हमारा शरीर जिस सहारे सीधा खड़ा रहता है. चलता है. झुकता है. रोज़मर्रा के काम करता है. वो है हमारी रीढ़ की हड्डी. पहले रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याएं बुढ़ापे की निशानी समझी जाती थीं. लेकिन अब कम उम्र में ही लोग कमर और गर्दन के दर्द से परेशान हैं. अब ऐसा क्यों है और अपनी रीढ़ की हड्डी को दुरुस्त कैसे रखें, ये जानेंगे आज. World Spine Day पर डॉक्टर से ये भी समझेंगे कि रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याओं के शुरुआती लक्षण क्या हैं और कब आपको सर्जरी की ज़रूरत पड़ सकती है.
कमर-गर्दन का ये वाला दर्द आपकी रीढ़ की हड्डी को तबाह कर सकता है
World Spine Day पर डॉक्टर से ये भी समझेंगे कि रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याओं के शुरुआती लक्षण क्या हैं और कब आपको सर्जरी की ज़रूरत पड़ सकती है. और कैसे आप अपनी रीढ़ को दुरुस्त रख सकते हैं.

ये हमें बताया डॉक्टर विक्रम सिंह ने.

रीढ़ की हड्डी हमारे शरीर को सहारा देती है. ये हमें सीधे खड़े होने, बैठने, झुकने और घूमने में मदद करती है. इसके भीतर रीढ़ की नसें सुरक्षित रहती हैं. इन नसों के ज़रिए दिमाग और शरीर के बाकी हिस्सों के बीच संदेश आते-जाते हैं. रीढ़ की हड्डियों के बीच मौजूद डिस्क झटकों का असर कम करती हैं. ये डिस्क रीढ़ को लचीला बनाए रखने में मदद करती हैं. जिसकी वजह से हम कई तरह की एक्टिविटीज़ कर पाते हैं. रीढ़ को स्वस्थ रखना सिर्फ दर्द से बचने के लिए ही नहीं, बल्कि बेहतर जीवन जीने के लिए भी ज़रूरी है.
युवाओं में बढ़ते कमर और गर्दन दर्द की एक मुख्य वजह मॉडर्न लाइफस्टाइल है. आजकल लोग देर तक एक ही पोज़ीशन में बैठे रहते हैं. लंबे समय तक मोबाइल और लैपटॉप चलाते हैं. फिज़िकल एक्टिविटी भी बहुत कम हो गई है. बढ़ता वज़न और स्मोकिंग भी रीढ़ से जुड़ी समस्याओं का रिस्क बढ़ाते हैं. अचानक ज़्यादा शारीरिक मेहनत करने पर रीढ़ से जुड़ी समस्याएं गंभीर हो सकती हैं. जैसे अपनी क्षमता से ज़्यादा वज़न उठाने पर रीढ़ पर दबाव बढ़ सकता है.
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रीढ़ की हड्डी में समस्या होने के शुरुआती लक्षणगर्दन, कमर में दर्द और अकड़न रहना शुरुआती लक्षणों में सबसे आम है. इस तरह के दर्द को मैकेनिकल पेन कहा जाता है. यानी ऐसा दर्द जो काम करने से बढ़ जाता है. समस्या बढ़ने पर कंधों में भी दर्द या अकड़न हो सकती है. पैरों में भी दर्द हो सकता है. कुछ लोगों को हाथों में झनझनाहट या करंट जैसा दर्द महसूस होता है, इसे रेडिकुलोपैथी कहते हैं.
कभी-कभी हाथ-पैरों में कमज़ोरी आ सकती है, इससे लकवे जैसी स्थिति बन सकती है. कुछ लोगों को अचानक पेशाब रुकने या पेशाब पर कंट्रोल कम होने की समस्या हो सकती है. चलने या खड़े होने के दौरान शरीर का बैलेंस बिगड़ सकता है. अगर दर्द लगातार बढ़ रहा है. साथ में बुखार और अचानक वज़न कम होने जैसे लक्षण हैं. तब स्कैन कराने की ज़रूरत पड़ सकती है.

रीढ़ से जुड़ी कई समस्याओं में एक्सरसाइज़ और दवाइयों से आराम मिल सकता है. ज़्यादातर मामलों में सर्जरी की ज़रूरत नहीं पड़ती. लेकिन अगर दवाइयों और एक्सरसाइज़ के बावजूद दर्द बढ़ रहा हो. स्कैन में भी कहीं नस पर ज़्यादा दबाव दिख रहा हो. तब सर्जरी की ज़रूरत पड़ सकती है.
अगर मरीज़ में लकवे जैसे लक्षण दिखने लगे हैं. मरीज़ के हाथ-पैरों में कमज़ोरी आ रही है. पेशाब पर कंट्रोल कम होता जा रहा है. ऐसी स्थिति को माइलोपैथी कहते हैं. इसमें भी अक्सर सर्जरी की ज़रूरत पड़ती है. रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर, ट्यूमर या जन्मजात समस्याओं में भी सर्जरी की ज़रूरत पड़ सकती है.
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रीढ़ की हड्डी को हेल्दी रखने के लिए क्या करें?रीढ़ की हड्डी को हेल्दी रखने के लिए तीन बातों का ध्यान रखें. पहली, रेगुलर एक्सरसाइज़ करें. हर किसी को एक्सरसाइज़ का एक रुटीन फॉलो करना चाहिए. वज़न कंट्रोल में रखें, क्योंकि शरीर का वज़न रीढ़ की हड्डी पर भी दबाव डालता है.
दूसरी, बैठने और काम करने के सही तरीके का ध्यान रखें. बैठते समय सही पोस्चर बनाए रखें. लंबे समय तक एक ही पोज़िशन में न बैठें. बीच-बीच में ब्रेक लेते रहें.
तीसरी, खानपान और पोषण का ध्यान रखें. अच्छी डाइट लें और ज़रूरत के अनुसार विटामिन D के लेवल की जांच कराएं. अक्सर नौकरीपेशा लोगों में विटामिन D की कमी होती है. सिगरेट पीने से भी बचें. इससे रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याओं का रिस्क बढ़ सकता है.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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