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प्लेसीबो-इफ़ेक्ट: जिसके चलते डॉक्टर्स मरीज़ों को टॉफी देते हैं, और मरीज़ स्वस्थ हो जाते हैं

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जातक कथा # 1 –

एक बार एक ज़ेन गुरु अपने कुछ शिष्यों के साथ एक गांव से दूसरे गांव जा रहे थे. उन्हें रास्ते में एक नव यौवना दिखाई दी. माने एक सुंदर स्त्री. नव यौवना के पैरों में चोट लगी थी इसलिए वो नदी पार नहीं कर पा रही थी. ज़ेन गुरु ने उसे सहारा देकर नदी पार करवा दी.

ये देखकर शिष्यों के मुंह सड़ गए. जब घंटों तक ज़ेन गुरु पीछे चलते शिष्यों की खुसर-फुसर सुनते हुए आजिज़ आ गए, तो उन्होंने शिष्यों से उनकी परेशानी का कारण पूछा.

ज़ेन मास्टर और उसका शिष्य (सांकेतिक चित्र)
ज़ेन मास्टर और उसका शिष्य (सांकेतिक चित्र)

शिष्यों में से एक ने कहा –

आपने एक कुंवारी स्त्री को अपने हाथों से छुआ, इससे आपका मन, आपकी आत्मा मलीन न हुई?

गुरु ने उत्तर दिया (और गौर कीजिए कि उत्तर देते हुए उन्होंने बहुत ध्यान से शब्दों का चुनाव किया) –

मैं उस ‘विपत्ति-ग्रस्त’ को कब का नदी के तट पर छोड़ आया हूं लेकिन तुम उस ‘स्त्री’ को अब तक ढो रहे हो.

कथा यहां पर समाप्त हो जाती है. अब आपको सुनाते हैं एक मॉडर्न जातक कथा, जिसके मुख्य किरदार आप हैं.


जातक कथा # 2 –

आप एक डॉक्टर के पास जाते हैं, क्यूंकि आपको बड़े दिनों से सिर में दर्द हो रहा है. डॉक्टर आपके सारे टेस्ट करवाता है और फिर आपको केवल एक गोली देता है. दिन में दो बार – खाना खाने के बाद.

आप हफ़्ते भर गोली खाते हैं और ठीक हो जाते हैं. आप डॉक्टर को शुक्रिया करने जाते हैं, साथ ही पूछते हैं कि वो दवा कौन सी थी, जिससे महीनों से चला आ रह सिरदर्द महज़ एक हफ़्ते में छू-मंतर हो गया?

बूझो तो जानें - जेम्स या पिल्स?
बूझो तो जानें – जेम्स या पिल्स?

डॉक्टर आपको बताता है कि वो कोई दवा थी ही नहीं. वो तो एक मीठी गोली थी – जेम्स की, जिसे उसने दूसरे डब्बे में भरकर आपको दे दिया था.

अब आप समझ नहीं पाते कि डॉक्टर को शुक्रिया कहें या उसे इस धोखे के लिए कोसें. लेकिन आप उससे कुछ कहें उससे पहले ही डॉक्टर ‘एक्सप्लेन’ करना शुरू कर देता है –

आपके सारे टेस्ट करवाए. सिर तो छोड़िए, शरीर के किसी कोने में कोई दिक्कत नहीं मिली. दरअसल ये सिरदर्द आपके सिर की ही उपज था. आपके दिमाग की. टू बी स्पेसिफिक, आपके मन की.

आप कभी अख़बार में किसी बीमारी के लक्षण देखते हैं तो लगता है कि ये सारे लक्षण तो आपके शरीर में भी मौजूद हैं. क्योंकि बहुत सारी बीमारियां आपके शरीर की नहीं मन की देन होती हैं. बीमारियां ही नहीं दुनिया में अधिकतर चीज़ें शरीर की नहीं, मन की देन होती है. आपको ये वीयर्ड लगेगा, बट अलाऊ मी टू से कि, इस यूनिवर्स की सारी चीज़ें ‘मन’ की ही उपज हैं. और जो चीज़ आपके मन की उपज है उसका इलाज बाहर कैसे होगा? उसका तो अंदर ही से इलाज करना पड़ेगा. और इसी ‘इंटरनल हीलिंग’ को मनोवैज्ञानिकों की भाषा में ‘प्लेसीबो-इफेक्ट’ कहते हैं.

