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कैटरीना कैफ का मजाक उड़ाने वाले जानें, मां बनने के बाद महिला का शरीर कैसे बदलता है?

वैसे तो पोस्टपार्टम रिकवरी के शुरुआती 6 हफ्ते काफी अहम होते हैं. लेकिन कुछ बदलावों को ठीक होने में 6 महीने से लेकर 1 साल या उससे भी ज़्यादा समय लग सकता है.

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कुछ दिनों पहले कैटरीना एक फंक्शन में दिखाई दी थीं (फोटो: Getty Images)

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  • बॉलीवुड एक्ट्रेस कैटरीना कैफ को उनके बढ़े हुए वजन को लेकर सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया, जो उनके हालिया एक फंक्शन में दिखाई देने के बाद वायरल हुई फोटोज और वीडियोज़ की वजह से हुआ।
  • डिलीवरी के बाद महिलाओं के शरीर में हॉर्मोनल और मांसपेशियों के बदलाव होते हैं, जिनकी वजह से वजन कम होने में समय लगता है और इसके कारण नई मांओं की बॉडी शेमिंग हो सकती है।
  • पारिवारिक समर्थन नई मां की पोस्टपार्टम रिकवरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे महिला को मानसिक और शारीरिक रूप से बेहतर सहारा मिल सकता है और बॉडी शेमिंग से बचा जा सकता है।

बॉलिवुड एक्ट्रेस कैटरीना कैफ को पिछले दिनों सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल किया गया. वजह था उनका बढ़ा हुआ वज़न. कुछ दिनों पहले कैटरीना एक फंक्शन में दिखाई दी थीं. इसके बाद उनकी फोटोज़ और वीडियोज़ खूब वायरल हुए. लोगों ने कॉमेंट करना शुरू कर दिया. किसी ने कहा कि कैटरीना ने प्रेग्नेंसी के बाद खुद पर ध्यान नहीं दिया. तो किसी ने कहा कि अब तो उनका करियर खत्म है.

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हालांकि कई लोग कैटरीना के समर्थन में भी आए. आना भी चाहिए, क्योंकि प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के बाद एक महिला का शरीर कई तरह के बदलावों से गुजरता है. इन्हीं बदलावों के बारे में हम आपको बताएंगे आज. डॉक्टर से समझेंगे कि डिलीवरी के बाद महिलाओं का शरीर कैसे बदलता है. कुछ महिलाओं का वज़न जल्दी कम हो जाता है, जबकि कुछ को ज्यादा समय क्यों लगता है. पोस्टपार्टम से रिकवर होने में कितना समय लगता है. वज़न को लेकर होने वाली ट्रोलिंग का नई मांओं की मेंटल हेल्थ पर क्या असर पड़ सकता है. और परिवारवालों को पोस्टपार्टम रिकवरी के दौरान किस तरह का सपोर्ट देना चाहिए. 

डिलीवरी के बाद महिलाओं का शरीर कैसे बदलता है?

ये हमें बताया डॉक्टर रोहन पालशेतकर ने. 

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डॉ. रोहन पालशेतकर, आईवीएफ स्पेशलिस्ट, ऑब्सटेट्रिशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट, डी.वाई.पाटिल हॉस्पिटल, महाराष्ट्र

प्रेग्नेंसी के दौरान यूटेरस यानी गर्भाशय काफी बढ़ जाता है. डिलीवरी के बाद गर्भाशय धीरे-धीरे अपने पहले के आकार में आने लगता है. प्रेग्नेंट स्टेज से नॉन-प्रेग्नेंट स्टेज तक पहुंचने में करीब 6 हफ्ते लगते हैं. ब्रेस्ट में भी कई बदलाव आते हैं. बच्चे को ब्रेस्टफीडिंग कराने के लिए ब्रेस्ट तैयार हो रहे होते हैं. कई हॉर्मोन्स की वजह से ब्रेस्ट का साइज़ बढ़ता है. ब्रेस्ट में दूध बनना शुरू होता है, खासकर जब बच्चे को ब्रेस्टफीड कराया जाता है. 

तीसरा बदलाव हॉर्मोन्स में होता है. इनकी वजह से मूड स्विंग्स, पोस्टपार्टम ब्लूज़ और गंभीर मामलों में पोस्टपार्टम डिप्रेशन हो सकता है. डिलीवरी के बाद पेट तुरंत पहले जैसा नहीं होता. कई बार पेट की मांसपेशियां खिंच जाती हैं और उनके बीच गैप आ सकता है. गंभीर मामलों में डायस्टेसिस रेक्टी की समस्या हो सकती है. यानी पेट की मुख्य मांसपेशियों का बीच से अलग हो जाना है. 

वजाइनल डिलीवरी के दौरान पेल्विक फ्लोर मसल्स पर भी असर पड़ सकता है. इसकी वजह से पेल्विक फ्लोर मसल्स कमज़ोर हो सकती हैं. कुछ महिलाओं को इसकी वजह से यूरिन लीकेज की समस्या भी हो सकती है.

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डिलीवरी के बाद वज़न जल्दी कम क्यों नहीं होता?

