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आसमान से इंसान पर बिजली गिरे तो असल में होता क्या है, जान लीजिए

पिछले तीन दिनों में आसमानी बिजली गिरने से कम से कम तीन लोगों की मौत की खबरें आई हैं.

1. हरियाणा का डबवाली. यहां 25 वर्षीय गोपाल साहू मंगलवार सुबह पिता के साथ खेत में गए थे, पानी लगाने. उनके साथ बेटा भी था. अचानक तेज धमाके के साथ बिजली गिरी और गोपाल को चपेट में ले लिया. उनकी मौत हो गई.

2. ग्रेटर नोएडा के जेवर में 20 वर्षीय गौतम भारती रविवार शाम खेत पर गए थे. सोमवार सुबह उनकी लाश मिली. जेवर के थाना प्रभारी ने बताया कि तेज बारिश से बचने के लिए गौतम खेत में बनी झोपड़ी में बैठ गया था और ईयरफोन लगाकर फोन पर बात करने लगा, उसी दौरान आसमान से बिजली गिरने से मोबाइल फट गया और वह बुरी तरह झुलस गया.

3. राजस्थान के अलवर में 55 साल की महिला बच्ची देवी मीणा रविवार को अपनी बहू के साथ खेतों से चारे का गट्ठर सिर पर लेकर घर लौट रही थीं. उसी दौरान आकाशीय बिजली गिरने से उनकी मौत हो गई.

अब बात आसमानी बिजली की. ये दुनिया की सबसे ज़्यादा घटने वाली प्राकृतिक घटना है. दुनिया में शायद ही कोई हो, जिसने इसे न देखा हो.

आगे बढ़ें, इससे पहले ये जानना ज़रूरी है कि बिजली का गिरना और बिजली का चमकना दोनों अलग-अलग चीज़ हैं.

हर बिजली का चमकना, बिजली का गिरना नहीं होता. बिजली अगर आकाश में ही रहे तो उसे केवल ‘बिजली का चमकना या गरजना’ कहेंगे. लेकिन बिजली अगर धरती से या धरती पर किसी चीज़ से टकराए तो वो ‘बिजली का चमकना/गरजना’ तो होगा ही, ‘बिजली का गिरना’ भी कहलाएगा.

तो आज हम जानेंगे कि आसमान में बिजली का चमकना कैसे संभव हो पाता है. इसके लिए पहले हम स्टेटिक-चार्ज को समझ लेते हैं.


स्टेटिक चार्ज क्या होता है?

दुनिया की हर चीज़ का सबसे बेसिक बिल्डिंग ब्लॉक एटम यानी अणु है. मतलब ये कि अगर किसी पदार्थ को ‘अणु’ के लेवल तक तोड़ा जाए तो उस पदार्थ के अणु के भी वही गुण होंगे, जो उस मूल पदार्थ के थे.

लोहे को छोटा करते-करते अगर हम उसके एक अणु तक पहुंच जाएं तो वो अकेला अणु भी लोहा ही कहलाएगा. अब अगर अणु से भी ज़्यादा छोटे टुकड़े कर दिए जाएं तो फिर वो टुकड़े लोहा नहीं कहलाएंगे.

तो इस बिल्डिंग ब्लॉक, यानी अणु में तीन चीज़ें होती हैं – प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन. न्यूट्रॉन में कोई चार्ज़ नहीं होता लेकिन प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन में बराबर चार्ज होता है. प्रोटॉन के पास धनात्मक (+) और इलेक्ट्रॉन के पास ऋणात्मक (-). इसलिए ही अणु का कुल चार्ज ज़ीरो रहता है. और इसीलिए सामान्य परिस्थितयों में हर चीज़ का चार्ज़ शून्य रहता है.

स्टैटिक एनर्जी वाली बिल्ली
स्टैटिक चार्ज वाली बिल्ली

लेकिन जब दो पदार्थों की परतों में घर्षण होता है तो इलेक्ट्रॉन एक मैटेरियल से दूसरे मैटेरियल में चले जाते हैं, और अपने साथ ले जाते हैं थोड़ा-थोड़ा नेगेटिव चार्ज. और ये थोड़ा-थोड़ा इकट्ठा होकर बहुत बड़ा बन जाता है. और इसके चलते दोनों मैटेरियल में कुछ चार्ज इकट्ठा हो जाता है. एक में पॉज़िटिव और दूजे में नेगेटिव.

