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'मारुति 2.5 लाख रुपए महंगी होगी' खबर सुनते ही इसे खरीदने के लिए दौड़ मत पड़िए

आसान भाषा में समझिए क्या है BS6, जिसका इतना हल्ला हो रहा है और जो वाहनों को महंगा लेकिन अच्छा कर देगा?

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20 दिसंबर 2018 (अपडेटेड: 20 दिसंबर 2018, 06:35 AM IST)
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आपने वीडियो गेम खेला है? मारियो? पहली स्टेज पार होते ही मैसेज आता था – थैंक यू मारियो बट अवर प्रिन्सेज़ इज़ इन अनेदर कैसल. फिर आती थी दूसरी स्टेज. पहली स्टेज से ज़्यादा खतरनाक.




ओह तो आप नई जनरेशन के हैं! मारियो नहीं तो कैंडी क्रश या एंग्री बर्ड्स तो खेला होगा? इन सब में एक बात कॉमन है कि एक राउंड क्लियर होने के बाद दूसरा राउंड आता है जो पहले से और कठिन होता है.
बस ऐसा ही ‘बीएस’ का भी हिसाब है. उसके आगे लगे नंबर (बीएस4, बीएस5, बीएस6) ये बताते हैं कि बीएस और कठिन, और कठिन होता चला जा रहा है. किनके लिए? वाहन और वाहन का भोजन (पेट्रोल, डीजल, एलपीजी) बनाने वालों के लिए.


# अब ये बीएस क्या बला है -
बीएस दरअसल भारत सरकार के बनाए हुए स्टेंडर्डस हैं. इसका फुल फॉर्म होता है ‘भारत स्टेज’. इन्हें बीएसईएस लागू करता है. बीएसईएस का फुल फॉर्म है - भारत स्टेज एमिशन स्टेंडर्ड. ये आती है सेंट्रल पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के अंडर में और सेंट्रल पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड आता है पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंडर में.
बीएसईएस में 'एमिशन' का अर्थ होता है उत्सर्जन यानी उगलना या उल्टी करना. और ‘स्टेंडर्ड’ किस चीज़ का? इस चीज़ का कि वाहन अधिकतम कितना प्रदूषण उगल सकते हैं, और कितने से अधिक के बाद ये ग़ैरकानूनी हो जाएगा?
Emission
बस इन्हीं मानकों के मुश्किल होने के चलते वाहन निर्माताओं को अपने वाहन के डिजाइन में ढेर सारे परिवर्तन करने पड़ते हैं, और इसमें नई टेक्नोलॉजी के साथ-साथ ढेर सारा पैसा भी लगता है.


# कैसे बनते हैं ये नियम -
भारत सरकार इन स्टेंडर्डस को बनाने में ज़्यादा मेहनत नहीं करती. यूरोप के देशों में ऐसे ही स्टेंडर्ड चलते हैं जिन्हें ‘यूरो’ कहा जाता है. बस इन्हीं मानकों या स्टेंडर्डस में थोड़ा-बहुत परिवर्तन करके ये भारत में लागू कर दिए जाते हैं. वो जैसे गांव में नाइकी के ड्यूप्लिकेट वाइकी जूते मिलते हैं न, वैसे ही भारत में ‘यूरो’ का ड्यूप्लिकेट है ‘बीएस’.
इसलिए ही तो भारत सरकार कह रही है कि वो 2020 में बीएस4 के बाद सीधे बीएस6 लागू करेगी. अगर खुद का होता तो 4 के बाद 5 आता चाहे अगले वाला परिवर्तन कितना ही बड़ा क्यूं न होता, नियम कितने अधिक ही कठोर क्यूं होते.
लेकिन ये तो कॉपी-पेस्ट वाला हिसाब किताब है, हम रेस में पिछड़ रहे थे इसलिए यूरो5 का इंडियन वर्ज़न रिलीज़ ही नहीं किया. कुद्दी मार दी. अब सीधे बीएस6 रिलीज़ होगा, जो यूरो6 की मिरर इमेज होगा.
Pollution
पहले डिसाइड किया कि अभी बीएस5 लागू करते हैं. और बीएस6, 2024 तक लागू करेंगे. लेकिन फिर प्रदूषण के बढ़ते लेवल को देखकर सोचा कि छोड़ो 5, सीधे 6 पर आते हैं. और वो भी 2020 में ही.


