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कनाडा के प्रधानमंत्री के साथ भारत के इस मुख्यमंत्री का क्या झगड़ा है?

जस्टिन ट्रूडो और अमरिंदर सिंह के बीच पंगा आखिर है क्या?

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो सात दिन के भारत दौरे पर आए हैं. दिल्ली में उतरे. फिर आगरा गए. फिर अमृतसर. अमृतसर पंजाब में है. पंजाब में कांग्रेस की सरकार है. मुख्यमंत्री हैं अमरिंदर सिंह. कायदा कहता है कि मुख्यमंत्री उनसे मिलने जाएं. मगर खबर आई कि अमरिंदर नहीं जाएंगे. फिर अगले दिन खबर आई कि जाएंगे. हमारे यहां की मीडिया ने वो छापा जो मुख्यमंत्री के ऑफिस ने कहा. उधर कनाडा की मीडिया कह रही है कि ट्रूडो अमरिंदर से नहीं मिलना चाहते. इसलिए मिलेंगे भी नहीं. इस जाने और न जाने की कयासबाजियां पैदा क्यों हुईं? इसकी नौबत क्यों आई?

जस्टिन ट्रूडो बतौर प्रधानमंत्री अपनी पहली भारत यात्रा पर आए हैं. वो 17 फरवरी को भारत आए और 23 फरवरी तक यहां रहेंगे.
जस्टिन ट्रूडो बतौर प्रधानमंत्री अपनी पहली भारत यात्रा पर आए हैं. वो 17 फरवरी को भारत आए और 23 फरवरी तक यहां रहेंगे.

अमरिंदर सिंह से शुरू हुआ था पूरा विवाद
ऐसा हुआ अमरिंदर सिंह की वजह से. मुख्यमंत्री साहब ने कनाडा की सरकार पर आरोप लगाया था. सरकार, यानी जस्टिन ट्रूडो की कैबिनेट. अमरिंदर का कहना था कि जस्टिन ट्रूडो की कैबिनेट के कई लोग खालिस्तान की मांग करने वाले गुट के लोगों से जुड़े हैं. मतलब, उनसे संपर्क में हैं. फिर क्या हुआ कि कनाडा के रक्षामंत्री हरजीत सज्जन भारत आए. अमरिंदर ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया. कहा कि हरजीत खालिस्तानियों के साथ हैं. और खालिस्तान के समर्थकों से मिलने का सवाल ही नहीं पैदा होता है.

ट्रूडो सरकार के सिख मंत्री से नहीं मिले थे अमरिंदर
ये इकलौता वाकया नहीं था. अमरिंदर सिंह ने दोबारा भी ये बात कही. कहा कि खालिस्तानियों से हमदर्दी रखने वाले कुछ लोग ट्रूडो कैबिनेट का हिस्सा हैं. और इस बात का उनके, यानी अमरिंदर के पास सबूत है. जस्टिन ट्रूडो की कैबिनेट में चार सिख हैं. उनमें से एक तो खुद हरजीत सज्जन हुए. दूसरे हैं इन्फ्रास्ट्रक्चर मंत्री अमरजीत सोही. सोही और सज्जन, दोनों ने ही अमरिंदर सिंह के आरोपों पर एतराज जताया. उनका कहना था कि वो कभी खालिस्तान मूवमेंट का हिस्सा नहीं रहे. दूसरी बात ये कि कनाडा में रहने वाले सिखों के लिए खालिस्तान कोई मुद्दा है भी नहीं.

ये हैं कनाडा के
ये हैं कनाडा के रक्षामंत्री हरजीत सज्जन. हरजीत जब भारत आए, तो उन्होंने अमरिंदर सिंह से मिलने का समय मांगा. अमरिंदर ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया.

अमरिंदर कह रहे हैं हां, कनाडा कह रहा है न
जब ये सब हो चुका, तो आई जस्टिन ट्रूडो की भारत यात्रा की बात. अमरिंदर ने मीडिया से कह दिया कि मैं तो मिलूंगा ट्रूडो से. बल्कि उनको लेकर स्वर्ण मंदिर भी जाऊंगा. और, जालियांवाला बाग म्यूजियम में भी उनको घुमाऊंगा. मगर ट्रूडो की कैबिनेट और कनाडा के अधिकारी इस संभावना से इनकार कर रहे हैं. उनका कहना है कि ट्रूडो का कोई प्रोग्राम नहीं है अमरिंदर से मिलने का.

ट्रूडो के दौरे पर ठंडा रवैया
अब बात करें जस्टिन ट्रूडो के भारत दौरे की. भारत इसके लिए वैसा जोश नहीं दिखा रहा, जैसा बाकी राष्ट्राध्यक्षों के लिए दिखाता है. बस एक दिन ही तय किया गया है जब आधिकारिक काम होंगे. ऐसे काम जिनके लिए ‘द्विपक्षीय बातचीत और समझौते’ जैसा भारी-भरकम शब्द रिजर्व है. इस आधिकारिक वाले दिन क्या होगा? ट्रूडो मिलेंगे राष्ट्रपति रामनाथा कोविंद से. और? जाहिर है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से. कहां? राष्ट्रपति भवन में.

जस्टिन ट्रूडो अमृतसर स्थित स्वर्णमंदिर भी जाने वाले हैं.
जस्टिन ट्रूडो अमृतसर स्थित स्वर्णमंदिर भी जाने वाले हैं.

भारत-कनाडा के बीच एक और ‘फसाद’ हुआ था
इससे पहले भी भारत और कनाडा के बीच कुछ हुआ था. कनाडा के कई गुरुद्वारों ने भारतीय अधिकारियों की एंट्री पर पाबंदी लगा दी थी. अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के भी कई गुरुद्वारों ने ऐसा ही किया. उनका कहना था कि भारत सरकार वहां घुसकर दखलंदाजी करती है. वैसे कुछ ऐसे मौके भी आए हैं जब ट्रूडो किसी कार्यक्रम में पहुंचे और वहां खालिस्तान का समर्थन करने वाले कुछ नेता टाइप लोग भी मौजूद थे. ये जान-बूझकर हुआ कि गलती से, ये नहीं मालूम.

जस्टिन ट्रूडो और उनका परिवार.
जस्टिन ट्रूडो और उनका परिवार.

इस बात से दिक्कत है भारत को
कनाडा में बहुत बड़ी तादाद सिखों की है. करीब एक करोड़ 30 लाख सिख हैं वहां. वहां सिखों का काफी असर हैं. पैसा और पावर, दोनों तरह से मजबूत हैं वो. तो फिर कनाडा खालिस्तान को लेकर क्या मानता है? उसका कहना है कि वो संगठित भारत का समर्थन करता है. और किसी भी तरह के चरमपंथ या आतंकवाद के खिलाफ है. लेकिन अगर कनाडा में रहने वाले सिख किसी अलग सिख देश की मांग करते हैं, तो उन्हें ऐसा करने से रोकेगा भी नहीं. क्यों? क्योंकि ये उनकी अभिव्यक्ति की आजादी है. और आप किसी की सोच पर ताला नहीं लगा सकते. शायद यहीं पर आकर भारत की सहूलियत खत्म हो जाती है. और उसे ट्रूडो सरकार से थोड़ी असहजता होने लगती है. इतनी ज्यादा कि ट्रूडो का आना बहुत हद तक नजरंदाज कर दिया जाता है.


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