हर महिला की प्रेग्नेंसी जर्नी अलग होती है. डिलीवरी के बाद वज़न कम होना कई फैक्टर्स पर निर्भर करता है. जैसे जीन्स, हॉर्मोन्स, मेटाबॉलिज़्म, प्रेग्नेंसी के दौरान कितना वज़न बढ़ा, प्रेग्नेंसी से पहले पेट की मांसपेशियां कितनी मज़बूत थी, ट्विन्स (जुड़वा बच्चे) हैं या नहीं, प्रेग्नेंसी के दौरान पेट की मांसपेशियों के बीच गैप बढ़ा है या नहीं, इन सभी फैक्टर्स का असर वज़न पर पड़ता है. सिज़ेरियन डिलीवरी के बाद कम से कम 3 महीने तक एक्सरसाइज़ न करने की सलाह दी जाती है. ऐसा इसलिए क्योंकि जल्दी एक्सरसाइज़ करने से हर्निया का रिस्क बढ़ सकता है.

पोस्टपार्टम से रिकवर होने में कितना टाइम लगता है? 

वैसे तो पोस्टपार्टम रिकवरी के शुरुआती 6 हफ्ते काफी अहम होते हैं. लेकिन कुछ बदलावों को ठीक होने में 6 महीने से लेकर 1 साल या उससे भी ज़्यादा समय लग सकता है. जैसे मांसपेशियों की ताकत, हॉर्मोन्स, वज़न और हेयरफॉल कम होना. प्रेग्नेंसी के बाद शरीर में कई तरह के बदलाव होते हैं. लेकिन ये समझना ज़रूरी है कि कभी-कभी रिकवरी के बाद भी शरीर प्रेग्नेंसी से पहले जैसा नहीं हो पाता. प्रेग्नेंसी के बाद शरीर में कुछ बदलाव लंबे समय तक रह सकते हैं. इसे लेकर चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. ये शरीर में होने वाले सामान्य बदलाव हैं, जो कई महिलाओं में देखे जा सकते हैं. कुछ मामलों में शरीर समय के साथ पहले जैसी स्थिति में भी आ सकता है.

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प्रेग्नेंसी के दौरान शरीर में कई हॉर्मोनल चेंजेस होते हैं (फोटो: Magnific)

बॉडी-शेमिंग का नई मांओं की मेंटल हेल्थ पर क्या असर?

डिलीवरी के बाद महिला को अक्सर कम नींद मिलती है. उसके पास एनर्जी भी कम होती है. वो अपना ज़्यादातर समय बच्चे को फीड कराने और उसकी देखभाल करने में बिताती है. ऐसे में उस पर सिर्फ फिज़िकल स्ट्रेस नहीं होता. उसे इमोशनल स्ट्रेस भी झेलना पड़ता है. इसलिए इस दौरान बॉडी शेमिंग करना बिल्कुल सही नहीं है. इससे महिला पर इतना इमोशनल स्ट्रेस पड़ सकता है कि उसे पोस्टपार्टम ब्लूज़ या पोस्टपार्टम डिप्रेशन हो सकता है. कुछ मामलों में पोस्टपार्टम डिप्रेशन के इलाज के लिए दवाइयां भी लेनी पड़ सकती हैं.

इन सबसे गुजरना आसान नहीं है. एक संवेदनशील समाज की पहचान ये भी है कि वो प्राकृतिक कारणों की वजह से हुए शारीरिक बदलावों के लिए किसी का मजाक नहीं उड़ाता. किसी भी व्यक्ति के शरीर पर कोई आपत्तिजनक टिप्पणी नहीं करनी चाहिए. कुदरत ने इंसानी नस्लें आगे बढ़ाने के लिए महिलाओं को चुना है. इसकी कीमत वे अपने शरीर से कई तरह के समझौते कर चुकाती हैं. वजन बढ़ना उनमें से एक है. इसके लिए उनका मजाक उड़ाना या उनके करियर को लेकर गलत कॉमेंट करना हमारी असंवेदनशीलता को ही साबित करता है. इससे पूरी तरह बचना चाहिए. और मां बनी महिला को परिवार और आसपास के लोगों से सपोर्ट और हौसला मिलना चाहिए.

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पोस्टपार्टम रिकवरी के दौरान परिवारवाले किस तरह सपोर्ट दें?

नई मां को अपने शरीर को रिकवर होने का समय देना चाहिए. जल्दी वज़न कम करने के लिए क्रैश डाइट नहीं करनी चाहिए. क्रैश डाइट से शरीर में दूध बनने की मात्रा कम हो सकती है. इससे महिला को एनर्जी की कमी महसूस हो सकती है और थकान बढ़ सकती है. इसका असर मां और बच्चे, दोनों पर पड़ सकता है. परिवारवालों को नई मां के वज़न या शरीर को लेकर कॉमेंट नहीं करना चाहिए. इसके बजाय परिवार को उनकी मदद करनी चाहिए. 

फीडिंग, बच्चे की सफाई और बोतल को साफ़ करने जैसे कामों में उनकी मदद की जा सकती है. इससे नई मां का वर्कलोड कम होगा. उन्हें महसूस होगा कि पूरा परिवार उनके साथ है और उन्हें सपोर्ट कर रहा है. परिवार को नई मां के इमोशंस पर भी ध्यान देना चाहिए. पोस्टपार्टम ब्लूज़ के लक्षण हर किसी को आसानी से समझ नहीं आते. लेकिन अगर इन लक्षणों को समय रहते पहचान लिया जाए, तो बिना दवाओं के भी मदद मिल सकती है.

चाहे कोई महिला हो या पुरुष, किसी के भी वज़न को लेकर टिप्पणी करने से बचना चाहिए. आपको नहीं पता कि सामने वाला अपने शरीर या वज़न को लेकर किस दौर से गुजर रहा है.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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