आपने स्ट्रोक के बारे में सुना है? स्ट्रोक तब होता है जब दिमाग के किसी हिस्से में खून का फ्लो रुक जाता है या दिमाग की नस फट जाती है. पहले माना जाता था कि स्ट्रोक सिर्फ बुज़ुर्गों को पड़ता है. लेकिन आजकल कम उम्र में भी स्ट्रोक के मामले बढ़ रहे हैं.
कम उम्र में ही हो रहा स्ट्रोक, 'BE FAST' याद रखा तो सीरियस कंडीशन से बचे सकते हैं
स्ट्रोक के लक्षण होने पर मरीज़ को खाने-पीने के लिए कुछ न दें. मरीज़ बेहोश हो तो उसे दाएं या बाएं करवट से लिटाएं, ताकि मुंह से निकलने वाले तरल पदार्थ सांस की नली में न जाएं.

ICMR यानी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की एक स्टडी है. इसके मुताबिक, भारत में स्ट्रोक का हर 7 में से एक मरीज़ 18 से 44 साल के बीच का होता है. देश में आने वाले स्ट्रोक के 10 से 15% मामले 40 से कम उम्र में आते हैं. यानी स्ट्रोक अब सिर्फ बुज़ुर्गों को ही नहीं होता, युवाओं में भी इसके मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं.
पर आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? यही जानेंगे आज ‘वर्ल्ड स्ट्रोक डे’ पर. डॉक्टर से समझेंगे कि आजकल कम उम्र में स्ट्रोक के मामले क्यों बढ़ रहे हैं. स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण क्या हैं. अगर किसी को स्ट्रोक पड़ रहा हो, तो क्या करें, क्या न करें. स्ट्रोक के बाद रिकवरी में कितना समय लगता है, और इसका इलाज व बचने का तरीका क्या है.
कम उम्र में स्ट्रोक का ख़तरा क्यों बढ़ रहा?
ये हमें बताया डॉक्टर नितिन कुमार राय ने.

पहले स्ट्रोक के आम कारण थे- हाइपरटेंशन, डायबिटीज़, हाई कोलेस्ट्रॉल, मोटापा, शराब-सिगरेट पीना और सुस्त जीवनशैली. आजकल युवाओं में शराब-सिगरेट का सेवन बढ़ गया है. उनकी जीवनशैली भी पहले के मुकाबले ज़्यादा सुस्त है. वो पर्याप्त नींद नहीं लेते और एक्सरसाइज़ भी नहीं करते. युवाओं में स्ट्रेस भी बढ़ रहा है. इन सभी वजहों से हाई बीपी, डायबिटीज़ और मोटापे का रिस्क बढ़ता है. अनहेल्दी लाइफस्टाइल की वजह से कोलेस्ट्रॉल भी बढ़ सकता है. इन्हीं वजहों से आजकल कम उम्र में स्ट्रोक के मामले सामने आ रहे हैं.
स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण
स्ट्रोक के शुरुआती लक्षणों को ‘BE FAST’ से याद रख सकते हैं.
- B यानी बैलेंस. अगर अचानक बैलेंस बनाने में दिक्कत हो रही है, तो ये स्ट्रोक का लक्षण हो सकता है.
- E यानी आइज़. अगर अचानक देखने में दिक्कत हो रही है. सामने की चीज़ें आधी दिखाई दे रही हैं. डबल विज़न हो रहा है यानी एक ही चीज़ दो दिख रही है, या फिर चीज़ें धुंधली दिख रही हैं, तो ये भी स्ट्रोक का लक्षण हो सकता है.
- F यानी फेस. अगर चेहरे के एक तरफ़ कमज़ोरी आ रही है, तो ये स्ट्रोक का लक्षण हो सकता है.
- A यानी आर्म और लेग वीकनेस. अगर हाथ या पैर में अचानक कमज़ोरी आ रही है, तो ये स्ट्रोक का लक्षण हो सकता है.
- S यानी स्पीच. अगर ज़ुबान लड़खड़ाए. बोलते समय शब्द साफ़ न निकलें. अचानक साधारण वाक्यों को समझने में परेशानी हो या दूसरों की बात न समझ आए, तो ये भी स्ट्रोक का लक्षण हो सकता है.
- T यानी टाइम. इनमें से कोई लक्षण दिखने पर उसके शुरू होने का समय नोट करें और तुरंत अस्पताल पहुंचें.
इन लक्षणों के साथ अगर निगलने में दिक्कत हो. शरीर का आधा हिस्सा महसूस न हो, तो ये भी स्ट्रोक के लक्षण हो सकते हैं.
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अगर आपके सामने किसी को स्ट्रोक पड़ रहा हो, तो क्या करें?
आपको या परिवार में किसी को स्ट्रोक के लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत एंबुलेंस बुलाएं. मरीज़ को ऐसे नज़दीकी अस्पताल ले जाएं, जहां स्ट्रोक के इलाज की सुविधा हो. मरीज़ में लक्षण शुरू होने का समय नोट कर लें. उसकी पुरानी मेडिकल रिपोर्ट्स भी अपने साथ ले जाएं. क्या नहीं करना चाहिए, ये जानना भी ज़रूरी है. स्ट्रोक के लक्षण होने पर मरीज़ को खाने-पीने के लिए कुछ न दें. अगर मरीज़ बेहोश है, तो उसे दाएं या बाएं करवट से लिटाएं, ताकि मुंह से निकलने वाले तरल पदार्थ सांस की नली में न जाएं. मरीज़ को एस्पिरिन दवा न दें, क्योंकि कई बार स्ट्रोक की वजह दिमाग में ब्लीडिंग हो सकती है. इसलिए मरीज़ को खुद से कोई दवा न दें और उसे तुरंत अस्पताल ले जाएं.
स्ट्रोक के बाद रिकवरी में कितना समय लगता है?
स्ट्रोक के लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि दिमाग का कौन-सा हिस्सा प्रभावित हुआ है. स्ट्रोक के बाद शरीर के एक हिस्से में कमज़ोरी आ सकती है या सुन्नपन महसूस हो सकता है. मरीज़ को निगलने में दिक्कत हो सकती है. याद्दाश्त से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं. बोलने और भाषा समझने में परेशानी हो सकती है. कई बार मरीज़ बात समझने में दिक्कत महसूस करता है. अगर बात समझ भी ले, तो उसे बोलकर बताने में परेशानी होती है.
स्ट्रोक के बाद रिकवरी में फिज़ियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी और स्पीच थेरेपी की अहम भूमिका होती है. कई बार रिकवरी में 3 से 6 महीने लग सकते हैं.

