जब आप कोई यात्रा करते हैं तो आपके पास सामान या लगेज भी होता ही होगा. ट्रेन या बस में तो आप जितना मर्ज़ी सामान ले जाएं लेकिन फ्लाइट में ऐसा नहीं होता. वहां पर एक निश्चित सीमा तक ही आप लगेज ले जा सकते हैं. इस ‘निश्चित सीमा’ को ही ‘बैगेज अलाउंस’ कहा जाता है.# बैगेज अलाउंस:
अब जब आप फ्लाइट में यात्रा करते हैं तो आपके सामान दो तरह के होते हैं. पहला ‘कैरी ऑन लगेज’ यानी जो आप अपने साथ फ्लाइट में ले जा सकते हैं. बोले तो, जिसे आप अपने साथ ‘कैरी’ करते हैं – जैसे लैपटॉप, ब्रीफ़केस, एक दो किताबें, लेडीज़ पर्स आदि. ‘कैरी-ऑन’ को ‘हैंड-बैगेज’ भी कहते हैं क्यूंकि ये सदा आपके पास ही रहता है. दूसरी तरह का बैगेज होता है ‘चेक-इन बैगेज’ या ‘चेक-इन लगेज’ – वो जो आपको ‘चेक-इन’ करना होता है यानी ये ‘चेक-इन लगेज’ आपको पूरी यात्रा समाप्त होने पर ही मिलता है – जैसे बक्सा, बिल्ली, कुत्ता, गोल्फ बैग आदि.# ‘चेक-इन’ और ‘कैरी-ऑन’:
अब ऐसा नहीं है कि आप जितना चाहें कैरी-ऑन बैग अपने साथ ले जा सकते हैं. होने को तो ये एयरलाइन-टू-एयरलाइन बदलता है लेकिन आम तौर पर ‘कैरी-ऑन बैगेज-अलाउंस’ पन्द्रह किलो होता है. कभी कभी ये पन्द्रह किलो प्लस एक लैपटॉप या पन्द्रह किलो प्लस एक पर्स भी हो सकता है. इसी तरह चेक-इन बैगेज ले जाने की भी अपनी एक लिमिट होती है. और इस लिमिट के निर्धारण के लिए दो तरह के मानक अपनाए जाते हैं. पहला ‘पीस’ कांसेप्ट – यानी आप कितने पीस या अदद अपने साथ ‘चेक-इन’ कर सकते हैं. और दूसरा होता है ‘वेट’ कांसेप्ट – यानी आप कितना वजन अपने साथ ‘चेक-इन’ कर सकते हैं. ‘पीस-कांसेप्ट’ आमतौर पर आपको ट्रांस-अटलांटिक यात्राओं में ही देखने को मिलता है. ‘ट्रांस-अटलांटिक’ मतलब वह यात्रा जिसमें आपको अटलांटिक महासागर पार करना होता है. अमेरिका, कनाडा से भारत या यूरोप. या भारत, यूरोप, एशिया से अमेरिका, कनाडा. ज़्यादातर पीस कांसेप्ट में 2 पीस का अलाउंस होता है – यानि दो अदद. वेट कांसेप्ट डोमेस्टिक यानी अंतर्राज्यीय यात्राओं में और एशिया, यूरोप तक की यात्राओं में देखने को मिलता है. भारत के अंदर यात्रा कर रहे हैं तो ये पन्द्रह से पच्चीस किलो तक हो सकता है. और भारत से बाहर जा रहे हैं तो तीस तक. बैगेज अलाउंस केवल एयरलाइन-टू-एयरलाइन ही नहीं वेरी करता बल्कि इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपकी ‘क्लास ऑफ़ सर्विस’ क्या है – यानी आप यदि बिज़नस क्लास में है तो आपको इकॉनमी क्लास से ज़्यादा बैगेज अलाउंस मिल सकता है.# क्या होता है ‘पीस’ और ‘वेट’ कांसेप्ट:
यानी आप कितने अदद या Piece (पीस) ले जा सकते हो ये पीस-कांसेप्ट वाले बैगेज अलाउंस में निर्धारित होता है और आप कितना किलो या कितने पाउण्ड का सामान ले जा सकते हो ये Weight (वेट)-कांसेप्ट वाले बैगेज अलाउंस में निर्धारित होता है.और हां ये ज़रुरी नहीं कि ट्रांस-अटलांटिक यात्राओं में हमेशा ही पीस कांसेप्ट और बाकि यात्राओं में हमेशा ही वेट कांसेप्ट लागू होगा. ये जरुर है कि कोई भी हवाई यात्रा हो इसके अलावा कोई और कांसेप्ट नहीं लागू होगा.
अब ऐसा नहीं है कि जितना बैगेज अलाउंस आपको मिला है आप उतना ही सामान ले जा सकते हैं बस. आप अगर कुछ एक्स्ट्रा देने को तैयार हैं तो कुछ एक्स्ट्रा सामान भी ले जा सकते हैं. रुकिए इस वाक्य को सही करते हैं – अगर आप ‘बहुत कुछ’ एक्स्ट्रा देने को तैयार हैं तो 'कुछ एक्स्ट्रा' सामान भी ले जा सकते हैं. मतलब ये कि थोड़ा सा एक्स्ट्रा सामान ले जाने के लिए आपको बहुत सारे पैसे देने पड़ते हैं. और इसी से बचने के लिए लोग कपड़े वगैरह बैग में डालने के बदले उन्हें पहनना पसंद करते हैं. क्यूंकि आपने क्या और कितना अधिक पहना है इसपर कोई एक्स्ट्रा चार्ज नहीं होता. तो इसी क्रम में हमारी कहानी का नायक आइसलैंड के एक एयरपोर्ट पहुंच गया दस स्वेटर और आठ पैंट पहनकर. जांचकर्ताओं को ये अजीब लगा, बहुत अजीब. इसलिए उसे रोका. नहीं माना तो गिरफ्तार कर लिया.# एक्स्ट्रा बैगेज और रीसेंट इंसिडेंट:
बंदा डेयरिंग लेकिन डम्ब – ट्वीट कर दिया कि रंग भेद के चलते मुझे परेशान किया. मुझे उसका ये ट्वीट पढ़कर अजहरुद्दीन की याद आई. क्यूं, ये मत पूछिए, नीचे घटना का वीडियो देखिए:
@British_Airways hi being held at Iceland Keflavik airport because I had no baggage put all the clothes on and they still won't let me on. Racial profiling? Or..... pic.twitter.com/NKgpe1cPFP
— Ryan Hawaii (@RYAN_HAWAII) January 10, 2018
ये रहा दूसरा वीडियो:
Disappointing. pic.twitter.com/7f8UFi9jb4 — Ryan Hawaii (@RYAN_HAWAII) January 10, 2018
और ये रहा ट्वीट:





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