देखिए, आप का अस्तित्व में आना एक विचार के चलते हुआ. एक विचार से आपके शरीर में ढेरों परिवर्तन हो जाते हैं. दुनिया की बेस्टसेलिंग किताब – ‘द सीक्रेट’ में भी ‘आकर्षण के सिद्धांत’ का ज़िक्र किया गया है…

आकर्षण का सिद्धांत प्रतिपादित करने वाली बेस्टसेलर - दी सीक्रेट
आकर्षण का सिद्धांत प्रतिपादित करने वाली बेस्टसेलर – दी सीक्रेट

इससे पहले डॉक्टर आपको और ज्ञान देता, आप शुक्रिया और लानतों के बीच में इनी-मिनी-माइनि-मो करते हैं और उसे ज़ाहिर तौर पर शुक्रिया और मन ही मन में लानतें देकर घर वापस आ जाते हैं. लेकिन साथ ही उस स्ट्रेंज डॉक्टर या डॉक्टर स्ट्रेंज की कही बातों में से एक शब्द आप पकड़ लेते हैं – प्लेसीबो.

आप गूगल करते हैं – plasibo. गूगल कहता है – Did you mean placebo.

अब आपके सामने प्लेसीबो से रिलेटेड ढेरों आर्टिकल खुल जाते हैं. एक आर्टिकल हिंदी में भी है. दी लल्लनटॉप में. आप उसे खोलते हैं, उसे पढ़ना शुरू करते हैं. वहां पर किसी ज़ेन गुरु की जातक कथा का संदर्भ दिया होता है. आप समझ जाते हैं कि उस डॉक्टर स्ट्रेंज की तरह ही यहां पर भी यह जातक कथा ‘मन की शक्ति’ को संदर्भित करती है. कि शिष्यों ने अभी तक स्त्री को अपने मन में बिठाए रखा है, और यही उनके कष्ट का कारण है. बहरहाल आप आगे पढ़ते हैं. दो तीन मिनट तक एक डेजा-वू वाले अनुभव से गुज़र चुकने के बाद कुछ नई जानकारियां मिलती हैं.


# प्लेसीबो पास्ट –

‘प्लेसीबो डॉमिनोज़’ शब्द का उपयोग पांचवी सदी में अनुवादित बाइबल के एक महत्वपूर्ण अंश में किया गया था. इसका अर्थ है –

मैं ईश्वर को प्रसन्न करूंगा.

प्लेसिबो की गोली
प्लेसिबो की गोली

18 वीं सदी के उत्तरार्ध में ‘प्लेसीबो चिकित्सा’ औषधीय शब्दावली का एक अभिन्न हिस्सा बन गया. इस प्रकार की चिकित्सा लोगों को ठीक/स्वस्थ करने के बजाय संतुष्ट/प्रसन्न करने में अधिक उपयोग में आती थी.

सदियों से प्लेसीबो को ‘भ्रामक उपचार’ माना जाता रहा है. 1955 में एचके बीचर ने JAMA में एक पेपर, ‘दी पावरफुल प्लेसीबो’ प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि –

यह स्पष्ट है कि ‘प्लेसीबो उपचार’ में काफी हद तक चिकित्सकीय प्रभावशीलता मौज़ूद होती है.


 # प्लेसीबो परिभाषा –

सिंपल भाषा में कहें तो प्लेसीबो ऐसी चिकित्सा को कहते हैं जिसका कोई वैज्ञानिक आधार न हो. ऐसी चिकित्सा पद्धति या तो प्रभावहीन होती है, या यदि कोई सुधार दिखता भी है तो उसका कारण कोई अन्य चीज ही होती है. और इस पूरे कांसेप्ट या इफ़ेक्ट को कहते हैं – प्लेसीबो प्रभाव.

