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भारत एक खोज और तमस का संगीत देने वाले दिग्गज कंपोज़र वनराज भाटिया का निधन

नेशनल अवार्ड विनिंग म्यूजिक कंपोज़र पद्मश्री वनराज भाटिया (Vanraj Bhatia) का 7 मई की सुबह मुंबई के अपने घर में स्वर्गवास हो गया. वो 93 साल के थे. बढ़ती उम्र के कारण पिछले कुछ महीनों से उनकी हालत काफ़ी खराब रहने लगी थी. हफ्तों से अपने बेड पर से भी नहीं उठे थे. वनराज अविवाहित थे और अकेले रहते थे. उनकी देखभाल एक हाउसहेल्पर करतीं थीं.

सोशल मीडिया पर वनराज भाटिया की मृत्य की खबर आने के बाद से फ़िल्म जगत में मातम पसरा हुआ है. प्रसून जोशी, हंसल मेहता, फ़रहान अख्तर जैसे कई कलाकार ट्वीट कर अपना शोक व्यक्त कर रहे हैं. केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भी अपना दुःख प्रकट करते हुए ट्वीट किया.लिखा,

वनराज भाटिया जी के गुज़र जाने की खबर सुन सदमे में हूं. ‘वागले की दुनिया’, ‘जाने भी दो यारों’ जैसे तमाम बेहतरीन स्कोर्स में वो अपनी अनगिनित यादें छोड़ गए हैं. उनके चाहने वालों के साथ मेरी सांत्वना है. ॐ शांति.

फ़रहान अख्तर ने वनराज जी के अदभुत काम को याद करते हुए लिखा ,

उनके ढेरों बेहतरीन संगीतकार्यों के अलावा मुझे ‘तमस’ का संगीत बहुत अच्छे से याद है. जो एक वेदना भरी चीख के साथ शुरू होता था. ऐसा संगीत किसी की भी रूह को झंझोड़ सकता है. और किसी का भी दिल तोड़ सकता है.

 

 

#बचपन से था संगीत का शौक

31 मई 1927 को मुंबई में जन्मे वनराज भाटिया की बचपन से ही संगीत में रूचि थी. वह छोटी उम्र में ही क्लासिकल संगीत की शिक्षा लेने लगे थे. किशोरावस्था में एक दिन वनराज जी ने रशियन कंपोज़र चायकॉस्की का पियानो कॉन्सर्ट सुना. चायकॉस्की की धुनें सुन वनराज का वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक की तरफ़ भी गहरा रुझान हो गया. खुद भी पियानो सीखने लगे. अगले चार साल पढाई के साथ-साथ पियानो भी सीखते रहे. एमए करने के बाद वनराज आगे पढने लंदन की रॉयल अकादमी ऑफ़ म्यूजिक में गए. यहां इनके सहपाठी विलियम एल्विन, एलन बुश जैसे लोग थे. जो आगे जाकर ख़ुद संगीत की दुनिया का बहुत बड़ा नाम बने. यहां म्यूजिक की शिक्षा पूरी कर वनराज ने कुछ साल पेरिस में बिताये. सन 59 में वनराज वापस इंडिया आ गए और यहां काम तलाशना शुरू कर दिया.

वनराज के करियर की शुरुआत हुई शक्ति सिल्क साड़ी के विज्ञापन के लिए जिंगल बनाने से. वनराज पहले व्यक्ति थे जिसने विज्ञापन के लिए म्यूजिक कंपोज़ किया था. भविष्य में भाटिया ने लिरिल, ड्यूलक्स जैसे बड़े ब्रांड्स को मिलाकर 7000 से ऊपर जिंगल्स कम्पोज़ किए. विज्ञापनों के लिए धुनें कम्पोज़ करने के साथ-साथ वनराज दिल्ली यूनिवर्सिटी के वेस्टर्न म्यूजिक डिपार्टमेंट में इंचार्ज के रूप में भी काम करते रहे.

2012 में हुए थे पद्मश्री से सम्मानित.
2012 में हुए थे पद्मश्री से सम्मानित.

#फ़िल्में,टीवी और विज्ञापन

वनराज भाटिया के फ़िल्मी सफ़र का आगाज़ 1974 में श्याम बेनेगल के साथ हुआ. बेनेगल ने अपनी डेब्यू फ़िल्म ‘अंकुर’ के म्यूजिक की ज़िम्मेदारी वनराज भाटिया को दी. ‘अंकुर’ का म्यूजिक काफ़ी सफ़ल हुआ. यहां से इनकी जोड़ी ऐसी बनी की फ्यूचर में रिलीज़ हुई श्याम बेनेगल की ‘त्रिकाल’,’मंथन’ समेत लगभग हर फ़िल्म का म्यूजिक वनराज ने ही दिया. वनराज ने उस वक़्त सिनेमा के बदलते दौर में लीक से हटकर फ़िल्म बनाने वाले कुंदन शाह, अपर्णा सेन, प्रकाश झा, सईद अख्तर मिर्ज़ा जैसे फ़िल्ममेकर्स के साथ यादगार काम किया.

विज्ञापनों और फ़िल्मों के संगसंग वनराज ने टीवी पर भी आला दर्जे का काम किया. ‘भारत एक ख़ोज’ का शानदार टाइटल ट्रैक भला कौन भूल सकता है. इस शानदार कार्य के अलावा ‘वागले की दुनिया’,’बनेगी अपनी बात’ जैसे कई शोज़ में भी उनके काम को खूब पसंद किया गया.

आर्ट फ़िल्मों के समतल मेनस्ट्रीम शाहरुख़ खान, सनी देओल, अनिल कपूर की ‘चमत्कार’,’बेटा’,’घातक’ जैसी फिल्मों में भी वनराज जी ने बैकग्राउंड स्कोर कंपोज़ किए. 2008 में आई राजकुमार संतोषी की फ़िल्म ‘हल्ला बोल’ में उन्होंने आखिरी बार संगीत दिया था. गोविंद नहलानी की टेलीफ़िल्म ‘तमस’ के लिए वनराज को नेशनल अवार्ड से नवाज़ा गया था. 2012 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से भी सम्मानित किया था.

#’तमस’ में गुज़ारे अंतिम वर्ष

वनराज जी को सम्मान और प्रशंसा खूब मिली. मगर जीवन प्रशंसा और सम्मान के सहारे चल पाता तो क्या ही बात होती. वनराज पिछले कई वर्षों से बदहाली में जी रहे थे. यूं कहें कि उनकी जिंदगी के अंतिम साल ‘तमस’ मतलब अंधेरे में गुजरे तो ये गलत ना होगा. घर के बर्तन बेच-बेच कर दिन गुज़ार रहे थे. 2018 के आस-पास उनकी इस दिल दुखाने वाली स्थिति की खबरें मीडिया में आयीं थीं. जिसके बाद एक्टर कबीर बेदी, डायरेक्टर सुधीर मिश्रा और कई संस्थाएं वनराज जी की मदद को आगे आईं थीं. 2019 में आमिर खान ने वनराज भाटिया के जीवन पर किताब लिखी जाने की खबर की घोषणा की थी. खबर थी की एक्टर दिलीप ताहिल के कहने पर डायरेक्टर, राइटर और फ़िल्म पत्रकार खालिद मोहम्मद वनराज के जीवन पर किताब लिखने वाले थे.


ये स्टोरी दी लल्लनटॉप में इंटर्नशिप कर रहे शुभम ने लिखी है.


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