# टाइमलाइन –
इन मानकों को पहली बार 2000 में लागू किया गया था. उसका नाम बीएस नहीं, इंडिया 2000 था और रेफरेंस था यूरो1.
सबसे लास्ट लागू किया जा चुका नियम बीएस4 है जिसका रेफरेंस है यूरो4 और जिसे पिछले साल यानी 2017 के अप्रैल महीने में देशभर में लागू किया गया था. ‘देशभर में’ मेंशन करना इसलिए ज़रूरी है क्यूंकि यूरो4 अप्रैल 2017 से पहले भी अस्तित्व में था. ये अप्रैल 2010 में ही लागू हो गया था लेकिन तब केवल तेरह शहरों और नेशनल कैपिटल रीजन भर में लागू हुआ था.


# क्या कहते हैं यूरो और बीएस के नियम -
यूरो6 स्टेंडर्ड सितंबर 2014 में लागू कर दिया गया था. और सब कुछ सही रहा तो लगभग ऐसे ही स्टेंडर्ड भारत में भी 2020 में लागू हो जाएंगे. आइए देखते हैं कि इसमें किस तरह के नियम थे.
यूरो6 के नियम कठोर से कठोरतम होते गए हैं. और फायदा भी मिला है. (तस्वीर: dougjack.co.uk) यूरो6 के नियम कठोर से कठोरतम होते गए हैं. और फायदा भी मिला है. (तस्वीर: dougjack.co.uk)

इसके अनुसार डीज़ल से चलने वाली कारें प्रति किलोमीटर चलने के दौरान -
- .50 ग्राम से अधिक कार्बन नहीं उत्सर्जित कर सकते - 0.080 से अधिक नाइट्रोजन ऑक्साइड नहीं उत्सर्जित कर सकते - 0.005 से अधिक पीएम नहीं उत्सर्जित कर सकते
ऐसे ही नियम कमर्शियल वाहनों, ट्रकों, बसों, टू व्हीलर्स आदि के लिए भी वर्णित हैं. डीज़ल और पेट्रोल से चलने वाले वाहनों के लिए अलग-अलग नियम हैं. यूं पता चल जाता है कि इन स्टेंडर्डस का मतलब क्या होता है, या ऑटो इंडस्ट्री के लिए इनमें किस तरह के नियम होते हैं.


# स्पेसिफिकेशन और फीचर्स के बीच का अंतर -
जैसा कि पहले ही डिस्कस किया था कि ये वाहन बनाने वाली कंपनियों का सरदर्द है कि वे कैसे भी करके पॉल्यूशन के उत्सर्जन को कम करें और नियमों की एक झलक देखकर भी पता चलता है कि कहीं पर भी ये मेंशन नहीं है कि इंजन ऐसा होना चाहिए, पेट्रोल ऐसा होना चाहिए, साइलेंसर ऐसा होना चाहिए, आदि-आदि.
ये ऐसा ही है कि आपने स्मार्टफोन कंपनी के लिए एक नियम बना दिया कि मुझे ऐसा फोन चाहिए जो दो मीटर से गिरने पर भी न टूटे. अब ये उनका सरदर्द कि वो उसमें गुरिल्ला ग्लास लगायें या कोई और. आपको स्पेसिफिकेशन से नहीं, मतलब है तो केवल फीचर्स से. होने को फीचर्स, स्पेसिफिकेशन के ही जाया हैं, उसीके चलते हैं.
सैमसंग गैलेक्सी ऑन7 के स्पेसिफिकेश (तस्वीर: अमेज़न) सैमसंग गैलेक्सी ऑन7 के स्पेसिफिकेश (तस्वीर: अमेज़न)

वैसे ही बीएस स्टेंडर्ड को भी फीचर्स से मतलब है बस. हां उसके लिए कार और इंधन बनाने वाली कंपनियों को अपने प्रोडक्ट के स्पेसिफिकेशन्स में परिवर्तन करने होंगे.


# क्यूं मुश्किल होता है इसे लागू करना -
BS6 लागू करने में कुछ परेशानियां हैं (लेकिन ये सारी परेशानियां, होने वाले लॉन्ग टर्म फायदे के हिसाब से कुछ भी नहीं है.)
# BS6 को अपनाने के लिए वाहन कंपनियां तो अपना खर्चा खुद उठाएंगी लेकिन उसमें यूज़ होने वाला पेट्रोल/डीजल भी तो अलग होगा. और इस पेट्रोल को बनाने के लिए सारी रिफाइनरी वगैरह 'रिफाइन' करनी पड़ेंगी. और इसका खर्चा खरबों में होगा. कहा तो यहां तक जा रहा है कि इसके लिए अलग से सेस न इंट्रड्यूज़ करना पड़े.
# बेशक केवल वाहन कंपनियां ही BS6 संगत इंजन और कारें बनाने के लिए उत्तरदायी होंगी लेकिन ये खर्चा वो ग्राहकों के अलावा और किसकी पॉकेट में से निकलेंगी. तो वाहन भी महंगे होंगे.
और ये दिक्कत केवल BS6 लागू करने में ही नहीं हो रही. हर BS अपग्रेडेशन की यही कहानी थी. इसलिए ही तो पिछले साल एक्टिवा एक-दो दिन तीस हज़ार तक में बिकती रही थी.
अन्य दिनों में उसकी कीमत साठ हज़ार से कुछ ज़्यादा ही है. ऐसा इसलिए क्यूंकि अगले दिन से BS4 लागू होना था और वाहन कंपनियो को बन चुके वाहनों को अपग्रेड करने से कम नुकसान उन्हें सस्ते दामों में बेचने पर हो रहा था. (फायदा तो ऑफ़ कोर्स किसी भी विकल्प में न था.)
ऑइल रिफाइनरीज़ ऑइल रिफाइनरीज़

