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72 पार होने जा रहे रुपए को $1 के बराबर करना पन्ने फाड़ने सरीखा आसान है, बस एक छोटी सी दिक्कत है!

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मेरा एक दोस्त है. जर्मनी में रहता है. है इंडियन. पूरा परिवार इंडिया में ही रहता है. दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में. लेकिन ये दोस्त पिछले 2-3 सालों से जर्मनी में रह रहा है. एक्सेंचर में जॉब करता है, और एक्सेंचर ने ही उसे जर्मनी में पोस्टिंग दे रखी है. महीने दो महीने में एक बार मुझे भी कॉल कर लेता है. कल उसका कॉल आया था. अबकी बार उसने दिल्ली की लू और गाज़ियाबाद की बू की बात नहीं पूछी. अबकी बार उसने कोई भी बात नहीं पूछी.

अबकी उसने बात बताई, और चहकते हुए बताई – ‘यार डॉलर के मुकाबले पैसा गिर रहा है. मेरे लिए तो ये ऐसा ही है जैसे बिना एप्रेज़ल के सैलरी का बढ़ जाना.’

मेरे कुछ-कुछ समझ में आया, पर पूरा नहीं. बहरहाल उसकी ख़ुशी में मैं भी जाने अनजाने शरीक हो गया, न न ख़ुशी नहीं हुई. दोस्त की सैलरी बढ़ने में किस ‘भले इंसान’ को ख़ुशी होती है भला. तो शरीक हो गया का मतलब, मुझे भी ये जानने की प्रबल इच्छा हो गई कि ये देशद्रोही दोस्त पैसे के गिरने पर खुश क्यूं है. इसे तो देश छोड़ के चले जाना चाहिए. मगर फिर याद आया कि वो तो पहले ही जा चुका है.

खैर, मेरा एक और अजीज़ दोस्त है जिससे मैं आजिज़ आ चुका हूं. छोटा-मोटा स्टार्टअप है उसका. आयुर्वेदिक प्रोडक्ट्स का. ओखला फेज़ टू में फैक्ट्री सी कुछ है. वो अपने सारे शुद्ध भारतीय आयुर्वेदिक प्रोडक्ट चाइना से इंपोर्ट करता है और उसमें मेक इन इंडिया और शेर की फोटो लगाकर आईएन मार्केट में बेचता है. आज सुबह ब्रेकफास्ट के टाइम में मेरा टाइम खोटी करने आ गया. वो रोतडू है. मतलब उसे मोदी सरकार से लेकर मियादी बुखार तक हर उस चीज़ से दिक्कत है जिससे उसका कोई लेना देना नहीं है. और यूं उसका नाम आप ‘अपोजिशन’ भी रख सकते हैं.

बारिश और एक्सचेंज रेट में ये कॉमन है कि इसका असर सब पर अलग अलग होता है.
बारिश और एक्सचेंज रेट में ये कॉमन है कि इसका असर सब पर अलग अलग होता है.

तो हमेशा की तरह कल भी मेरे पास एक्सक्लूसिवली रोने के लिए आ गया. कुछ भी खाने का मूड नहीं है कह कर मेरे हिस्से के दो परांठे चट कर गया. और रोते रोते बोला – ‘यार डॉलर के मुकाबले पैसा गिर रहा है. मेरे लिए तो ये ऐसा ही है जैसे जीएसटी का 8 से बढ़ के 24 प्रतिशत हो जाना.’

इन दोनों दोस्तों की बातें सुनकर मुझे लगा कि डॉलर के मुकाबले रुपये के रेट का घटना बढ़ना उस बारिश सरीखा है जिससे किसान खुश होता है तो कुम्हार दुखी.

रिसर्च की और बात समझ में आई कि इस डॉलर V/S रुपया वार में मेरे ये दो दोस्त ही नहीं हम आप और सारे लोग प्रभावित हो रहे हैं. ये कोई हल्क या आयरन मैन वाली सिंगल सुपरहीरो वाली मूवी नहीं ये तो एवेंजर्स की इनफिनिटी वार है, जिसमें हर कोई शामिल है. इसलिए सोचा कि क्यूं न अपनी रिसर्च के कुछ इंट्रेस्टिंग फैक्ट्स आपको भी बताए जाएं जिससे आपके भी ज्ञान में कम से कम उतनी वृद्धि तो हो ही जाए जितनी मेरी हो चुकी है.

