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लॉकडाउन: मोबाइल बेचकर राशन खरीदा और फिर मजदूर ने फांसी लगाकर जान दे दी

35 साल के छाबू मंडल ने 16 अप्रैल की सुबह अपना मोबाइल फोन बेच दिया. इससे उन्हें 2500 रुपये मिले. इन पैसों से उन्होंने एक छोटा सा टेबल पंखा खरीदा. साथ ही परिवार का राशन भी लिया. छाबू बिहार के रहने वाले थे. लेकिन काम की तलाश उन्हें गुरुग्राम ले आई. यहां पर वे पेंटर का काम करते. और परिवार पालते. उनके परिवार में पत्नी, चार बच्चे और सास-ससुर थे. पूरा परिवार दो झुग्गियों में रहता था.

छाबू जब राशन लेकर घर पहुंचे तो पत्नी पूनम काफी खुश हुई. परिवार ने 15 अप्रैल का दिन भूखे रहकर गुजारा था. लॉकडाउन के चलते कामकाज बंद था. ऐसे में परिवार के पास न तो पैसा था और न राशन. ऐसे में छाबू और उनका परिवार फ्री बंटने वाले खाने के भरोसे ही था. लेकिन 15 अप्रैल को उन्हें खाना नहीं मिला.

16 को राशन आने पर पूनम खाना बनाने से पहले वॉशरूम चली गई. वहीं छाबू की सास बच्चों को लेकर झुग्गी के पास पेड़ के नीचे बैठ गई. छाबू के ससुर अपनी झुग्गी में सो रहे थे. ऐसे में छाबू अपनी झुग्गी में गए. वहां पर रस्सी से फांसी लगाकर जान दे दी. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की साक्षी दयाल ने ये स्टोरी की है.

छाबू मंडल की पत्नी अपने बच्चों के साथ. (Photo: Tanseem Haider)
छाबू मंडल की पत्नी अपने बच्चों के साथ. (Photo: Tanseem Haider)

इंडियन एक्सप्रेस की साक्षी दयाल को छाबू की पत्नी पूनम ने बताया,

लॉकडाउन के बाद से वह काफी परेशान थे. हमें खाना मिलना भी दूभर हो गया था. न तो काम मिल रहा था और न पैसे. हम फ्री मिलने वाले खाने के भरोसे ही थे. लेकिन फ्री मिलने वाल खाना भी रोज नहीं मिलता था.

10 साल पहले बिहार से आए थे छाबू

छाबू मंडल 15 साल पहले बिहार के मधेपुरा जिले से गुड़गांव आए थे. 10 साल पहले उनकी शादी हुई थी. फिर वे परिवार को भी यहां ले आए. पिछले कुछ महीनों से वे सरस्वती कुंज में रहते थे. यहां पर दो झुग्गियों का किराया 3000 रुपये था.  छाबू के ससुर उमेश ने बताया कि पिछले साल अक्टूबर-नवंबर से ही काम मिलना बंद हो गया था. पूनम का दावा है कि मकान मालिक ने किराए के लिए एक-दो बार फोन भी किया. इससे समस्या और बढ़ गई. जब भी कहीं खाने की खबर मिलती थी तो दौड़ते थे.

पूनम ने आगे कहा

16 अप्रैल को सुबह मेरे पति ने फोन बेचने का फैसला किया. इसे उन्होंने 10,000 रुपये में खरीदा था. इससे बेचने से मिले पैसों से दाल-चावल और एक पंखा खरीदा. हम सब परेशान थे. लेकिन वह ज्यादा परेशान थे. उन पर हम सबका पेट भरने की जिम्मेदारी थी. पर हमने कभी नहीं सोचा कि वे ऐसा कर लेंगे. अब हमारे लिए कमाने वाला भी कोई नहीं है. लॉकडाउन पूरा होने पर मैं घरों में काम करने के लिए जाऊंगी. लेकिन इसमें भी अभी 15 दिन बाकी है.

पुलिस ने बताया मानसिक परेशान

गुड़गांव पुलिस ने बताया कि छाबू मंडल मानसिक रूप से परेशान थे. सेक्टर 53 थाने के एसएचओ दीपक कुमार ने एक्सप्रेस से कहा कि सुसाइड के बारे में जानकारी मिली है. वह बाहर से काम करने आया था. और मानसिक रूप से परेशान था. उसकी बॉडी परिवार को दे दी गई है. उन्होंने मामले में कार्रवाई की मांग नहीं की. ऐसे में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है.

दिल्ली से उत्तर प्रदेश में अपने घर को लौटता हुआ एक माइग्रेंट वर्कर और उसका परिवार. File Photo - PTI.
दिल्ली से उत्तर प्रदेश में अपने घर को लौटता हुआ एक माइग्रेंट वर्कर और उसका परिवार. File Photo – PTI.

प्रशासन ने कहा- खाने की दिक्कत नहीं थी

जिला प्रशासन के अधिकारियों ने भी छाबू मंडल को मानसिक रूप से परेशान बताया. कहा गया है कि कोरोना वायरस संकट के चलते वह परेशान था. खाना मिलने की दिक्कत नहीं थी, परिवार के पास खाना था. इसके अलावा परिवार जहां रहता था, वहां पास में ही खाना बांटा जाता था.

जिला प्रशासन की लिस्ट के अनुसार परिवार सरस्वती कुंज इलाके में रहता था. वहीं खाना बांटने का जगह सेक्टर 56 का कम्युनिटी सेंटर था. प्रशासन का कहना है कि जो भी कमियां हैं उन्हें दूर कर लिया जाएगा. खाना बांटने के प्रयासों में तेजी लाई जाएगी.

जिला प्रशासनों के दावों के बीच छाबू के ससुर उमेश ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया

हमने सुना है कि सेक्टर 56 और वजीराबाद में खाना बंटता है. लेकिन ये दोनों काफी दूर हैं. मैं दिव्यांग हूं. मेरी पत्नी की भी काफी उम्र हो चुकी है. बच्चे भी अभी छोटे हैं. खाने के लिए उतना दूर जाना हो नहीं पाता. और भूखे पेट तो बिल्कुल नहीं.

उन्होंने कहा

पहले प्रदूषण के चलते निर्माण कार्य बंद हो गया. इसके बाद भी काम कम ही रहा. गुजारा करना मुश्किल हो रहा था. लॉकडाउन से पहले भी केवल दो दिन ही काम मिला था.

छाबू का अंतिम संस्कार 17 अप्रैल की सुबह किया गया. इसके लिए परिवार ने आसपास के लोगों और यहां पर रह रहे गांव के लोगों से पैसे उधार लिए. इससे 5000 रुपये मिले.

छाबू के ससुर ने कहा

हमारी हालत इतनी खराब है कि मेरे दामाद का अंतिम संस्कार भी उधार के पैसों से हुआ है.

भारत में कोरोना वायरस के मामलों का स्टेटस


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