तो यूं BS6 के चलते हम लोगों को टैक्स ज़्यादा देना पड़ेगा, गाड़ियां और पेट्रोल महंगा हो जाएगा, और पेट्रोल महंगा होगा तो बाकी चीज़ें भी महंगी होंगी. फिर भी ये एक अच्छी ख़बर है. हमारे लिए हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए. धरती के लिए, जो अब ज़्यादा दिनों तक जी पाएगी.




# आज बात क्यूं कर रहे हैं -

मारुति. कौन नहीं जानता. संजय गांधी का ये स्वप्न आज भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी है. इस कंपनी ने कहा है कि बीएस-6 के आ जाने के बाद डीजल कारें (जो पेट्रोल से चलने वाली कारों से ज़्यादा पोल्यूशन फैलाती हैं) बनाना घाटे का सौदा होने जा रहा है क्यूंकि इसके चलते डीजल कारें ढाई लाख रुपए तक महंगी हो सकती हैं. वही स्पेसिफिकेश और फीचर्स वाले सिद्धांत के चलते.
तो ऐसा तो है नहीं कि अगर ये मारुति ने कहा है तो केवल मारुति की कारें महंगी होंगी. BS6 तो हर एक के लिए 'मौत' की तरह मुंसिफ है, कमोबेश नहीं. यानी आने वाले समय में भारत की हर कार महंगी होने जा रही है, बहुत महंगी. बेशक डीजल की कारें ज़्यादा महंगी होंगी लेकिन पेट्रोल वाली भी महंगी होंगी ही. तो फिर आपको भविष्य में महंगी हो रही कारें अभी सस्ते, बहुत सस्ते दामों में क्यूं नहीं खरीद लेनी चाहिए?
ढेरों कारण हैं. जैसे कि जो कार आप खरीदेंगे, वो फ्यूचर प्रूफ नहीं होंगी. मतलब कि नए फीचर्स से महरूम होगी. और फ्यूचर प्रूफ नहीं होंगी तो किसी ने नियम के चलते सड़कों से बेदखल की जा सकती हैं. याद है न आपको अभी कुछ ही महीनों पहले सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के चलते पेट्रोल वाली कारों के मालिकों की कितनी फज़ीहत हुई थी.
साथ ही, जैसे मारुति स्ट्रॉन्ग हाईब्रिड नाम की एक तकनीक विकसित कर रही है (जिसकी मदद से पेट्रोल कारों की माइलेज भी 30 फीसद तक बढ़ाई जा सकेगी) वैसे ही अन्य कार कंपनीज़ भी आरएंडडी में लगी ही होंगी. और यूं नई कारों को खरीदना बेशक महंगा होगा लेकिन उनका मेंटेनेंस और इंधन आदि का खर्च सस्ता हो जाएगा.
और अंततः इन नई महंगी कारों को खरीदकर आप पर्यावरण संरक्षण जैसे नोबेल कॉज़ में भी अपना योगदान दे पाएंगे. तो इन सब पॉइंट्स के बाद आप खुद डिसाइड कीजिए कि अभी या बाद में? वैसे एक और विकल्प भी है - कभी नहीं!

Environment

साथ ही, जैसे मारुति स्ट्रॉन्ग हाईब्रिड नाम की एक तकनीक विकसित कर रही है (जिसकी मदद से पेट्रोल कारों की माइलेज भी 30 फीसद तक बढ़ाई जा सकेगी) वैसे ही अन्य कार कंपनीज़ भी आरएंडडी में लगी ही होंगी. और यूं नई कारों को खरीदना बेशक महंगा होगा लेकिन उनका मेंटेनेंस और इंधन आदि का खर्च सस्ता हो जाएगा.

और अंततः इन नई महंगी कारों को खरीदकर आप पर्यावरण संरक्षण जैसे नोबेल कॉज़ में भी अपना योगदान दे पाएंगे. तो इन सब पॉइंट्स के बाद आप खुद डिसाइड कीजिए कि अभी या बाद में? वैसे एक और विकल्प भी है - कभी नहीं!



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