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रघुराम राजन ने क्यों कहा, इकनॉमी में लौटी तेजी पर शेखी न बघारें

RBI के पूर्व गवर्नर और ग्लोबल इकनॉमी में एक खास पहचान रखने वाले रघुराम राजन  ने कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में आ रही ‘वी-शेप’ रिकवरी (V-shape recovery) यानी बहुत तेजी से हो रहे सुधार पर हल्ला मचाने या शेखी बघारने की जरूरत नहीं है. इंडिया टुडे टीवी के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई  के साथ एक इंटरव्यू में राजन ने कहा ” अर्थव्यवस्था को खूब गिरने देंगे, तो रिकवरी हमेशा तेज ही होगी” उन्होंने कहा कि भारत को वह विकास दर हासिल करने के लिए अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है, जिसका वह असल हकदार है. पेश है इंटरव्यू के अंश :

अभी हम कोडिव के झटकों से उबरने की कोशिश कर ही रहे थे कि ओमिक्रॉन आ गया. क्या आपको लगता है कि एक बार फिर हम अनिश्चितताओं की ओर बढ़ चले हैं ? 

ओह ! हम अनिश्चित दौर में ही हैं. हम इससे कभी बाहर निकले ही नहीं थे. पहले वायरस और फिर इसके लगातार बदलने वाले वेरिएंट. कुदरत का कहना है कि आप इसे पीछे तो धकेल सकते हैं, लेकिन पूरी तरह से कंट्रोल नहीं कर सकते. अगर आप वेरियंट की चाल पर नजर डालें तो पाएंगे कि हम बेहतर स्थिति में हैं. अस्पतालों में बहुत कम मरीज भर्ती हुए हैं. यह वायरस भी बदल रहा है. हम नहीं जानते कि ओमिक्रॉन पहले से ज्यादा संक्रामक और घातक है या नहीं । हमें जल्द ही पता चल जाएगा, लेकिन उम्मीद यही है कि देरसबेर यह वायरस भी पृष्ठभूमि में चला जाएगा, जैसे दूसरी बीमारियां और वायरस चले गए.
लब्बोलुआब यह है कि हमने वायरस से लड़ने में काफी खर्च किया । इसका अच्छा पहलू यह रहा कि बहुत से खर्चों ने आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने का काम किया. सामान और सेवाओं की उपलब्धता तो बढ़ी ही है, डिमांड भी तेज हुई है. लेकिन बुरा पक्ष यह है कि इसके कई जख्म गहरे हैं, जिनके निशान खासकर उन देशों में साफ देखे जा सकते हैं जो इकनॉमी को पर्याप्त सपोर्ट नहीं दे पाए. इनमें लैटिम अमेरिका और साउथ अफ्रीका के साथ भारत को भी जोड़ सकते हैं. इस लिहाज से दुनिया दो हिस्सो में बंट रही है. एक वो देश जिन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया और एक वो जो अच्छा नहीं कर पा रहे. भारत के भीतर भी एक तरह का बंटवारा है. एक वो लोग हैं, जो इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हुए दूसरे वे हैं, जिन पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा या वो लोग जिनके पास इससे निपटने के लिए पर्याप्त पैसा था.

क्या सबसे बुरा दौर खत्म हो गया है ?

अगर इस धारणा पर चलें कि ये वेरिएंट्स उतने घातक नहीं होंगे, जितना पहला वायरस था, तो कह सकते हैं कि हम मुश्किलों से बाहर निकलने की ओर हैं. अभी हम इस वायरस से लड़ना और इकनॉमी को संभालना सीख रहे हैं. लेकिन सप्लाई की तुलना में ज्यादा डिमांड के चलते महंगाई बढ़ रही है. ज्यादा ट्रांसपोर्टेशन लागत से चीजें भी महंगी हो रही हैं. लेबर क्रंच भी है, जिससे भी महंगाई दर में इजाफा हो रहा है. यह दुनिया के किसी एक हिस्से तक सीमित नहीं है. महंगाई को काबू करने के लिए दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने नीतिगत सख्ती शुरू कर दी है.

क्या भारत को भी (मॉनेटरी पॉलिसी में) सख्ती करनी होगी ?

निश्चित तौर पर हमें महंगाई पर ध्यान देना होगा। मुझे पूरा भरोसा है कि आज मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी अपनी बैठक में देखेगी ही कि क्या करना है. ( यह इंटरव्यू बुधवार को हुई आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की बैठक से ऐन पहले का है. कमेटी ने पॉलिसी दरों में किसी तरह का बदलाव नहीं किया है). बढ़ती महंगाई दरों ने चीन की अर्थव्यवस्था में भी सुस्ती ला दी है. इससे भी कुछ मौके बन रहे हैं और कुछ देश उस स्पेस को भरने की कोशिश कर रहे हैं. इस महंगाई के पीछे एक बड़ी वजह यह है कि कोविड से निपटने के लिए कई औद्योगिक देशों में बड़े पैकेज जारी हुए, जिससे नौकरियां भी पैदा हुईं.

अगर आप आरबीआई गवर्नर होते तो क्या महंगाई को लेकर सचेत होते ?

बहुत कुछ ग्रोथ के हालात पर निर्भर करता है. आपको देखना होगा कि क्या अर्थव्यवस्था में पर्याप्त सप्लाई है कि महंगाई आसमान भी न छूए और डिमांड भी पूरी हो सके. भारतीय अर्थव्यस्था एक बड़ी गिरावट से उबर रही है. आरबीआई को इस सवाल का हल ढूंढना है कि क्या यह रिकवरी हमारी सप्लाई की क्षमता से भी ज्यादा मजबूत हो चली है.

क्या आप भारत में ‘वी-शेप’ रिकवरी देख रहे हैं ?

वी-शेप रिकवरी (गिरावट के बाद बहुत तेजी से सुधार ) कोई ऐसी चीज नहीं, जिस पर बहुत हल्ला मचाया जाए. अर्थव्यवस्था को खूब गिरने दें (अच्छीखासी मंदी पैदा होने दें) तो रिकवरी भी हमेशा तेज ही होगी. सवाल है कि क्या हम पूरी तरह उबर चुके हैं और वापस उस ओर बढ़ रहे हैं, जिस लेवल की ग्रोथ हमारी हुआ करती थी ?
कुछ मायनों में हम उस स्तर तक जरूर पहुंच चुके हैं, जहां साल 2019 में थे. लेकिन बहुत से देश यह स्तर हासिल कर चुके हैं. हम अकेले देश नहीं हैं, जो रिकवर कर रहे हैं. हम एक तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यस्था रहे हैं. पिछले दो साल में हम वो तेजी नहीं पा सके. असल बात यह है कि हमने वह जमीन हासिल की है, जो हमने गिरावट के दौरान खोई थी, लेकिन वह जमीन अब भी हमसे दूर है जो उसके पहले खोते आ रहे थे. क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था पहले भी तेजी से बढ़ रही थी. अभी हमें वह ग्रोथ रेट हासिल करने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है, जिसका भारत हकदार है.


वीडियो- रघुराम राजन ने अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों के इस्तीफे के बाद पन्ने भर-भरकर क्या लिख डाला?

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