बड़ी संख्या में ऐसे ड्रोन्स भेजकर वो डिफेंडर के महंगे मिसाइलों और इंटरसेप्टर्स भी खर्च करवा सकता है. यही वजह है कि यूक्रेन ड्रोन वॉरफेयर से लेकर Iran ड्रोन अटैकs और मीडिल ईस्ट एयर डिफेंस तक, आज "कास्ट पर किल", "सस्ते ड्रोन इंटरसेप्टर" और "लो कास्ट काउंटर-UAS" जैसे शब्द सिर्फ डिफेंस जगत के शब्द भर नहीं रह गए हैं. ये आने वाली जंग के सबसे अहम सवालों में शामिल हो चुके हैं.
यूक्रेन ने ये समस्या पहले दिखा दी थी
ड्रोन युद्ध का सबसे बड़ा मैदान पिछले कुछ वर्षों में यूक्रेन बना. वहां छोटे कॉमर्शियल ड्रोन्स से लेकर बड़े वन-वे अटैक ड्रोन्स तक का इस्तेमाल हुआ. रूस की तरफ से Shahed family के ड्रोन्स का इस्तेमाल और उनके खिलाफ कम लागत वाले जवाबों ने सैन्य योजनाकारों को एक बात समझा दी.
हर ड्रोन के सामने मिसाइल लेकर खड़ा होना लंबे समय तक आसान नहीं रहेगा. गार्डियन भी इसी अनुभव से निकली तकनीक पर आधारित बताया जा रहा है. Gulf News ने 24 अगस्त की अपनी रिपोर्ट में लिखा कि Powerus का इंटरसेप्टर यूक्रेन में इस्तेमाल हुई ऐसी तकनीक से प्रभावित है, जिसने रशियन शहीद ड्रोन्स के खिलाफ काम किया था.
यहीं से एक नई सोच मजबूत हुई. अगर हमला करने वाला हथियार सस्ता है और बड़ी संख्या में बनाया जा सकता है, तो उसे रोकने वाला हथियार भी सस्ता और बड़ी संख्या में उपलब्ध होना चाहिए.
गार्डियन आखिर करता क्या है?
गार्डियन को समझने के लिए इसे मिसाइल समझने की बजाय एक तेज रफ्तार इंटरसेप्टर ड्रोन मानना ज्यादा आसान है.
Powerus के मुताबिक गार्डियन-1 का अधिकतम रफ्तार 290 से 340 किलोमीटर प्रति घंटा है. इसकी क्रूजिंग स्पीड करीब 160 किलोमीटर प्रति घंटा है. वर्किंग रेंज 15 किलोमीटर और मैक्सीमम फ्लाइट टाइम 28 मिनट बताया गया है. बैटरी के साथ इसका वजन 2.65 किलो है और ये अधिकतम 5,000 मीटर की ऊंचाई तक जा सकता है.
लेकिन असली बात इसकी रफ्तार नहीं, इसका तरीका है. गार्डियन किसी छोटे ड्रोन को दूर से महंगी मिसाइल की तरह उड़ाकर नहीं मारता. इसे टारगेट की तरफ भेजा जाता है और ये खुद जाकर उससे टकराता है. इसे ‘काइनेटिक इनटरसेप्शन’ (kinetic interception) यानी सीधा संपर्क करके नष्ट करने की तकनीक कहा जाता है.
Powerus के अनुसार गार्डियन की इंगेजमेंट प्रक्रिया में रडार से टारगेट डेजिगनेशन, मैन्यूअल लॉन्च, रडार करेक्शन और फिर कैमरा-गाइडेड विज़ुअल इंटरसेप्शन शामिल है. अंतिम चरण में ऑपरेटर टारगेट को कैमरे के जरिए देखता है और इंटरसेप्टर को उस तक ले जाता है.
सीधी भाषा में कहें तो सामने ड्रोन आया, उसका पता चला, गार्डियन छोड़ा गया और गार्डियन ने जाकर उसे टक्कर मार दी. यही वजह है कि इसे "ड्रोन किलर" कहा जा रहा है.
लेकिन गार्डियन कोई जादुई हथियार नहीं है
गार्डियन बैलिस्टिक मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने के लिए नहीं बना है. Gulf News ने भी साफ लिखा है कि ये PAC-3 जैसे सिस्टम का विकल्प नहीं है. PAC-3 जैसे महंगे इंटरसेप्टर्स का काम ज्यादा बड़े और खतरनाक मिसाइल खतरों से निपटना है. गार्डियन का निशाना मुख्य रूप से ड्रोन्स और 'ग्रुप 3-क्लास के मानवरहित खतरे' (Group 3-class unmanned threats) हैं.