स्ट्रोक का इलाज और बचाव
जब स्ट्रोक के मरीज़ को इमरजेंसी में लाया जाता है, तो सबसे पहले MRI और सीटी स्कैन किया जाता है. इससे पता चलता है कि स्ट्रोक किस तरह का है.
इस्केमिक स्ट्रोक में दिमाग की खून की नली ब्लॉक हो जाती है. इसमें खून का थक्का घोलने के लिए दवाएं दी जाती हैं. इसे थ्रोम्बोलिसिस कहते हैं. वहीं, दिमाग में खून की बड़ी नली ब्लॉक होने पर थ्रोम्बेक्टॉमी की जाती है. इसमें कैथेटर की मदद से खून का थक्का निकाला जाता है.
हैमरेजिक स्ट्रोक में खून की नली फटने से दिमाग में खून बहने लगता है. अगर इसमें दिमाग का अंदरूनी दबाव बढ़ रहा है. तब न्यूरोसर्जन की मदद से सर्जरी की जाती है. मिनी स्ट्रोक हो, तो दवाओं से मरीज़ की स्थिति संभालने की कोशिश करते हैं.
स्ट्रोक से बचने के लिए हेल्दी लाइफस्टाइल फॉलो करें. रोज़ योग और एक्सरसाइज़ करें. आपकी डाइट में फाइबर से भरपूर चीज़ें शामिल करें. फल-सब्ज़ियां ज़्यादा खाएं. शराब-सिगरेट न पिएं. डायबिटीज़ और हाई बीपी को दवाओं और डाइट से कंट्रोल में रखें. मोटापा हो, तो फिज़िकल एक्टिविटी बढ़ाएं और हेल्दी डाइट लें. पर्याप्त नींद लें. स्ट्रेस कम करने के लिए योग व मेडिटेशन करें. इनसे स्ट्रोक का ख़तरा कम करने में मदद मिल सकती है.
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स्ट्रोक और लकवे में फर्क
कई लोग स्ट्रोक और लकवे को एक ही चीज़ समझते हैं, पर दोनों में फर्क है. स्ट्रोक एक कारण है और लकवा उसका एक लक्षण. स्ट्रोक तब होता है, जब दिमाग के किसी हिस्से में खून का फ्लो अचानक रुक जाता है या दिमाग की कोई नस फट जाती है. वहीं, लकवे में शरीर का कोई हिस्सा कमज़ोर हो जाता है या उसे हिलाने-डुलाने में परेशानी होती है. स्ट्रोक के अलावा भी लकवे के दूसरे कारण हो सकते हैं. अगर किसी को लकवा हो या उसमें स्ट्रोक के दूसरे लक्षण दिखें, तो आप बिना देर किए मरीज़ को डॉक्टर के पास ले जाएं.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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