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अयोध्या भूमिपूजन से पहले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की 'धमकी' का क्या सुप्रीम कोर्ट लेगा संज्ञान?

बाबरी मस्जिद थी और हमेशा ही मस्जिद रहेगी. #HagiaSophia एक बेहतरीन उदाहरण है हमारे लिए. अन्यायपूर्ण, दमनकारी, शर्मनाक और बहुसंख्यक तुष्टिकरण के आधार पर लिया गया फैसला इसे नहीं बदल सकता है. दुखी होने की जरूरत नहीं है. कोई भी स्थिति हमेशा के लिए नहीं रहती है.

ये एक ट्वीट का हिंदी वर्जन है. ट्वीट किया था ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने. 4 अगस्त को. यानी राम जन्मभूमि पूजन कार्यक्रम से एक दिन पहले. लोग कह रहे हैं ये तो सीधे तौर पर धमकी है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अपमान है.

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AIMPLB का विवादित ट्वीट जो अब डिलीट हो चुका है.

विवाद बढ़ने का एक बड़ा कारण था हगिया सोफिया (#HagiaSophia) का उदाहरण देना. आप कहेंगे कि ये हगिया सोफिया क्या है?

हगिया सोफिया तुर्की के इस्तांबुल में एक म्यूजियम था. मगर इतिहास में जाएं तो ये दुनिया के सबसे बड़े चर्च में से एक रहा है. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक इसे छठी सदी में बाइज़ेंटाइन सम्राट जस्टिनियन के हुक्म से बनाया गया था. फिर जब उस्मानिया सल्तनत 1453 में आई तो इस चर्च को मस्जिद बना दिया गया. पहले विश्वयुद्ध में तुर्की की हार और फिर वहां उस्मानिया सल्तनत के ख़ात्मे के बाद मुस्तफ़ा कमाल पाशा का शासन आया. उन्हीं के शासन में 1934 में इस मस्जिद को म्यूज़ियम बनाने का फ़ैसला किया गया. जुलाई 2020 को तुर्की की एक कोर्ट ने इस म्यूज़ियम को फिर से मस्जिद में बदलने का रास्ता साफ कर दिया था जिसे तुर्की के शासक का पूरा सपोर्ट था.

हगिया सोफिया की बात आने से कई लोग बोले कि क्या ये एक इशारा है कि आने वाले वक्त में अयोध्या में भी हगिया सोफिया जैसा कुछ होगा. कई लोग इसे कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट भी बता रहे हैं. तो इसे जानने के लिए हमने बात की सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील उमेश शर्मा से. उन्होंने कहा कि इस मामले में स्टैंडिंग ऑर्डर नहीं है कि कोई इस मामले या जजमेंट पर बात नहीं कर सकता. इस जजमेंट पर लोग अपनी राय रख सकते हैं. मगर ट्वीट को वो साफ तौर पर कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट बताते हैं. साथ ही इसे कम्युनल भी कहते हैं. कंटेंप्ट क्यों, इस पर वो कहते हैं –

आप इस फैसले को डिमीन कर रहे हैं. आप फैसले को गलत कह सकते हैं. मगर उसका उपहास नहीं उड़ा सकते हैं. आप कह सकते हैं कि आपकी बात ठीक से नहीं सुनी गई, सारे फैक्ट नहीं लिए. मगर ये फैसला मेजॉरिटी अपीसिंग है, ये कहना रूल ऑफ लॉ का मज़ाक उड़ाना है. इसलिए ये कंटेंप्ट है.

लॉकडाउन में पूरी सैलरी देने के केंद्र के नोटिफिकेशन पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है.
सुप्रीम कोर्ट क्या इस ट्वीट पर संज्ञान ले सकता है, ये बड़ा सवाल है.

हमने उमेश शर्मा से ये भी जानना चाहा कि क्या इस ट्वीट पर सुप्रीम कोर्ट संज्ञान ले सकता है. तो उन्होंने कहा कि इसकी संभावना कम है. इस मामले में शायद ऐसा ना हो. इसमें कोई और कंटेंप्ट की अपील करता है तो कोर्ट ये कह सकता है कि ये हमारे और उनके बीच का मामला है. आप कौन हैं.