मतलब ये नहीं कि अमेरिका अब महंगी मिसाइलों को अलविदा कहने वाला है. बल्कि मामला उल्टा है. महंगी मिसाइल को उस टारगेट के लिए बचाना ज्यादा समझदारी है, जिसे सस्ता इंटरसेप्टर नहीं रोक सकता.
छोटे ड्रोन के लिए छोटा हथियार. बड़े खतरे के लिए बड़ा हथियार. यही ‘परत-दर-परत सुरक्षा’ (layered defence) का बेसिक आइडिया है.
गार्डियन की कीमत इतनी कम कैसे?
गार्डियन की कीमत करीब $5,000 (लगभग ₹4.8 लाख) बताई गई है. ये कीमत The New York Times की रिपोर्ट के हवाले से Jerusalem Post और Gulf News दोनों ने रिपोर्ट की है.
Powerus की अपनी मौजूदा वेबसाइट कीमत प्रकाशित नहीं करती, लेकिन कंपनी अपने गार्डियन को परंपरा (legacy) इंटरसेप्टर्स के मुकाबले 200:1 कास्ट एडवांटेज वाला सिस्टम बताती है. इसलिए $5,000 वाली कीमत को कंपनी की ‘आधिकारिक रूप से प्रकाशित विशेषताओं’ (official published specifications) के बजाय हालिया मीडिया रिपोर्ट्स के रूप में देखना ज्यादा सही है.
और ये फर्क सिर्फ कागज पर नहीं है. गार्डियन को हल्का रखा गया है. इसे एक या बहुत छोटी टीम से ऑपरेट किया जा सकता है. इसकी मैन्यूफैक्चरिंग को भी बड़े पैमाने पर बढ़ाने के लिए मॉड्यूलर आर्किटेक्चर पर जोर दिया गया है.
Powerus की मौजूदा जानकारी के मुताबिक गार्डियन प्रोडक्शन क्षमता 1,000 यूनिट प्रति महीने से बढ़ाकर चार महीने में 5,000 यूनिट प्रति महीने करने की योजना बताई गई है.
UAE में क्यों बन रहा है?
अब कहानी का दिलचस्प हिस्सा आता है यानी यूएई. Powerus जुलाई 2026 से UAE में गार्डियन के कलपूर्जे (components) और असेंबली (assembly) पर काम कर रही है, इसकी जानकारी 23 अगस्त की Jerusalem Post रिपोर्ट में दी गई है. रिपोर्ट के मुताबिक वहां ‘3डी- प्रिंटेड कम्पोनेंट’ (3D-printed components) तैयार करके फाइनल प्रोडक्ट असेम्बल किया जा रहा है.
इसका एक बड़ा कारण बिल्कुल प्रैक्टिकल है. जिस इलाके में ड्रोन अटैक हो रहे हैं, वहीं अगर इंटरसेप्टर तैयार हो जाए तो सप्लाई चेन छोटी हो जाती है.
लेकिन UAE की दिलचस्पी सिर्फ खरीदारी तक सीमित नहीं है. रिपोर्टिंग के मुताबिक देश अपने इलाके में ऐसी रक्षा उत्पादन क्षमता विकसित करने में भी दिलचस्पी दिखा रहा है.
युद्ध के दौरान ये क्षमता बहुत मायने रखती है. क्योंकि अगर किसी देश को हर इंटरसेप्टर बाहर से मंगाना पड़े तो युद्ध लंबा खिंचने पर सप्लाई ही सीमित हो जाती है.
Powerus को मिला ₹2,135 करोड़ का ठेका
Powerus ने 21 अगस्त 2026 को मीडिल ईस्ट की संवेदनशील ऑयल और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर (critical oil and gas infrastructure) की सुरक्षा के लिए $22.3 मीलियन (लगभग ₹213.5 करोड़) के कॉमर्शियल कॉन्ट्रैक्ट की घोषणा की. कंपनी के मुताबिक इस कॉन्ट्रैक्ट में काउंटर-UAS डिटेक्शन, ट्रैकिंग, क्लासिफिकेशन और जल्दी चेतावनी देने की क्षमता (early-warning capabilities) शामिल हैं. आगे इंटरसेप्टर तकनीक को भी इस आर्किटेक्चर में जोड़े जाने की संभावना रखी गई है.
ध्यान देने वाली बात ये है कि $22.3 मीलियन (लगभग ₹213.5 करोड़) वाला कॉन्ट्रैक्ट गार्डियन इंटरसेप्टर्स की खरीद की कीमत बताने वाला आंकड़ा नहीं है. ये ‘व्यापक काउंटर-UAS सुरक्षा’ (broader Counter-UAS protection) कॉन्ट्रैक्ट है.
यानी सेंसर से लेकर कमांड सेंटर तक एक पूरा नेटवर्क तैयार करने की दिशा में काम हो रहा है.
मिडिल ईस्ट में ये इतना बड़ा मुद्दा क्यों बन गया?
