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जातिवाद का इससे घिनौना रूप आपने नहीं देखा होगा

पंजाब के संगरूर में खाई गांव का रहने वाला मनप्रीत सिंह. 22 साल का गबरू जाट सिख. खुदकुशी कर ली. दस दिन पहले 21 मई को ही शादी हुई थी, लेकिन 31 को ज़हर खाकर जान दे दी. खुदकुशी का कारण जो था, उसे जानकर दुख और भी बढ़ जाता है.

कारण ये था कि उसकी सास दलित थी. शादी के तीन-चार दिन बाद मनप्रीत को इस बात का पता चला था.

पहले कथित तौर पर उसे बताया गया कि जिस लड़की से वो शादी कर रहा है वो जाट है. इस वजह से ससुर के गरीब होने पर भी उसे आपत्ति नहीं थी. बाद में मनप्रीत को पता चला कि उसकी पत्नी की मां दलित है और वो इसे लेकर बहुत विचलित हो गया. उसने अपने सुसाइड नोट में लिखा थाः

‘मैं मनप्रीत सिंह बरार हूं. मेरी शादी कराने वाले गुरतेज सिंह बाबा ने मेरे लिए लड़की ढूंढी थी. मैं जाट हूं और मेरे ससुर भी जाट हैं. लेकिन मेरे ससुर की पत्नी रामदासिया समुदाय की है. मुझे बताया गया था कि वो (सास और उसकी पत्नी) भी जाट हैं.’

शादी कराने वाले गुरतेज ने ये जोड़ी बनवाने के लिए 45 हजार रुपए लिए थे. शादी के दो दिनों बाद ही मनप्रीत की (दलित) पत्नी अपनी मां के घर चली गई. जब मनप्रीत अपनी (दलित) ससुराल गया, तब उसे सच्चाई पता चली. घर लौटते ही उसने ज़हर खा लिया.

मनप्रीत की खुदकुशी एक समाज के तौर पर हमारी सबसे बड़ी नाकामी है. महज 22 साल का एक लड़का जातिवाद की भेंट चढ़ गया. सोचिए उसके गांव में उसके आसपास रह रहे लोग कैसे होंगे. जाति का ये फर्जी गौरव उसके अंदर आसपास के लोगों से ही तो आया होगा, जिन्होंने उसे कुछ बेहतर नहीं सिखाया. अगर उसकी पढ़ाई-लिखाई अच्छी कराई जाती, तो मुमकिन है कि वह इस तरह अपनी जान न देता.

एक और पहलू भी है

पंजाब में जातीय हिंसा भले कम हो, लेकिन जाति को लेकर गर्व और हीनता बड़ा मसला है. पंजाब में करीब 33% दलित हैं. समझने के लिहाज से पंजाब को तीन हिस्सों में बांटा जाता है. मालवा, दोआबा और माझा. मालवा और दोआबा में सबसे ज्यादा दलित रहते हैं. मालवा के दलितों में गरीब ज्यादा हैं, जबकि दोआबा के दलितों में अमीर. दलित सिंगर और बिजनेसमैन भी दोआबा से आते हैं. आर्थिक स्थिति की वजह से मालवा के दलितों में अब भी हीन भावना है, वहीं दोआबा के दलित गर्व से अपनी जाति उजागर करते हैं.

अपनी पत्नी के साथ चमकीला
अपनी पत्नी के साथ चमकीला

कम उम्र में ही मार दिए गए बहुत पॉपुलर सिंगर चमकीला भी दोआबा से थे. उनकी हत्या में एक कारण जाति भी बताया गया, क्योंकि दलित होते हुए उन्होंने जाट लड़की से शादी की थी.

पढ़ें: पंजाब का वो दलित गायक, जो आतंकवाद के दौर में अखाड़े जमाता था

बीते दिनों ‘डेंजर चमार’ गाकर चर्चित हुई गिन्नी माही भी दोआबा से है, जो अपने गाने की वजह से ट्रोलर्स के निशाने पर आईं. वो और उसके जैसे कई लोग दलित होने को हीन भावना से जोड़कर नहीं देखते, बल्कि इसे सेलिब्रेट करते हैं.

गिन्नी माही
गिन्नी माही

पढ़ें: ‘हुंदे असले दे नालों वध डेंजर चमार’

तो हासिल क्या है

नीयत कैसी भी हो, जाति से जुड़ा हर विवाद-विमर्श हिंसा पर खत्म होता है. आधा भारत इसी में खर्च हो रहा है. जाट आंदोलन से लेकर गुजरात के ऊना तक, हम बहुत कुछ देख और झेल चुके हैं. जाति के इसी फर्जी गौरव ने 22 साल के मनप्रीत की जान ले ली. जाति का ये ओछापन हमारे अंदर इतना गहरे धंस चुका है कि इसे उखाड़ते-उखाड़ते न जाने कितने मनप्रीत जाया हो जाएंगे.

हरियाणा में जाट आंदोलन के दौरान की एक तस्वीर
हरियाणा में जाट आंदोलन के दौरान की एक तस्वीर

जाट, राजपूत, ब्राह्मण, दलित… कोई आधार नहीं है इनका. हमें समझना होगा कि हमारी पहली और आखिरी पहचान सिर्फ और सिर्फ इंसान होना है.

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