जब आप प्लास्टिक की कंघी अपने बालों में फिराते हैं, तो उससे कुछ इलेक्ट्रॉन छूटकर आपके बालों में समा जाते हैं. तो कंघी के पास नेगेटिव चार्ज कम हो जाता है. उस पर बन जाता है पॉज़िटिव चार्ज. यही स्टेटिक चार्ज है. इसी पॉजिटिव चार्ज़ के चलते वह न्यूट्रल चार्ज वाले कागज़ के छोटे-छोटे टुकड़ों को अपनी ओर खींचता है. ये प्रयोग हम में से बहुत से लोगों ने किया होगा.

स्टेटिक चार्ज़ दो तरह का होता है– जिस पदार्थ में इलेक्ट्रॉन ज़्यादा होंगे, उसमें स्टेटिक नेगेटिव चार्ज़ और जिसमें प्रोटॉन ज़्यादा होंगे उसमें स्टेटिक पॉज़िटिव चार्ज़.

पॉजिटिव, नेगेटिव
पॉजिटिव, नेगेटिव
स्टेटिक चार्ज़ के बारे में रोचक जानकारी के लिए ये पढ़ें– आपको भी ऑफिस की कुर्सी पर बैठे-बैठे करंट लगता है? वजह जानिए

अब आते हैं इस सवाल पर कि बिजली चमकती कैसे है?

देखिए, बादल कैसे बनते हैं, ये तो हम सबको पता है. फिर भी एक बार रिवीज़न कर लेते हैं- समुद्र का पानी भाप बनकर ऊपर उठता है. जैसे-जैसे ऊपर पहुंचता है, ठंडा होने लगता है. ठंडा होकर पानी की छोटी-छोटी बूंदों के रूप में इकट्ठा होकर बादल का रूप ग्रहण करने लगता है.

Clouds

लेकिन फिर भी इसका बड़ा होते रहना और ठंडा होते रहना ज़ारी रहता है. बादल के ऊपर का भाग तो इतना ठंडा हो जाता है कि छोटे-छोटे बर्फ के कण बनने लगते हैं. ये बर्फ के कण हवा के कणों से घर्षण करते हैं और इस घर्षण से पैदा होता है– स्टेटिक चार्ज़.

अब प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन में बेशक चार्ज़ बराबर हो लेकिन वज़न इलेक्ट्रॉन का ज़्यादा होता है. इसलिए सारा पॉज़िटिव चार्ज़ बादलों के ऊपर वाले भाग में इकट्ठा हो जाता है, और सारा नेगेटिव चार्ज़ नीचे वाले भाग में.

तो यूं बादलों के नीचे वाले भाग में ‘स्टेटिक नेगेटिव चार्ज़’ बन जाता है.

अब ये इंट्रेस्टिंग बात है कि आसमान की बिजली ठीक वही बिजली होती है, जिससे हमारा घर रोशन होता है. हमारे घर की बिजली हो या आसमान से गिरने वाली बिजली, दोनों पैदा होती हैं इलेक्ट्रॉन्स की गति से. क्यूंकि हर इलेक्ट्रॉन में एक नेगेटिव चार्ज़ होता है. यूं बिजली का कड़कना तीन तरह से होता है-

1) बादलों के अंदर (IC / Intra Cloud)

एक बादल में पॉज़िटिव चार्ज़ भी होता है और नेगेटिव भी. जब ये एक दूसरे के पास एक साथ भारी मात्रा में आते हैं तो इलेक्ट्रिसिटी पैदा होती है. इसे ही बादलों के भीतर बिजली चमकना कहते हैं.

2) बादलों के बीच (CC / Cloud To Cloud)

एक बादल का नेगेटिव चार्ज़ जब दूसरे के नेगेटिव चार्ज़ के पास आता है तो ठीक वैसे ही इलेक्ट्रिसिटी पैदा होती है, जैसे बादलों के अंदर.

(ये दोनों ही बिजली का कड़कना है. तीसरा है, बिजली के चमकने/कड़कने के साथ-साथ बिजली का गिरना)

3) बादलों और ज़मीन के बीच (CG / Cloud To Ground)

बादलों का नेगेटिव चार्ज़ जब धरती में ‘डिस्चार्ज’ होता है, तो उसे बिजली का गिरना कहते हैं.

घर तक पहुंचने वाली बिजली की ताकत ऊपर से गिरने वाली बिजली के सामने कुछ भी नहीं.
घर तक पहुंचने वाली बिजली की ताकत ऊपर से गिरने वाली बिजली के सामने कुछ भी नहीं.