हमने इस ट्वीट की मंशा को और समझने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार शीबा असलम फहमी से बात की जो तीन तलाक जैसे मुद्दों पर काफी मुखर रही हैं, कट्टरपंथी स्टैंड के खिलाफ. वो बोलीं –

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक एनजीओ है. इसे मुसलमानों की खाप पंचायत ही समझ लीजिए. जब इन लोगों का बस तीन तलाक वाले मामले में चला नहीं तो इनको अपनी ताकत, चौधराहट कम होती नजर आई. अब खुद का वजूद बचाने के लिए इनको कोई लॉन्ग टर्म प्रोग्राम चाहिए जिससे ये लोगों को इमोशनली जोड़ते रहें. लोगों को ये अहसास दिलाते रहें कि हम आपके लिए लड़ंगे. हम ही कुछ करके दिखाएंगे. आगे वक्त बदलेगा.

शीबा कहती हैं कि ये ऐसी बेमतलब की बातें हैं जिनका कोई अंत नहीं है. आज का मुसलमान ये सब नहीं चाहता है. 20-21 साल के लड़कों को तो पता भी नहीं है कि तीन तलाक में क्या है. सबसे पहले इन लोगों ने इन मुद्दों पर विक्टिमहुड तैयार किया. अब इसको बढ़ाने के लिए ये फॉल्सहुड तैयार कर रहे हैं. मेरे जैसे ज्यादातर लोग खुद को विक्टिम नहीं मानते. रही फैसले की बात तो जैसा पहले ही कहा गया था कि हम फैसला मानेंगे. और लोगों ने माना भी. पूरे देश में कहीं कोई घटना नहीं हुई. बस यही बात कुछ लोगों को हजम नहीं हो रहा तो वो ऐसी बातें कर रहे हैं.

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हगिया सोफिया का जिक्र ट्वीट में करने पर शीबा कहती हैं कि हमने पहले भी उस मामले का विरोध किया था. हमने कहा था कि जब कोई ताकतवर आदमी इस तरह की हरकत करता है, छोटापन दिखाता है तो ये बहुत बदसूरत लगता है. यहां भी इसका जिक्र गलत है.

हमने AIMPLB के सचिव जफरयाब जिलानी से भी इस ट्वीट पर बात की. उनका पक्ष जानना चाहा. तो वो बोले –

मेरी जानकारी के मुताबिक ये ट्वीट डिलीट हो चुका है. मेरी जनरल सेक्रेटरी साहब से बात हुई थी, उनका कहना था कि ये हमारे अप्रूवल के बगैर ट्वीट हो गया. हम इसे डिलीट करवा रहे हैं.

AIMPLB ने सुन्नी वक्फ बोर्ड से अलग जाकर रिव्यू पिटीशन फ़ाइल करने का निर्णय लिया है.और सुन्नी वक्फ बोर्ड करेगा मीटिंग.
AIMPLB के सचिव जफरयाब जिलानी ने ट्वीट होने की वजह बताई.

हमने जब इस ट्वीट पर उनकी राय जाननी चाही तो उन्होंने कोई भी पब्लिक कमेंट करने से इनकार कर दिया. वो बोले जो जनरल सेक्रेटरी ने कह दिया, हमने वो मान लिया. आगे मुझे कुछ नहीं कहना.

खैर, ट्वीट अब डिलीट भी हो चुका है. कोई भी ट्वीट या बात डिलीट कब होती है. जाहिर सी बात है जब वो गलत हो. जफरयाब इस बात को मानते तो नहीं, बस वो कहते हैं कि बड़े लोगों के अप्रूवल के बगैर ये ट्वीट हो गया. कैसे हो गया, क्यों हो गया. क्या ये नहीं होना चाहिए था. उस पर वो कुछ नहीं कहते. फिर ट्वीट का क्या है, वो तो अपना काम कर चुका है. दूरियां बढ़ाने का काम. देखने वाला होगा कि क्या AIMPLB का कोई सदस्य इस पर आगे आकर माफी मांगता है या नहीं. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के रुख पर भी नजर रहेगी कि वो क्या इस पर संज्ञान लेती है या नहीं.


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