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गोवा का वो बिल जिसमें मंत्री और तीन विभागों ने आपत्तियां लगाईं, फिर भी पास हो गया

गोवा विधानसभा ने पिछले महीने एक बिल पास किया था. नाम था भूमिपुत्र अधिकारिणी विधेयक, 2021. इसे लेकर तमाम सवाल उठे थे. अब एक RTI में मिली जानकारी से खुलासा हुआ है कि राजस्व, कानून और वित्त जैसे विभागों ने इस बिल पर गंभीर आपत्तियां उठाई थीं, इसके बावजूद इसे विधानसभा में रखा गया और पास भी कर दिया गया.

 

गोवा सरकार में राजस्व मंत्री (Revenue Minister) हैं जेनिफर मोनसेरेट. उन्होंने ही इस बिल को पेश किया था. RTI से पता चला है कि उनके विभाग ने इस बिल को लेकर आठ मुद्दे उठाए थे. इनकी जांच की जरूरत बताई थी. बिल को अगले विधानसभा सत्र तक टालने की राय दी थी. आइए बताते हैं पूरा मामला.

क्या है इस विधेयक में?

भूमिपुत्र अधिकारिणी विधेयक 29 जुलाई को गोवा विधानसभा में पेश किया गया था. इस विधेयक के उद्देश्य और कारणों के विवरण में बताया गया,

“यह विधेयक एक छोटी आवास इकाई के स्वयं के कब्जे वाले निवासी को स्वामित्व का हक देने का अधिकार प्रदान करता है. ऐसा इसलिए ताकि वह गरिमा और आत्म-सम्मान के साथ रह सके. भूमिपुत्र के रूप में मान्यता प्राप्त होने के बाद व्यक्ति 1 अप्रैल 2019 से पहले बनाए गए 250 वर्ग मीटर तक के अपने घर के स्वामित्व का दावा कर सकेगा.”

आसान शब्दों में बताएं तो इस विधेयक के अनुसार यदि गोवा में कोई व्यक्ति 30 साल से किसी जमीन पर रह रहा है और 1 अप्रैल 2019 से पहले वहां पर मकान बना चुका है तो उसे उस जमीन का मालिकाना हक दे दिया जाएगा. लेकिन वह केवल 250 वर्ग मीटर तक की जगह पर ही दावा कर सकेगा.

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सीएम प्रमोद सावंत ने विधानसभा में कहा था कि हर कोई चाहता है कि जिस घर में वह रहता है, जिसमें उसकी पीढ़ियाँ रह रही हों, वह उसका हो इसलिए हम ये विधेयक लेकर आ रहे हैं. (फोटो: साभार आजतक)

30 जुलाई को गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने सदन में इसकी जरूरत बताते हुए कहा था,

“गोवा का मूल निवासी या उसके माता-पिता बरसों से किसी जगह पर रहते हुए उस जमीन पर निर्माण कर लेते हैं लेकिन कई मामलों में जमीन उसके नाम पर नहीं होती. ऐसे में उनके सिर पर हमेशा तलवार लटकी रहती है कि कोई उनके खिलाफ (स्वामित्व को लेकर) केस दर्ज कर देगा. भूमि विभिन्न प्रकार की होती है जैसे पैतृक संपत्ति, सामुदायिक संपत्ति या पंचायत भूमि. हर कोई चाहता है कि जिस घर में वो रहते हैं, जिसमें उनकी पीढ़ियाँ रहती हैं, वह उनका हो.”

इस बिल में ये भी प्रावधान है कि सरकारी आवास में रहने वाले सरकारी कर्मचारी अपने क्वार्टर पर अधिकार का दावा कर सकते हैं.

29 जुलाई को यह बिल विधानसभा में पेश किया गया. इस पर अगले दिन तक चर्चा हुई. विपक्ष के बायकॉट के बाद 30 जुलाई की शाम को इसे पारित कर दिया गया.

राजस्व मंत्री ने क्या सवाल उठाए?

द इंडियन एक्सप्रेस ने RTI दस्तावेजों के हवाले से दावा किया है कि राजस्व मंत्री मोनसेरेट ने एक नोट में चेतावनी दी थी कि प्रस्तावित कानून कई मायनों में आपत्तिजनक है. यह निजी भूमि मालिकों, सरकारी विभागों, देवस्थानों और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील क्षेत्रों के हितों को खतरे में डालेगा. राजस्व विभाग ने राज्य सरकार को यह भी चेतावनी दी कि बिल के प्रावधान भूमि के जबरन हस्तांतरण को बढ़ावा देंगे, जो संविधान के अनुच्छेद 300 ए का उल्लंघन करेगा.