जब बिजली ज़मीन पर गिरती है तो उसकी ताकत दस करोड़ वोल्ट तक होती है. ये कितनी भीषण है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि हमारे घर में सप्लाई होने वाली बिजली की ताकत महज 220 वोल्ट होती है.


कुछ मज़ेदार फैक्ट्स

# सच, झूठ और उसके बीच का कुछ

देखिए, बिजली के कड़कने के पूरे विज्ञान के बारे में अभी निश्चित तौर पर कोई कुछ नहीं कह सकता. बिजली कड़कने का अध्ययन अब भी ज़ारी है. और अध्ययन की इस शाखा को ‘फुल्मिंगोलॉजी’ कहा जाता है.

# CG में जो प्रकाश हम देखते हैं, वह वास्तव में एक रिटर्न-स्ट्रोक है

सबसे पहले बिजली बादल से पृथ्वी की ओर बहती है. जिस रास्ते से ये बहती है, उसे ‘स्टेप्ड लीडर’ कहा जाता है. ‘स्टेप्ड लीडर’ की रोशनी बहुत मंद होती है. नंगी आंखों से इसे नहीं देखा जा सकता. जब ‘स्टेप्ड लीडर’ जमीन के पर्याप्त करीब होती है, ठीक उसी वक्त एक ‘स्टेप्ड लीडर’ ज़मीन से बादल की ओर भी बनती है. जब ये दोनों आपस में मिलती हैं तो एक हाई वोल्टेज का करंट डिस्चार्ज होता है, और वापस ज़मीन की ओर को बहता है. करंट का यह डिस्चार्ज तेज रोशनी पैदा करता है, जो ‘स्टेप्ड लीडर’ के रास्ते वापस लौटता है.

इस लौटने वाली रोशनी को देखकर हम सोचते हैं कि शायद बिजली नीचे की दिशा में चल रही है लेकिन वास्तविकता यह है कि यह ऊपर की दिशा में जा रही होती है.

# आवाज़

बिजली गिरने के वक्त आवाज़ क्यूं होती है, इसे समझने के लिए एक और मज़ेदार बात बताते हैं. आसमान से जो बिजली गिरती है, उसका टेम्प्रेचर सूरज की सतह से पांच गुना अधिक होता है. मतलब जब ये ज़मीन में गिरती है तो अपने पूरे रास्ते को बहुत कम समय में बहुत ज़्यादा गर्म कर देती है. इसलिए गुज़रने वाले रास्ते की हवा पहले तो बड़ी तेज़ी से संकुचित होती है, फिर वायुमंडल के दबाव के चलते तेज़ी से एक्सपेंड. ये इतनी तेज़ी से एक्सपेंड होती है कि उसे फैलना नहीं फटना कहा जा सकता है. और इसी फटने के चलते बहुत तेज़ आवाज़ या धमाका होता है.

# आवाज़ और प्रकाश

अब ये हर कोई जानता है कि हम तक बिजली की चमक पहले और आवाज़ बाद में इसलिए पहुंचती है क्यूंकि प्रकाश ध्वनि से कहीं तेज़ चलता है. लेकिन इन दोनों के बीच के अंतर से आप ये पता लगा सकते हैं कि बिजली कितनी दूर गिरी.

कुछ कैलकुलेशन के बाद ये रिजल्ट आता है कि अगर बिजली की रौशनी के 5 सेकेंड बाद आवाज़ सुनाई देती है तो बिजली हमसे 1 मील दूर गिरी या चमकी होगी. इस हिसाब से अगर 10 सेकेंड बाद आवाज़ सुनाई देती है तो बिजली हमसे 2 मील दूर गिरेगी.

क्रिएटिव: Glenn Research Centre
क्रिएटिव: Glenn Research Center

अब आप कहेंगे कि इतनी दूर से बिजली दिखेगी क्या? तो ये जान लीजिए कि बिजली का कड़कना 100 मील की दूरी तक से दिखाई दे सकता है. लेकिन उसकी गरज (आवाज़) ज़्यादा से ज़्यादा 12 मील तक ही जा पाती है.