मिडिल ईस्ट में हालिया संघर्ष ने एयर डिफेंस की जरूरत को जमीन पर ला दिया है. Business Standard की 24 अगस्त की रिपोर्ट के मुताबिक UAE पर 500 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलों और 2,200 से ज्यादा Iranian ड्रोन्स दागे जाने की जानकारी दी गई है. रिपोर्ट में इन हमलों से जान-माल और इंफ्रास्ट्रचर को हुए नुकसान का भी उल्लेख है.
ऐसी स्थिति में सवाल सिर्फ ये नहीं रहता कि आपके पास PAC-3 कितने हैं. सवाल ये भी होता है कि अगर अगले दिन फिर सैकड़ों ड्रोन्स आ जाएं तो क्या आपके पास हर एक के लिए महंगा इंटरसेप्टर मौजूद है?
यहीं गार्डियन जैसे सिस्टम की जरूरत समझ आती है.
अब भारत को देखिए
भारत के लिए ये कोई दूर की कहानी नहीं है. पाकिस्तान की तरफ से सीमा पार ड्रोन्स के जरिए हथियार और दूसरे सामान भेजने की घटनाओं ने पिछले कुछ वर्षों में काउंटर-ड्रोन सिस्टम की जरूरत बढ़ाई है. भारत ने भी इस दिशा में कई अलग-अलग तकनीक पर काम किया है.
DRDO की सामग्री में भारत की मल्टी लेयर काउंटर-ड्रोन क्षमता में इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, जैमिंग, रडार और हार्ड किल सिस्टम का उल्लेख मिलता है. एक DRDO डॉक्यूमेंट में एंटी-ड्रोन सिस्टम के लिए 360-डिग्री रडार कवरेज और सॉफ्ट किल तथा हार्ड किल क्षमताओं का ब्यौरा दिया गया है.
लेकिन भारत की सबसे दिलचस्प डेवलपमेंट में से एक है भार्गवास्त्र.
भारत का भार्गवास्त्र क्यों महत्वपूर्ण है?
भार्गवास्त्र एक इंडिजिनियस काउंटर-ड्रोन सिस्टम है, जिसे सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड (Solar Defence and Aerospace Limited) ने विकसित किया है. DRDO की आधिकारिक क्लिपिंग के मुताबिक मई 2025 में इसके परीक्षण गोपालपुर सीवर्ड फायरिंग रेंज में किए गए थे.
सिस्टम छोटे इनकमिंग ड्रोन्स को डिटेक्ट करके हार्ड किल मोड में खत्म करने के लिए बनाया गया है. इसमें माइक्रो रॉकेट का इस्तेमाल किया जाता है. DRDO की जानकारी के मुताबिक पहले लेयर में ‘अनगाइडेड माइक्रो रॉकेट’ (unguided micro-rockets) और दूसरी परत में ‘अनगाइडेड माइक्रो मिसाइल’ (guided micro-missile) का इस्तेमाल किया जा सकता है. रडार छोटे आसमानी खतरों को 6 से 10 किलोमीटर तक डिटेक्ट कर सकता है, जबकि पहला इंटरसेप्शन लेयर करीब 2.5 किलोमीटर तक के टारगेटs के खिलाफ टेस्ट किया गया था.
सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि भार्गवास्त्र को लो-कॉस्ट काउंटर-स्वार्म सिस्टम के तौर पर पेश किया गया है. यानी भारत में भी वही सवाल पूछा जा रहा है जो अमेरिका पूछ रहा है.
ड्रोन सस्ता है तो उसे गिराने का तरीका भी महंगा क्यों हो?
क्या भारत के पास गार्डियन जैसा ₹4.8 लाख वाला इंटरसेप्टर है?
यहां सनसनी से थोड़ा बचना जरूरी है. उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के आधार पर ये कहना सही नहीं होगा कि भारत के पास गार्डियन-1 की हूबहू कॉपी या ठीक ₹4.8 लाख की कीमत वाला ऑपरेशनल इंटरसेप्टर मौजूद है.
लेकिन कॉन्सेप्ट के लेवल पर भारत काफी आगे बढ़ चुका है. भार्गवास्त्र जैसे सिस्टम स्वार्म ड्रोन्स के खिलाफ तुलनात्मक रूप से कम लागत वाला हार्ड किल अप्रोच दिखाते हैं. DRDO की 2026 की सामग्री में स्लिंगशॉट एंटी-ड्रोन (Slingshot anti-Drone) सिस्टम का भी उल्लेख है, जिसमें सॉफ्ट किल और हार्ड किल दोनों अप्रोच की बात की गई है.
इसका मतलब ये है कि भारत की दिशा सिर्फ "ड्रोन को जाम कर दो" तक सीमित नहीं है. पहले ड्रोन को खोजो. फिर उसकी पहचान करो. अगर इलेक्ट्रॉनिक तरीके से रोक सकते हो तो रोक दो. नहीं तो फिजिकल इंटरसेप्शन करो.