तो इस सच्ची घटनाओं से प्रेरित पोस्ट में 14 सवाल हैं जिनके उत्तर हम खोज रहे हैं –

1) रुपया क्या है? कैसे काम करता है?
2) फॉरन करेंसी रिज़र्व क्या है?
3) ट्रेड डेफिसिट और ट्रेड सरप्लस क्या है?
4) डॉलर का इंटरनेशनल ट्रेड में क्या महत्त्व है?
5) क्या सबसे मजबूत वो मुद्रा होती है जिसके बदले सबसे ज़्यादा डॉलर मिलें?
6) क्या एक डॉलर बराबर एक रुपया हो सकता है?
7) रुपये के मुकाबले डॉलर का इतिहास क्या रहा है?
8) मार्केट डॉलर और रुपये के बीच को कैसे कंट्रोल करता है?
9) सरकार क्या कर सकती है?
10) ‘फॉरन करेंसी रिज़र्व’ का क्या महत्व है?
11) डॉलर को ही रुपये के मुकाबले क्यूं रखा गया है?
12) डॉलर और रुपये के मुकाबले में किसी एक के जीतने या हारने के भारत को क्या फायदे या नुकसान हैं?
13) फॉरेक्स क्या है?
14) फ़ॉरेक्स मार्केट में डॉलर खरीदने और बेचने का मूल्य अलग अलग क्यूं होता है?


# रुपया क्या है, कैसे काम करता है?

मैं ज़्यादा नहीं मांगता. (सांकेतिक चित्र)
मैं ज़्यादा नहीं मांगता. (सांकेतिक चित्र)

एक काल्पनिक देश है – इंडिया. उस देश में बाकी सब कुछ वैसा ही है जैसा हमारे देश में. बस वहां रुपये-पैसे के बारे में कोई नहीं जानता. तो इस देश में रहने वाले राजू के खेत में जमकर आलू उगे. उसे उन आलुओं को तोड़ने और इकट्ठा करने के लिए पड़ौस के सोनू से हेल्प लेनी पड़ी. सोनू का धन्यवाद देने के लिए राजू ने एक कागज़ में थैंक्स लिखा और राजू को पकड़ा दिया.

अब सोनू के पेट में एक दिन दर्द हुआ, तो वो डॉक्टर के पास गया. डॉक्टर ने उसका इलाज कर दिया. इसके एवज़ में सोनू ने राजू से लिया थैंक्यू नोट डॉक्टर को पकड़ा दिया.

अंततः जब डॉक्टर को भूख लगी तो वो राजू के पास गया जिसके खेत में अबकी खूब ढेर सारे आलू उगे थे. राजू ने कुछ आलू डॉक्टर को दे दिए और कहना न होगा कि इस एहसान के एवज़ में उसको जो थैंक्स वाला नोट मिला था वो उसी का दिया हुआ था. उसने वो नोट फाड़ कर फेंक दिया और अब राजू, सोनू और डॉक्टर में से कोई भी किसी के एहसान तले नहीं दबा था.

लेकिन राजू, सोनू और डॉक्टर तो ईमानदार थे. क्या होता कि सोनू बेईमान होता और आलू की खेती में हेल्प किए बिना ही एक थैंक्यू का नोट बना लेता और अपना इलाज करवा लेता? क्यूंकि वो भी थैंक्स नोट बनाने के लिए उतना ही फ्री था जितना राजू. और डॉक्टर भी थैंक्स नोट बनाने के लिए उतना ही आज़ाद है जितना राजू और सोनू. और इनमें से कोई भी अपना काम किए बगैर ही औरों से काम निकलवा सकता था. तो इसलिए अब थैंक्स नोट में एक मुहर लगना शुरू हुई, जो तीनों की देखरेख और सहमती से लगती थी. यूं गिनती भर के थैंक्स नोट छाप के सबमें बांट दिए गए. इसको उस देश में रुपया कहा जाने लगा.