अब, जब कहा जाता है कि इनको दवा नहीं दुआ की ज़रूरत है तो दरअसल ‘प्लेसीबो इफ़ेक्ट’ की ही बात की जा रही होती है.

तस्वीर साभार - http://www.drugsdb.com
तस्वीर साभार – http://www.drugsdb.com

जब कहा जा रहा होता है कि अब तो इन्हें कोई चमत्कार ही बचा सकता है, तो उसका अर्थ होता है कि अब तो इन्हें कोई ‘प्लेसीबो इफ़ेक्ट’ ही बचा सकता है.

हम आपको ये भी बता दें कि प्लेसीबो हमेशा लाभकारी ही हो, ऐसा नहीं है. इसके प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों हो सकते हैं.  इन नकारात्मक प्रभावों को नोसीबो इफेक्ट (Nocebo effect) कहते हैं.

नकारात्मक प्रभाव तो मैंने खुद अपनी आखों से देखा है, बल्कि अनुभव किया है. एक बार किसी दोस्त ने मज़ाक में कह दिया कि तुम्हारे खाने में छिपकली गिरी हुई थी. मुझे काफी वॉमिट हुई. क्यूंकि उसकी सूचना के पूर्व ही मैं भोजन ग्रहण कर चुका था.

बहरहाल, वॉमिट हो चुकने के बाद पता चला कि भोजन में कोई छिपकली नहीं गिरी थी. यानी छिपकली मेरे मन में थी. इसी छिपकली वाली बात पर, एक और इंट्रेस्टिंग जातक कथा बताते हैं –

एक योद्धा एनलाइटेनमेंट या मोक्ष की तलाश में था. ऐसा नहीं था कि उसने मोक्ष की खातिर युद्ध करना छोड़ दिया हो. युद्ध करना तो उसका ‘कर्म’ था. तो वो योद्धा होने के साथ-साथ सत्य की तलाश में भी था.

बहरहाल, एक भीषण युद्ध के बाद जब वो भूखा-प्यासा, थका-हारा अपने घर वापस लौट रहा था, तो रास्ते में एक रेगिस्तान पड़ा. उस रेगिस्तान को पार करते-करते दिन से शाम और शाम से रात हो गई. वो भूखा-प्यासा था इसलिए एक जगह गिरकर सो पड़ा. सोए हुए ही उसका हाथ एक गोल घड़े जैसी किसी चीज़ से टकराया. घुप्प अमावस्या के अंधेरे में ही योद्धा ने उस घड़े को अपने होठों से लगा लिया. उसे आज जीवन के सबसे मीठे पानी का अनुभव हुआ था. पानी पी चुकने के बाद वो फिर से सो गया.

सुबह उठा, तो उसने देखा कि दरअसल वो, जो उसने होठों से लगाया था, घड़ा नहीं एक मानव कंकाल की खोपड़ी थी और उसमें पानी नहीं खून पड़ा था. ये जानकार वो तुरंत एनलाइंटेंड (माने ज्ञान को प्राप्त) हो गया.

Placebo - 1

प्रथम दृष्टया ये समझ में नहीं आता कि वास्तविकता जानने के बाद उलटी करने के बजाय वो सत्य को कैसे प्राप्त हुआ लेकिन थोड़ा और सोचने पर पता चलता है कि उसे ज्ञान हो गया था कि सब-कुछ दिमाग की उपज है. यदि वो उठकर आगे चल देता, तो वो घड़ा उसके लिए घड़ा ही रहता, वो पानी उसके लिए पानी ही रहता. ताउम्र.

हां तो वापस आते हैं प्लेसीबो पर. अध्ययनों से ये भी पता चला है कि कुछ बीमारियां तो ऐसी हैं जिनपर प्लेसीबो तब भी प्रभावकारी होता है, जबकि रोगी को पता हो कि उपचार के नाम पर उसके साथ ‘प्लेसीबो’ किया जा रहा है.

