इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने पूर्व सैन्य प्रमुख और विपक्ष के नेता गादी आइजेनकोट को सरकार बनाने की पहली कोशिश करने के लिए चुन लिया है. अभी तक इजरायल की राजनीति में डेडलॉक था जो इस फैसले के बाद बदल सकता है. ये केयरटेकर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए बड़ा सेटबैक माना जा रहा है.
इजरायल के राष्ट्रपति ने गादी आइजेनकोट को नई सरकार बनाने का दिया मौका, देखते रह गए नेतन्याहू!
इजरायल में अभी तक राजनीतिक डेडलॉक बना हुआ था. लेकिन अब राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने पूर्व सैन्य प्रमुख और विपक्ष के नेता गादी आइजेनकोट को सरकार बनाने की पहली कोशिश करने के लिए मौका दिया है. यहां से आइजेनकोट के पास तीन रास्ते हैं.

द टाइम्स ऑफ़ इजरायल की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रेसिडेंट इसाक हर्ज़ोग 8 नवंबर को शाम 5 बजे राष्ट्रपति भवन पर गादी आइजेनकोट को ऑफिशियली सरकार बनाने का अधिकार सौंपेंगे. इसके बाद उनके पास सरकार बनाने के लिए 28 दिन का समय होगा.
अगर ज़रूरत पड़ी, तो राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग उन्हें 14 दिनों तक की मोहलत अलग से भी दे सकते हैं. फिर भी अगर आइजेनकोट सरकार बनाने में फेल हो जाते हैं तो इसके बाद बेंजामिन नेतन्याहू को ये मौक़ा दिया जा सकता है.
हर्ज़ोग ने बताया कि उन्होंने आइजेनकोट और नेतन्याहू को अपने फ़ैसले के बारे में बता दिया है. इससे पहले, उन्होंने बुधवार और गुरुवार को 'नेसेट' (इज़राइली संसद) में जगह पाने वाली सभी पार्टियों के साथ बैठक में नई सरकार के गठन पर चर्चा की थी.
आइजेनकोट को ही पहला मौका क्यों?रिपोर्ट के मुताबिक, जब राष्ट्रपति ने सभी पार्टियों के साथ मीटिंग की तो उसमें ज्यादातर पार्टियों ने पहला नाम आइजेनकोट का लिया. उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए 120 सदस्यीय संसद के सांसदों से 67 सिफारिशें मिलीं, जबकि नेतन्याहू को 46 सिफारिशें मिलीं. ये आंकड़े उन्हें गठबंधन बनाने की प्रक्रिया को शुरू करने का पहला मौका देते हैं.
लेकिन, आइजेनकोट के लिए सबकुछ इतना आसान नहीं है. सभी विचारधारा को साथ लेकर चलना उनके लिए मुश्किल होगा. क्योंकि अलग-अलग विचारधारा वाली पार्टियां एक-दूसरे के साथ बैठना नहीं चाहती हैं. अरब पार्टियों को लेकर यहूदी खेमे की पार्टियों में ज्यादा कड़वाहट है.
27 अक्टूबर को हुए चुनावों में बेंजामिन नेतान्याहू की लिकुड पार्टी ने 27 सीटें जीतीं, जो किसी एक पार्टी को मिली सबसे ज़्यादा सीटें हैं. उनके गठबंधन को कुल 53 सीटें ही मिल सकीं, जो संसदीय बहुमत के लिए ज़रूरी 61 सीटों के आंकड़े से 8 सीटें कम हैं.
वहीं, आइज़ेनकोट की यशार पार्टी ने 21 सीटें जीतीं और वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. उनके चार पार्टियों वाले, यहूदी-नेतृत्व वाले गुट के पास 48 सीटें हैं. इजरायल के अरब अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करने वाली दो पार्टियों ने कुल 19 सीटें जीतीं और बैठक के दौरान आइज़ेनकोट का समर्थन किया. एक और बात, नेतान्याहू की लंबे समय से सहयोगी रही 'यूनाइटेड तोराह जुडाइज्म' (UTJ) पार्टी ने किसी भी उम्मीदवार का समर्थन करने से इनकार कर दिया है. इस पार्टी के पास 7 सीटें हैं.
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आइजेनकोट के लिए रास्ता कितना आसान?अब यहां से आइजेनकोट के पास तीन रास्ते हैं. एक संभावना ये है कि एक ऐसी अल्पसंख्यक सरकार बने जिसे अरब सांसदों का बाहरी समर्थन हासिल हो. दूसरी संभावना उन कट्टर धार्मिक दलों के साथ समझौता करने की है, जो पारंपरिक रूप से नेतन्याहू के साथ रहे हैं. तीसरा विकल्प एक व्यापक एकता सरकार का हो सकता है, जिसमें नेतन्याहू की लिकुड पार्टी भी शामिल हो. हालांकि इनमें से कोई भी आसान विकल्प नहीं है.
इंडिया टुडे के मुताबिक, आइजेनकोट ने बार-बार कहा है कि वे नेतन्याहू के साथ वाली सरकार में काम नहीं करेंगे. यहां एक और चुनौती आइजेनकोट की चार शर्तें हैं, जो उन्होंने संभावित साझेदारों के सामने रखी हैं. इन सब में रा' म पार्टी ने आइजेनकोट का समर्थन किया है.
द टाइम्स ऑफ़ इजरायल की एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक, रा’ म ये नहीं चाहती कि आइजेनकोट का 48 सदस्यों वाला गुट UTJ के समर्थन पर निर्भर रहे. इससे वे किसी भी तरह की जवाबी चाल को रोक सकेंगे, सरकार बनाने में मदद कर सकेंगे और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को जल्द से जल्द हटा सकेंगे. भले ही इससे एक स्थिर सरकार मिलने की कोई गारंटी न हो.
इजरायल में आगे क्या होगा?इजरायल की राजनीति में अरब सांसदों की भूमिका सबसे अहम है. आइजेनकोट ने अरब पार्टियों के साथ औपचारिक रूप से जुड़ने से इनकार कर दिया है, जिसका मतलब है कि वे उनकी 19 सीटों के सहारे पारंपरिक बहुमत नहीं बना सकते. हालांकि, उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की सिफारिश करने के उनके फैसले ने उन्हें शुरुआत में सबसे मजबूत जनादेश दिया है.
फिलहाल असली लड़ाई इस बात पर है कि क्या आइजेनकोट अपनी 67 सिफारिशों को सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत में बदल सकते हैं या नहीं? इसके लिए उन्हें मध्यमार्गी, दक्षिणपंथी, वामपंथी, अरब और कट्टर-रूढ़िवादी सांसदों के बीच गहरे मतभेदों को दूर करना होगा. अगर वे ऐसा न कर पाए तो अगला मौका नेतन्याहू को दिया जाएगा. इजरायल के पास ये प्रक्रिया पूरी करने के लिए केवल 100 दिन हैं. अगर तब तक सरकार नहीं बन पाई तो देश में फिर से चुनाव कराया जाएगा.
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