मगर अब दिक्कत ये हो गई थी कि सोनू ने तो केवल एक बार राजू की खेती में हेल्प की थी लेकिन उसे डॉक्टर के पास दो तीन बार जाना पड़ा. वहीं डॉक्टर को राजू के पास आलुओं के लिए रोज़ ही एक बार जाना पड़ता. यूं राजू के पास रुपयों की भरमार हो गई और डॉक्टर और सोनू की जेब ख़ाली.

रुपया फेल हो गया!

तो सुझाव आया कि जैसे ही किसी एक की जेब ख़ाली हुई वैसे ही फिर से कुछ और रुपये बनाए जाएं और फिर से बांट दिए जाएं.

यूं डॉक्टर हर बार खाली हो जाता और फिर से नोट बनते और उधर राजू के पास ढेर सारे रुपये इकट्ठा हो गए. एक दिन डॉक्टर ने गुस्से में आकर राजू और सोनू का इलाज करने से मना कर दिया. तो सोनू ने उसे 2 रुपये देने की पेशकश की. डॉक्टर नहीं माना. पांच दिन बाद जब सोनू की हालत और खराब हो गई और जीने मरने पर बात आ गई तो वो डॉक्टर के पास 100-200 रुपये लेकर पहुंचा. डॉक्टर अपना ‘मूल्य’ समझ गया और 200 रुपये लेकर सोनू का इलाज किया. यूं अब डॉक्टर की फीस 200 रुपये हो गई थी. वहीं सोनू और डॉक्टर दोनों ही राजू के पास एक दिन छोड़कर आलू लेने जाते. क्यूंकि एक दिन भूखे रहने से इतना फर्क नहीं पड़ना था. इससे राजू के पास रुपयों की कमी होने लग गई उसने एक रुपये में डेढ़ दिन के आलू देने शुरू कर दिए.

पैसा एक मैट्रिक्स है, एक माया है!
पैसा एक मैट्रिक्स है, एक माया है!

अब इस कहानी में ‘सप्लाई-एंड डिमांड’ और ‘डिमिनिशिंग मार्जिनल यूटिलिटी’ भी है. इसमें ‘मनी’ का और ‘डेब्ट’ का कांसेप्ट भी है. इसमें फिलोसोफी के सिद्धांत ‘इथिक्स’ की भी चर्चा है और अंततः ये कहानी आदमी के एक ‘अस्तित्व हीन’ चीज़ यानी रुपया या माया के प्रति लालच को भी दर्शाती है. लेकिन हमने उन सिद्धांतों का नामकरण नहीं किया था.

# रुपया –

रुपया एक एहसान चुकाने का ऑफिशियल जरिया है. मतलब यदि आप ऑफिस में काम करते हैं, तो आपकी कंपनी आपको एक ऐसा ऑफिशियल थैंक्स देती है जो हर जगह वैलिड है. यानी वो थैंक्स आप किसी और को देकर उससे अपना काम निकलवा सकते हो और आप पर – ‘मैं आपका एहसान कैसे चुकाऊंगा’ का भार नहीं पड़ता. और वो दूसरा तीसरी जगह. यूं पैसा यानी एहसान का जस्ट उल्टा (या थैंक्स) घूमता रहता है. और एहसान का ‘डेब्ट’ चुकता रहता है. यानी आपके पास जितना ज़्यादा रुपया है आप उतना ज़्यादा काम करवा सकते हो, बिना किसी का एहसान लिए या आप उतना ज़्यादा ‘डेब्ट’ चुका सकते हो.

# लॉ ऑफ़ डिमिनिशिंग मार्जिनल यूटिलिटी (सीमान्त उपयोगिता) –

आपको यदि तेज़ की भूख लगी है तो आप ज़्यादा पैसे देकर भी खाना खरीद सकते हैं लेकिन यदि भूख नहीं लगी तो उतना महंगा खाना नहीं खरीद के भी आप काम चला लेंगे और दबाव में आकर खाना बेचने वाले को दाम सस्ता करना पड़ेगा.

जितनी तेज़ भूख, उतना महंगा खाना.
जितनी तेज़ भूख, उतना महंगा खाना.