ऐसा ही एक अध्ययन हॉवर्ड मेडिकल स्कूल ने किया था, जब उन्होंने अपच के शिकार कुछ लोगों को ‘प्लेसीबो’ की मीठी गोलियां दीं लेकिन ये भी बताया कि ये गोलियां झूठी हैं, इसमें कोई केमिकल सॉल्ट नहीं है. लेकिन फिर भी अध्ययन में भाग लेने वाले लोगों को इन गोलियों से राहत का अनुभव हुआ.


# क्यूं काम करता है प्लेसीबो प्रभाव –

प्लेसीबो-इफ़ेक्ट का पूरा प्रभाव मन और शरीर के रिश्ते पर आधारित है. प्लेसीबो-इफ़ेक्ट क्यूं इफ़ेक्टिव है, इसको लेकर कई मत और सिद्धांत हैं, लेकिन सबसे आम सिद्धांतों में से एक यह है कि प्लेसीबो प्रभाव किसी व्यक्ति की अपेक्षाओं के कारण प्रभावकारी होता है. यानी यदि कोई रोगी किसी गोली या कैप्सूल से कुछ ‘होने’ की अपेक्षा रखता है, तो यह संभव है कि प्लेसीबो वाली मीठी गोली से तो नहीं, उसके शरीर के अंदर के कैमिकल लोचे से वो प्रभाव उत्पन्न होंगे जो वास्तविक गोली से हुए होते.

Placebo - 2

प्लेसीबो के बारे में इस ‘अपेक्षाओं’ वाले सिद्धांत को सुनकर एक शे’र याद आ रहा है –

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा.

और गीता में भी तो कुछ ऐसा कहा गया है –

ईश्वर का होना नहीं, भक्ति का होना महत्वपूर्ण है.

रिसर्च करने वाले ये भी कहते हैं कि इस बात का भी फर्क पड़ता है कि मीठी गोली दे कौन रहा है – एक अंजान व्यक्ति, एक अंजान डॉक्टर, एक जान-पहचान वाला डॉक्टर या फिर आपका पति या आपकी पत्नी.

यह तथ्य कि प्लेसीबो-प्रभाव ‘अपेक्षाओं’ से जुड़ा हुआ है, इसे काल्पनिक या झूठा नहीं बना देता है. प्लेसीबो के प्रभाव से वास्तविक शारीरिक परिवर्तन होते देखे गए हैं. जैसे कुछ अध्ययनों से पता चला है कि प्लेसीबो-प्रभाव से बॉडी में एंडॉर्फिन के उत्पादन में वृद्धि होती है. एंडॉर्फिन शरीर में ही उत्पन्न होने वाले प्राकृतिक दर्द निवारकों में से एक रसायन है.

शोधकर्ताओं का मानना है कि प्लेसिबो-इफ़ेक्ट पर और अधिक अध्ययन और शोध, रोगों के इलाज में इस पद्धति को और अधिक लाभकारी बना सकता है.


# अच्छा चलते-चलते एक और इंट्रेस्टिंग फैक्ट –

चूंकि प्लेसीबो धारणाओं और अपेक्षाओं पर निर्भर हैं, इसलिए धारणा को बदलने वाले विभिन्न कारक प्लेसीबो इफ़ेक्ट के परिमाण को घटा-बढ़ा सकते हैं. उदाहरण के लिए, अध्ययनों से पता चला है कि प्लेसीबो वाली गोली के रंग और आकार से भी परिणामों पर फर्क पड़ता है. तेज़ रंगो वाली गोलियां उत्तेजक के रूप में बेहतर काम करती हैं जबकि हल्के रंग की गोलियां अवसाद की जनक होती हैं.

और हां, एक इंट्रेस्टिंग फैक्ट ये भी है कि गोलियों की बजाय कैप्सूल अधिक प्रभावी होते हैं. जहां तक आकार की बात है, बड़ी गोलियां ज़्यादा प्रभावी होती हैं.

इसके अलावा, प्लेसीबो-सर्जरी प्लेसीबो-इंजेक्शन की तुलना में ज़्यादा प्रभावकारी होती हैं.


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