अरब पार्टी के नेताओं को इजरायल की सत्ता में हिस्सेदारी चाहिए, लेकिन हमास को आतंकी संगठन कहने से डर रहे हैं. इजरायल में Ra'am पार्टी के नेता मंसूर अब्बास ने राष्ट्रपति आइजैक हर्ज़ोग के सामने कुछ ऐसा ही रुख अपनाया. हुआ ये कि 5 नवंबर को इजरायल के राष्ट्रपति आइजैक हर्ज़ोग के साथ सरकार बनाने को लेकर बातचीत हुई. बातचीत के दौरान ये सवाल उठा. हर्ज़ोग ने मंसूर अब्बास से पूछा कि क्या वो हमास को आतंकी संगठन मानते हैं? इस पर अब्बास ने सीधे जवाब देने से परहेज किया. साफ-साफ हां या ना कहने के बजाय कहा कि ऐसा बयान देने से उनकी और उनके परिवार की जान को खतरा हो सकता है.
हमास पर खेल अटका... नेतन्याहू को रोकने के लिए अरब पार्टियों के आगे बस एक शर्त
इजरायल में अरब पार्टी - Ra'am - के नेता मंसूर अब्बास ने राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग से मुलाकात की. इस दौरान एक शर्त पर काफी बात हुई जो जुडी है Hamas से. इसे सुनकर मंसूर अब्बास ने सीधे जवाब देने से परहेज किया. साफ-साफ हां या ना कहने के बजाय कहा कि इससे उनकी और उनके परिवार की जान को खतरा हो सकता है.

उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी लंबे समय से आतंकवाद और राजनीतिक हिंसा का विरोध करती आई है. लेकिन वो फिलिस्तीनियों के साथ बातचीत का एक पुल बने रहना चाहते हैं. उन्होंने कहा, 'मुझे ये जगह दीजिए कि मैं एक पुल बनकर रह सकूं. मुझे और मेरे परिवार को अपनी सुरक्षा का भी ख्याल रखना है.'
उन्होंने इस मुद्दे को अपनी और अपने परिवार की जिंदगी-मौत से जुड़ा मामला बताया. हालांकि, अब्बास ने ये भी कहा कि हमास और दूसरे सशस्त्र संगठनों को हथियार छोड़ने चाहिए. उन्होंने दो-राष्ट्र समाधान यानी इजरायल और फिलिस्तीन के अलग-अलग देशों के रूप में अस्तित्व का समर्थन भी किया. अब समझते हैं कि हमास को लेकर इजरायल में इतना विवाद क्यों है. टाइम्स ऑफ इजरायल की रिपोर्ट के मुताबिक, मंसूर अब्बास हमास पर खुलकर बोलने से क्यों बच रहे हैं? और उस हमास ने इजरायल के साथ ऐसा क्या किया था, जिसके बाद पूरा मिडिल ईस्ट युद्ध की आग में झुलस गया?
इसके लिए हमें 7 अक्टूबर 2023 की तारीख पर जाना होगा. उस दिन हमास और दूसरे फिलिस्तीनी हथियारबंद गुटों ने गाजा स्ट्रिप से इजरायल पर बड़ा हमला किया. हजारों रॉकेट दागे गए और हमास के फाइटर्स जमीन, समुद्र और हवा के रास्ते इजरायल के कई इलाकों में घुस गए. उन्होंने आम नागरिकों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया. यूनाइटेड नेशंस की जांच के मुताबिक, इस हमले में 12 सौ से ज्यादा लोगों की मौत हुई और 250 से ज्यादा लोगों को बंधक बनाकर गाजा ले जाया गया. यूनाइटेड नेशंस के जांच आयोग ने नागरिकों की जानबूझकर हत्या और बंधक बनाने जैसी घटनाओं को वॉर क्राइम माना.
इस हमले के बाद इजरायल ने हमास के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया. गाजा में बड़े पैमाने पर बमबारी और फिर जमीनी कार्रवाई हुई. इजरायल का घोषित मकसद हमास की सैन्य और शासन व्यवस्था को खत्म करना और बंधकों को वापस लाना था. इस युद्ध में गाजा में भारी तबाही और बड़े पैमाने पर जान माल का नुकसान हुआ.
अब सवाल है कि इसमें ईरान कहां से आ गया? दरअसल, ईरान लंबे वक्त से हमास समेत इजरायल के विरोधी कई सशस्त्र संगठनों को समर्थन देता रहा है. इनमें लेबनान का हिज्बुल्लाह और यमन के हूती भी शामिल हैं. इजरायल ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानता है. लेकिन ईरान और इजरायल के बीच तनाव सिर्फ हमास तक सीमित नहीं था. दोनों देशों के बीच ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम, बैलिस्टिक मिसाइलों और क्षेत्र में उसके प्रभाव को लेकर लंबे समय से टकराव चल रहा था.
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य हमले शुरू किए. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने इसकी वजह ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम, मिसाइल क्षमता और अमेरिकी सैनिकों और सहयोगी देशों के लिए खतरे को बताया. अमेरिका का कहना था कि ईरान को न्यूक्लियर वेपन यानी परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना और उसकी सैन्य क्षमता को कमजोर करना जरूरी है. वहीं ईरान ने इन हमलों के जवाब में इजरायल और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए. इस तरह दोनों देशों के बीच टकराव एक बड़े युद्ध में बदल गया.
अब वापस मंसूर अब्बास के बयान पर लौटते हैं. दरअसल, इजरायल में हाल ही में हुए चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए 19 अरब सांसदों का समर्थन अहम हो गया है. इनमें मंसूर अब्बास की Ra'am पार्टी के आठ सांसद भी शामिल हैं. उनकी पार्टी ने पूर्व सेना प्रमुख गादी आइज़ेनकोट को प्रधानमंत्री बनाने के लिए समर्थन दिया है. लेकिन आइज़ेनकोट ने अपने साथ सरकार में शामिल होने वाली पार्टियों के सामने शर्त रखी है कि उन्हें हमास को आतंकी संगठन मानना होगा. ऐसे में अब्बास का बयान सरकार बनाने की बातचीत को और मुश्किल बना सकता है. दूसरी तरफ, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इसी मुद्दे को उठाकर विपक्ष और अरब पार्टियों के गठबंधन पर सवाल खड़े कर रहे हैं.
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यानी इजरायल में सरकार बनाने की लड़ाई अब सिर्फ सीटों के गणित तक सीमित नहीं रह गई है. हमास को आतंकी संगठन मानने का सवाल भी राजनीतिक गठबंधन की एक बड़ी शर्त बन गया है. मंसूर अब्बास एक तरफ हमास को हथियार छोड़ने के लिए कह रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ उसे आतंकी संगठन कहने से बच रहे हैं.
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