और अगर सामने ऐसा टारगेट है जिसके लिए महंगा मिसाइल ही जरूरी है, तभी उस कैटेगरी का हथियार इस्तेमाल करो.
असली कहानी गार्डियन की नहीं, 'Cost Per Kill' की है
पूरी कहानी में सबसे बड़ा बदलाव गार्डियन का नाम नहीं है. बदलाव उस सोच में है जो इसके पीछे है. अब युद्ध में सिर्फ ये नहीं देखा जाएगा कि किसी देश के पास कितनी मिसाइलों हैं. ये भी देखा जाएगा कि एक इनकमिंग ड्रोन को रोकने में औसतन कितना खर्च हो रहा है.
मान लीजिए सामने 100 ड्रोन्स हैं. अगर हर ड्रोन के लिए करोड़ों की मिसाइल चाहिए तो डिफेंस बजट और मिसाइल स्टॉक दोनों पर दबाव आएगा. लेकिन अगर उन्हीं टारगेट के लिए कुछ लाख रुपये का इंटरसेप्टर काम कर सकता है, तो तस्वीर बदल जाती है.
हां, हर टारगेट पर सस्ता इंटरसेप्टर काम नहीं करेगा. कभी मौसम समस्या बनेगा, कभी टारगेट की स्पीड, कभी इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर. कुछ ड्रोन्स के खिलाफ जैमर बेहतर होगा, कुछ के खिलाफ काइनेटिक इंटरसेप्टर और कुछ खतरों के सामने मिसाइल डिफेंस ही जरूरी रहेगा.
लेकिन यही तो नया मॉडल है. हर चूहे के पीछे शेर लेकर भागने की जरूरत नहीं. शेर को बड़े जानवर के लिए बचाइए.
और भारत के लिए सबक?
भारत को इस दौड़ में सिर्फ किसी अमेरिकी प्रोडक्ट की नकल करने की जरूरत नहीं है. जरूरत है ऐसी इंडिजिनियस तकनीक की जो भारतीय परिस्थितियों में काम करे और बड़े पैमाने पर बनाई जा सके.
सीमा पर छोटे ड्रोन्स के खिलाफ ऐसा सिस्टम चाहिए जो मोबाइल हो, जल्दी तैनात हो और एक साथ कई टारगेट से निपट सके. बड़े सैन्य संघर्ष में वही तकनीक और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगी.
भार्गवास्त्र, DRDO का एंटी-ड्रोन सिस्टम और दूसरे इंडिजिनियस काउंटर-UAS प्रोग्राम इसी दिशा के अलग-अलग हिस्से हैं.
दुनिया की सेनाएं अब एक अजीब दौड़ में हैं. एक तरफ ड्रोन बनाने की लागत लगातार नीचे जा रही है. दूसरी तरफ उसे रोकने की लागत कई जगह अभी भी बहुत ज्यादा है. अगर ये gap बना रहा तो सस्ता ड्रोन सिर्फ हथियार नहीं रहेगा. वो महंगे डिफेंस सिस्टम को थकाने का तरीका बन जाएगा.
इसलिए आने वाली जंग का एक बड़ा सवाल शायद ये नहीं होगा कि आपके पास कितनी मिसाइलों हैं. सवाल होगा, आपके पास कितने ऐसे जवाब हैं जो दुश्मन के सस्ते ड्रोन्स को सस्ते में रोक सकें. और इसी वजह से करीब ₹4.8 लाख का गार्डियन आज दुनियाभर में हेडलाइन बन गया है.
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एक नजर में गार्डियन का पूरा गणित
आखिर में पूरी कहानी को एक बार फिर उस सवाल पर लाकर छोड़िए, जहां से हमने शुरुआत की थी. दुश्मन के पास सस्ता ड्रोन है, तो क्या उसे रोकने के लिए हर बार करोड़ों की मिसाइल ही निकालनी पड़ेगी? गार्डियन का पूरा एक्सपेरिमेंट इसी सोच को चुनौती देता है. इस ग्राफिक्स के जरिए इन सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं.

आखिरकार आने वाली ड्रोन वॉर सिर्फ इस बात से तय नहीं होगी कि किसके पास सबसे ताकतवर मिसाइल है. असली बाजी शायद उसके हाथ में होगी, जो कम कीमत में ज्यादा ड्रोन्स रोक सके.
क्योंकि आसमान की अगली लड़ाई में निशाना ड्रोन जरूर होगा, लेकिन असली मुकाबला हथियारों की कीमत का भी होगा.
वीडियो: ईरान की ड्रोन स्ट्रैटेजी कौन चुरा रहा? Shahed-136 की कहानी













