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लड़के ने ऐसा काम किया, कूड़ा उठाने वाला पिता बोला- बहुत अमीर महसूस कर रहा हूं

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मध्य प्रदेश के देवास जिले में एक गांव है विजयगंज मंडी. देशभर की तरह यहां भी ढेर सारे कचरा बीनने वाले हैं. इसी कचरे को बेचकर जो पैसा आता है, उससे उनका पेट भरता है. यही काम करने वाले एक आदमी हैं रंजीत. पर रंजीत को अब ये काम करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. वो इसलिए क्योंकि उन्हें कचरा ढूंढते-ढूंढते हीरा मिल गया है. ये हीरा कोई और नहीं उनका बेटा आशाराम चौधरी है. अब आप सोचेंगे कि भई ऐसा क्या हो गया कि इतनी भौकाल झाड़ा जा रहा है. हुआ ये है कि उनका लड़का एम्स (AIIMS- All India Institute of Medical Sciences) में सेलेक्ट हो गया है. वो भी पहले ही अटेम्प्ट में. वो अब यहां एमबीबीएस की पढ़ाई करेंगे.

कहानी कुछ ऐसी है कि आशाराम के परिवार वाले कचरा बीनने का काम करते हैं. उनके पास न पेट भरने का कोई पर्मानेंट साधन है, न सिर के ऊपर छत. जैसे-तैसे कर के गुज़ारा होता है. लेकिन आशाराम को पढ़ने का शौक था. शुरुआत हुई गांव के ही सरकारी स्कूल से. लड़का होनहार था तो नवोदय विद्यालय में एडमिशन मिल गया. हाई स्कूल तक की पढ़ाई वहां से हुई. अब बारी थी ये तय करने की कि आगे क्या करना है. लड़के ने मेडिकल चुना. मेडिकल की पढ़ाई के लिए तो कोचिंग लेनी होती है जो काफी खर्चीली होती है. यहां-वहां पता लगाकर पुणे के एक मेडिकल इंस्टिट्यूट के बारे में पता चला. दक्षिण फाउंडेशन. ये एक एनजीओ है, जो कमजोर वर्ग से लोगों को शिक्षा संबंधी सुविधाएं उपलब्ध करवाती है. यहां एडमिशन होने की पूरी तैयारी हो गई. वहां पहुंचने पर इससे जुड़े अधिकारी घूस मांगने लगे. इसमें आशाराम की मदद की उनके जिले के ऐडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट कैलाश बुंदेला ने.

आशाराम ने गांव के सरकारी स्कूल और नवोदय विद्यालय से पढ़ाई की है.
आशाराम ने गांव के सरकारी स्कूल और नवोदय विद्यालय से पढ़ाई की है. अपने परिवारवालों के साथ आशाराम.

कैलाश की मदद से आशाराम के परिवार का बीपीएल कार्ड बन गया. ये कार्ड बन जाने के बाद आशाराम का एडमिशन दक्षिण फाउंडेशन में हो गया. नतीजतन, आज आशाराम एम्स जोधपुर में एमबीबीएस (MBBS) के स्टूडेंट हो गए हैं. इस सब के बारे में आशाराम के पिता रंजीत का कहना है – ‘मैंने ज़िंदगीभर कचरा बिन और बेचकर अपना गुज़ारा किया है. हमारे पास अपना घर तक नहीं है. इतना गरीब होने के बावजूद आज मैं खुद को बहुत अमीर महसूस कर रहा हूं. मेरा धन है मेरा बेटा, जिसने प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में एडमिशन पाकर मेरा सिर ऊंचा कर दिया है.’

खेतों से कूड़ा-कचरा चुनते आशाराम के पिता रंजीत.
खेतों से कूड़ा-कचरा चुनते आशाराम के पिता रंजीत.

इस बाबत जब इंडिया टुडे ने आशाराम से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि वो जो भी हैं या जो कुछ भी कर पाए हैं, वो उनके माता-पिता की वजह से ही संभव हो पाया है. वो एक अच्छा डॉक्टर बनकर देश की सेवा करना चाहते हैं. लल्लनटॉप की ओर से भी आशाराम को ढेर सारी बधाई और आगे के लिए गुड लक. :)


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