# इंसान पर बिजली के गिरने से क्या होगा

जितने लोगों पर आज तक बिजली गिरी है, उनमें से केवल 10 प्रतिशत लोग ही मरे हैं. क्यूंकि आसमान से गिरने वाली बिजली का तापमान और करंट चाहे बहुत ज़्यादा हो लेकिन ये रहती सेकेंड के हज़ारवें से लेकर 500वें भाग तक ही. ये ऐसा ही है जैसे किसी गर्म तवे को फटाफट छूकर उसमें से हाथ हटा लेना.

लेकिन फिर भी आसमान से गिरने वाली बिजली अपनी शक्ति के चलते, जिसकी तुलना हमने गर्म तवे से नहीं सूरज की रौशनी से की थी, बहुत ज़्यादा नुकसान कर देती है. सबसे पहले तो ये शरीर के जिस भाग से गुज़रती है और जहां से निकलती है, वहां तक स्किन पर एक निशान छोड़ जाती है. ये निशान किसी पेड़ की जड़ का ‘टैटू’ सरीखा लगता है. इसे ‘लिचटेनबर्ग फिगर’ कहा जाता है.

साथ ही उन दस प्रतिशत केसेज़ में जिसमें बिजली गिरने के बाद इंसान नहीं बच पाता, हृदय का रुकना महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है.

लिचटेनबर्ग फिगर (तस्वीर: dezinfo.net)
लिचटेनबर्ग फिगर (तस्वीर: dezinfo.net)

बिजली गिरने के दौरान दिमाग भी एक क्षण (से बहुत छोटे हिस्से) के लिए झनझना जाता है. खासतौर पर तब, जब बिजली सीधे सिर पर गिरी हो.

लेकिन वो 90 प्रतिशत व्यक्ति जो सर्वाइव कर जाते हैं, उनमें भी कई दिक्कतें आ सकती हैं. जैसे तेज़ आवाज़ के चलते कानों का फट जाना. शरीर के किसी विशेष अंग या पूरे शरीर में लकवा मार जाना. साथ ही बिजली गिरने के टेरर के बाद कुछ ‘मनोवैज्ञानिक’ दिक्कतें भी होने लगती हैं. जिनमें एक दो घंटे तक ‘शॉक हो जाना’ जैसे छोटे मोटे मनोवैज्ञानिक प्रभाव से लेकर, डिप्रेशन और आत्महत्या के विचार जैसे बड़े दुष्परिणाम शामिल हैं.

# पेड़ों पर बिजली के गिरने से क्या होगा

यदि बिजली किसी पेड़ पर गिरे तो पेड़ में विस्फोट हो सकता है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बिजली के गिरने से उत्पन्न भारी गर्मी, पेड़ के अंदर मौज़ूद नमी को वाष्पीकृत करती है और भाप पैदा करती है जो पेड़ के तने को फोड़कर तेज़ी से बाहर निकलती है.

पेड़ों की हालत
बिजली गिरने के बाद पेड़ों की हालत (तस्वीर: ianluntecology.com और विकीमीडिया)

लेकिन बिजली गिरना पेड़ों के लिए ‘कभी-कभी’ नुकसानदायक और ‘सदा’ लाभदायक होता है. वो इसलिए क्यूंकि बिजली कड़कने के दौरान उसकी गर्मी के चलते नाइट्रोजन और ऑक्सीजन बॉन्ड बनाकर नाइट्रोजन ऑक्साइड बनाते हैं. इस दौरान जो बारिश पेड़ पौधों में पड़ती है, उसमें ‘नाइट्रेट’ की काफी मात्रा होती है. नाइट्रेट पेड़-पौधों और फसलों के लिए लाभदायक होता है.

# फल्गुराइट

जब एक बेहद शक्तिशाली बिजली किसी चट्टान या रेत पर गिरती है तो इससे उत्पन्न गर्मी की भारी मात्रा के चलते चट्टान या रेत के मिनरल्स आपस में फ्यूज़ हो जाते हैं. यह संलयन/फ्यूज़न एक ट्यूब के रूप में होता है जिसे फल्गुराइट के नाम से जाना जाता है. इसे बिजली का ‘जीवाश्म’ भी कहते हैं. अपेक्षाकृत दुर्लभ होने के बावजूद दुनिया के हर कोने में ये पाया जाता है.

Fossil
फल्गुराइट का ‘फ़न’

# एस्ट्राफ़ोबिया –

बिजली गिरने के डर को एस्ट्राफ़ोबिया कहा जाता है.

और हां अंत में एक बात और, ये गलत है धारणा है कि एक बार जहां बिजली गिर जाए वहां दोबारा नहीं गिरती.


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