शरीर के अलग-अलग जोड़ों में दर्द, सूजन और अकड़न. ये अर्थराइटिस यानी गठिया का सबसे आम लक्षण है. कई बार जोड़ों के आसपास रेडनेस आ जाती है. सुबह उठने या देर तक बैठे रहने के बाद जोड़ों में खूब जकड़न महसूस होती है. जोड़ को मोड़ने या हिलने-डुलने में परेशानी आती है, और दिनभर खूब थकान रहती है.
'बुजुर्गों का अर्थराइटिस' जवानों को क्यों हो रहा? डॉक्टर से इलाज जानिए
आज World Arthritis Day पर यही जानेंगे. डॉक्टर से समझेंगे कि आजकल कम उम्र में ही जोड़ों में दर्द और अकड़न की शिकायत क्यों बढ़ रही है. अर्थराइटिस को लेकर कौन-सी आम धारणाएं गलत हैं. अर्थराइटिस का इलाज क्या है और इससे बचाव कैसे कर सकते हैं.

जिन्हें अर्थराइटिस है, वो जानते हैं कि जोड़ों का दर्द रोज़ के कामों को कितना मुश्किल बना देता है. कुछ वक्त पहले तक, इसे बुज़ुर्गों की बीमारी माना जाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब युवाओं में भी अर्थराइटिस के मामले खूब सामने आ रहे हैं. पर आखिर इसकी वजह क्या है? आज World Arthritis Day पर यही जानेंगे. डॉक्टर से समझेंगे कि आजकल कम उम्र में ही जोड़ों में दर्द और अकड़न की शिकायत क्यों बढ़ रही है. अर्थराइटिस को लेकर कौन-सी आम धारणाएं गलत हैं. अर्थराइटिस का इलाज क्या है और इससे बचाव कैसे कर सकते हैं.
कम उम्र में ही जोड़ों में दर्द और अकड़न क्यों?
ये हमें बताया डॉक्टर हेमंत शर्मा ने.

आजकल हमारी लाइफस्टाइल बहुत ज़्यादा आरामदायक और सुस्त हो गई है. हम अपने बुज़ुर्गों की तुलना में शारीरिक मेहनत और कामकाज कम करते हैं. काम की वजह से या दूसरी वजहों से हम लंबे समय तक बैठे रहते हैं. घर आने के बाद भी बैठ जाते हैं या लेटकर टीवी देखते हैं. सिगरेट-शराब पीना और एक्सरसाइज़ न करना भी अर्थराइटिस का ख़तरा बढ़ाता है.
हमारे जीन्स भी अर्थराइटिस के लिए ज़िम्मेदार होते हैं. अगर किसी व्यक्ति में ऐसे जीन्स हैं, जो अर्थराइटिस होने के लिए हमें ज़्यादा संवेदनशील बनाते हैं. तब इससे भी अर्थराइटिस होने का रिस्क बढ़ जाता है.
अर्थराइटिस को लेकर कौन-सी गलतफहमी सबसे आम?
अर्थराइटिस को लेकर एक गलतफहमी बहुत आम है. वो ये कि हर तरह के अर्थराइटिस में आखिरकार सर्जरी करानी ही पड़ती है, जबकि ऐसा नहीं है. अर्थराइटिस के अलग-अलग प्रकार होते हैं. कुछ में मांसपेशियों में दर्द हो सकता है, तो कुछ में जोड़ों में सूजन आती है. जैसे रूमेटॉइड अर्थराइटिस को दवाइयों से अच्छी तरह कंट्रोल कर सकते हैं. इससे कई मामलों में ऑर्थोपेडिक सर्जन के पास जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती.
लेकिन जब अर्थराइटिस गंभीर अवस्था में पहुंच जाए. जोड़ों की कार्टिलेज पूरी तरह घिस जाए, हड्डियां आपस में रगड़ने लगें. आपके जीवन की गुणवत्ता पर असर पड़ने लगे. रोज़ के काम करने में मुश्किल होने लगे. इंजेक्शन और वज़न कम करने जैसे उपायों से भी आराम न मिले. तब डॉक्टर सर्जरी की सलाह दे सकते हैं.
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अर्थराइटिस का इलाज क्या है?
अर्थराइटिस मुख्य रूप से दो तरह का होता है. पहला, जो किसी भी उम्र में हो सकता है. ये 5 साल के बच्चे को भी हो सकता है. इसे रूमेटॉइड अर्थराइटिस या इन्फ्लेमेटरी अर्थराइटिस कहते हैं. इसे दवाइयों की मदद से अच्छी तरह कंट्रोल किया जा सकता है. इसके इलाज के लिए रूमेटॉइड स्पेशलिस्ट होते हैं.
दूसरे तरह का अर्थराइटिस उम्र बढ़ने के साथ होता है, जिसे ऑस्टियोअर्थराइटिस कहते हैं. इसमें शरीर का वज़न बहुत अहम भूमिका निभाता है. वज़न ज़्यादा होने से जोड़ों पर ज़्यादा दबाव पड़ता है. इससे हड्डियों के सिरों को ढकने वाली कार्टिलेज (एक तरह का कुशन) धीरे-धीरे घिस सकती है. कुछ लोगों की टांगें स्वाभाविक रूप से थोड़ी टेढ़ी होती हैं. इससे भी अर्थराइटिस होने का रिस्क रहता है.
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अर्थराइटिस से कैसे बचें?
अपने वज़न को कंट्रोल में रखें. वज़न कंट्रोल करने के लिए खान-पान पर ध्यान देना होगा. जिन लोगों का काम लंबे समय तक बैठकर करने का है. उन्हें हर 40 मिनट में ब्रेक लेना चाहिए. ब्रेक के दौरान चलना-फिरना चाहिए. रोज़ थोड़ी देर एक्सरसाइज़ करनी चाहिए.
अर्थराइटिस से बचने के लिए एक्सरसाइज़ और हेल्दी वज़न मेंटेन करना बहुत ज़रूरी है. साथ ही ज़रूरी है अच्छी डाइट. अर्थराइटिस के मरीज़ों को अपने खाने में अदरक, अखरोट, बेरीज़, अंगूर, ब्रॉकली, पालक और फैटी फिश जैसी चीज़ें शामिल करनी चाहिए.
(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)
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