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मैथ्स की वो जीनियस, जिसे कभी हिजाब तो कभी गैर-मुस्लिम से शादी करने पर निशाना बनाया गया

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मैथ्स सबके बस की बात नहीं होती. इस कठिन सब्जेक्ट में भी सबसे ज़्यादा नाम जिस महिला का हुआ, वो थीं मरियम मिर्ज़ाख़ानी. 40 साल की थीं. 15 जुलाई, 2017 को ब्रेस्ट केंसर से उनकी मौत हो गई. मरियम वो महिला थीं, जिन्होंने मैथ्स की दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान ‘फील्ड्स मेडल’ हासिल किया था. जिसकी मौत पर ईरान में अब दुःख जताया जा रहा है. उसी मरियम को लोगों ने बिना हिजाब की फोटो ट्विटर पर शेयर होने की वजह से निशाना बनाया था. ये पहला मौका नहीं था, इससे पहले उनके गैर मुस्लिम पति की वजह से उनकी बेटी भी कानूनी विवाद में उलझी.

ईरान में पैदा हुईं मरियम को मिले फील्ड्स अवॉर्ड को मैथ्स का नोबल प्राइज भी कहा जाता है. ये सम्मान हर चार साल में एक बार दिया जाता है. इस सम्मान को हासिल करने वाले की उम्र दो साल से 40 साल के बीच हो सकती है. मिर्ज़ाख़ानी को ये अवॉर्ड ‘कॉम्प्लेक्स जियोमेट्री एंड डायनामिकल सिस्टम्स’ के लिए दिया गया था.

जब मरियम को हिजाब के लिए ट्रोल किया गया

अगस्त 2014 में जब ये ख़बर फैली कि मिर्ज़ाख़ानी को ‘फील्ड्स मेडल’ मिला है, तब ईरान की लोकल मीडिया और वहां की जनता, दो भागों में बट गए थे. हुआ ये था कि ईरान के राष्ट्रपति हसन रोहानी ने मिर्ज़ाख़ानी की बिना हिजाब की एक तस्वीर ट्वीट की थी. कट्टरपंथियों ने इस तस्वीर का विरोध किया और मिर्ज़ाख़ानी की उपलब्धि को सेलिब्रेट करने से इंकार कर दिया. जबकि दूसरे लोगों ने राष्ट्रपति के इस कदम की तारीफ़ की. इस घटना ने ईरान में एक क्रांति सी ला दी, जिसने लोगों को मजबूर कर दिया कि वो उन लोगों कि उपलब्धियों को समझें जो दूसरे देश में जाकर ईरान का नाम रोशन करते हैं.

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मिर्ज़ाख़ानी की शादी पर भी ईरान में सवाल उठाए गए थे, क्योंकि औरतों को दूसरे धर्म में शादी करने की अनुमति नहीं है. मरियम ने गैर मुस्लिम शख्स इवो ​​वोनड्रक से शादी की थी. चेक गणराज्य (Czech Republic) के रहने वाले इवो ​​वोनड्रक एक कंप्यूटर साइंटिस्ट हैं. इवो ​​वोनड्रक मुस्लिम नहीं थे इस वजह से मरियम और उनकी बेटी कानूनी पचड़े में पड़ गई थी. जिस सरकार ने गैर-इस्लामी पति के कारण, उनकी शादी और बच्ची को नहीं माना था, आज वो खुद उनकी मौत की ख़बर बता रहे हैं. वो भी उनकी उपलब्धियों को गिनाकर.

बचपन में मरियम लेखक बनना चाहती थीं. लेकिन बड़े भाई के कहने पर मैथ्स में आगे की पढ़ाई की और एल्जेब्रा में महत्वपूर्ण योगदान दिया. फील्ड्स मेडल जीतने वाली पहली महिला होने के साथ-साथ वो इसे पाने वाली पहली ईरानी भी थीं. मिर्ज़ाख़ानी स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में मैथमेटिक्स पढ़ा रही थीं. इनका जन्म 1977 में ईरान की राजधानी तेहरान में हुआ था. इन्होंने 1994 और 1995 में यानी 2 बार अंतरराष्ट्रीय मैथमेटिकल ओलंपियाड में गोल्ड मेडल जीता. फिर 1999 में तेहरान के शरीफ प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से मैथमेटिक्स में बीएसी की. इसके पांच साल बाद हावर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी खत्म की.

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मिर्ज़ाख़ानी, उनके पति और उनकी बेटी

ब्रेस्ट केंसर से जूझती मिर्ज़ाख़ानी की ये बीमारी बोन मैरो तक फैल गई थी. जब उन्हें फील्ड्स अवॉर्ड मिला था, तब उन्होंने कहा था, ‘मुझे मैथ्स में इतना मज़ा आता है, जितना किसी को कोई पज़ल सॉल्व करने में आता होगा. मैथ्स ऐसा है जैसे आप किसी जंगल में खो गए हों. आपके पास जितनी तरकीब, जितना ज्ञान है, वो सब लगा दो. थोड़े से लक के साथ आपको बाहर निकलने का रास्ता मिल ही जाएगा. फील्ड्स मेडल के अलावा भी उन्हें कई अवॉर्ड मिले. 2009 में इन्हें ब्लूमेंथल अवॉर्ड मिला. वहीं 2013 में अमेरिकन मैथमेटिकल सोसाइटी का ‘सैटर प्राइज़’ मिला.

वो हमेशा ही महिलाओं को मैथ्स में पढ़ाई करने के लिए उकसाती रहीं. उन्हें इस बात का दुख था कि उनके समय में महिलाओं को मैथ्स पसंद होते हुए भी इसी में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहन नहीं मिलता था. लेकिन इस बात की खुशी भी थी कि अब कहीं न कहीं समय बदल रहा है. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मैजिक वेंड थ्योरम रही. मैथ्स में जीनियस तो वो थी हीं, साथ ही एक बहुत अच्छी इंसान भी थीं.

उनके एक दोस्त फ़िरोज़ नादरी ने इंस्टाग्राम पर संदेश पोस्ट किया, ”आज एक रोशनी चली गई…हमेशा के लिए चली गई.”

  A beautiful mind.   A post shared by Firouz Naderi (@firouz_michael_naderi) on


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