मोनसेरेट ने आधिकारिक नोट में कहा,

“विधेयक के कई अन्य निहितार्थ हैं, जिनके प्रत्येक प्रावधान पर विस्तृत चर्चा करके जांच करने की आवश्यकता है. उपरोक्त बिंदुओं की जांच के बाद, इसे अगले विधानसभा सत्र में पेश किया जा सकता है.”

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, राजस्व मंत्री जेनिफर मोनसेरेट ने 250 वर्ग मीटर तक की संपत्तियों के नियमितीकरण का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने लिखा,

“विधेयक यह स्पष्ट नहीं कि इसमें बहुमंजिला इमारतें शामिल होंगी या केवल एक मंजिल वाली. सेटबैक एरिया में घरों को लेकर जो विवाद हो सकता है, वह स्पष्ट नहीं किया गया है. सीआरजेड, इको-सेंसिटिव जोन आदि में निर्माण पर प्रतिबंध लागू होगा या नहीं, इसका भी पता नहीं चल पा रहा.”

RTI के मुताबिक, 30 जुलाई को अपनी फाइल नोटिंग में राजस्व सचिव संजय कुमार ने कहा,

“विधेयक राजस्व मंत्री द्वारा प्रशासनिक रूप से अनुमोदित (यानी अप्रूव) नहीं किया गया था.”

शायद इसी कारण जब राजस्व मंत्री जेनिफर मोनसेरेट को यह बिल पेश किया था तो कहा गया था कि समय की कमी के कारण विधेयक की पूरी तरह से जांच नहीं की गई है. इसके अप्रत्याशित व्यापक प्रभाव हो सकते हैं इसलिए विधेयक के प्रभाव को देखते हुए इसे सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए प्रकाशित किया जा सकता है.

कानून, वित्त विभाग की आपत्तियां

RTI के अनुसार, कानून विभाग ने 29 जुलाई को नोट लिखा था कि विधेयक को विधानसभा से पारित कराने के बाद राष्ट्रपति की अनुमति की जरूरत भी पड़ेगी. कारण है कि विधेयक का अनुच्छेद 300 ए से ओवरलैप होना. विभाग ने यह भी सलाह दी कि गोवा मुंडकर (बेदखली से संरक्षण) अधिनियम, 1975 के प्रावधानों पर भी विचार किया जाए ताकि पता लग सके कि यहां भी विधेयक ओवरलैप हो रहा है या नहीं.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, वित्तीय विभाग के अवर सचिव प्रणब जी भट ने फाइल में नोट लिखा था कि विधेयक को पेश करने की सिफारिश नहीं की गई थी. प्रणब ने कहा,

“विधेयक में यह बताया गया है कि अगर कोई 30 साल से एक ही जमीन पर रह रहा है, फिर चाहे वो किराए का मकान हो, उसे भूमिपुत्र बनाया जाएगा. लेकिन इसे ध्यान में रखते हुए प्रस्ताव की अनुशंसा उस तरह नहीं की जाती है जिस रूप में यह अभी है. इसमें अधिक विवरण की आवश्यकता है क्योंकि भूमि एक कीमती संसाधन है.”

‘भूमिपुत्र’ को लेकर भी हुआ विवाद

3 अगस्त को गोवा के मुख्यमंत्री ने मूल विधेयक के नाम में भी बदलाव किया. पहले इसका नाम भूमिपुत्र अधिकारिणी बिल था. जिसमें से पुत्र शब्द हटा दिया गया. दरअसल कुछ आदिवासी समुदायों का मानना है कि भूमिपुत्र शब्द का इस्तेमाल अब तक गौड़, कुन्बी या वेलिप समुदायों के लिए किया जाता था. इस बिल को लेकर उन्होंने आपत्ति भी जताई थी. उसके बाद विधेयक का नाम भूमि अधिकारिणी विधेयक कर दिया गया.

17 अगस्त को गोवा के मुख्यमंत्री सावंत ने इसका घोषणा करते हुए कहा था,

“लोगों की भावनाओं को देखते हुए भूमिपुत्र अधिकारिणी विधेयक का नाम बदलकर अब भूमि अधिकारिणी विधेयक किया गया है. इसे आगामी दो महीनों में होने वाले विधानसभा के अगले सत्र में दोबारा पेश किया जाएगा.”

गोवा के मुख्यमंत्री सावंत ने ये भी कहा कि केवल वो लोग जिनके नाम पर बिजली और पानी के कनेक्शन थे, वे ही इस बिल में दी जाने वाली छूट का फायदा उठा सकेंगे. जमीन की लीज डीड लेकर वहां निर्माण करने वालों को स्वामित्व का फायदा नहीं मिलेगा.

(ये स्टोरी हमारे यहां इंटर्नशिप कर रहे रौनक भैड़ा ने लिखी है.)


वीडियो- गोवा के सीएम प्रमोद सावंत का बयान महिलाओं की चिंता बढ़ाने वाला है

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