इसे दूसरी तरह से ऐसे समझिए कि एक भूखे के लिए पहली रोटी का मूल्य यदि सौ रुपये है तो दूसरी का घटकर पचास तीसरी का पच्चीस और चौथी का दस रुपये हो जाएगा. ज़रूरत के हिसाब से चीज़ों के दाम घट बढ़ जाएंगे. इसलिए ही तो हमारी कहानी में – डॉक्टर ज़्यादा कीमती इसलिए ही था क्यूंकि वो जीने मरने का सवाल था. वहीं आलुओं की ज़रूरत कम थी इसलिए राजू को अपने रेट घटाने पड़े.

# सप्लाई एंड डिमांड –

सोचिये यदि उस काल्पनिक देश में ढेरों डॉक्टर्स हो जाएं तो सोनू क्यूं ही डॉक्टर को 200 रुपये देगा? वो दूसरी जगह कम रुपयों में इलाज न करवा लेगा? वहीं यदि राजू के पास आलू कम हो जाएं तो वो डॉक्टर और सोनू से कहेगा कि – मत खाओ एक दिन, दो दिन बाद आओगे? तीन दिन बाद आओगे? तब लगाऊंगा मनचाहे रेट. तो यूं जो चीज़ मार्केट में जितनी ज़्यादा होगी उसे खरीदने के उतने ही कम पैसे लगेंगे और जो चीज़ जितनी कम होगी उसे खरीदने में उतने ही अधिक पैसे.


# फॉरन करेंसी रिज़र्व क्या है?

स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी - बहुत संभावना है कि जब भी कभी सपनों के देश अमेरिका जाओगे तो सबसे पहले यही दृश्य दिखेगा.
स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी – बहुत संभावना है कि जब भी कभी सपनों के देश अमेरिका जाओगे तो सबसे पहले यही दृश्य दिखेगा.

एक दूसरा काल्पनिक देश है – माना अमेरिका. अब यहां भी एक आलू उगाने वाला जॉन, एक बीमार टॉम और एक डॉक्टर रहते हैं. ये भी पहले वाले देश की तरह ही ‘थैंक्स नोट’ को लेकर वही सारे प्रयोग करते हैं मगर अपने वाले थैंक्स नोट का नाम डॉलर रख लेते हैं.

एक तीसरा काल्पनिक देश है – माना जर्मनी, वो अपने वाले थैंक्स का नाम यूरो और जापान नाम का काल्पनिक देश अपने थैंक्स का नाम येन रख देता है. बस यही है डॉलर, येन और रुपये के बीच में बेसिक अंतर.

कहानी आगे बढ़ती है. हमारी कहानी के काल्पनिक देश भारत में आलुओं की कमी पड़ने लगती है. वहीं जापान में डॉक्टर्स की. भारत जापान से आलू मंगवाता है और जापान वाले आकर अपना इलाज भारत में करवाते हैं. इसके एवज़ में वो अपने अपने थैंक्स-नोट यानी क्रमशः रुपया और येन एक दूसरे को देते हैं. बेशक हमारी कहानी में इस वक्त तक एक रुपया एक येन के बराबर ही है लेकिन फिर भी येन भारत के अंदर कूड़ा है वहीं भारत के रुपये जापान के भीतर कूड़ा हैं. तो क्या व्यापार किया ही न जाए?

नहीं!

दोनों देश डिसाइड करते हैं कि हम एक दूसरे के पैसे अपने-अपने देशों में तो चला नहीं सकते इसलिए हम दोनों ही अपने देश में आपके देश के पैसों का एक बैंक बना लेंगे. और वहीं पर आपके पैसे इकट्ठा करके रखेंगे. और जब एक दूसरे के देश से कोई खरीददारी करेंगे तो पहले आपके ही पैसे आपको लौटाएंगे फिर अपने वाले पैसे यूज़ करेंगे. तो एक बैंक जापान में बना जहां भारत का पैसा रखा गया और एक बैंक जापान में बना जहां भारत का पैसा.

जापान का पैसा भारत के लिए फॉरन करेंसी रिज़र्व कहा गया और भारत का पैसा जापान के लिए फॉरन रिज़र्व. अब यदि दोनों के पास बराबर फॉरन रिज़र्व होता तो वो एक दूसरे से पैसे बदल लेते और मस्त सब कुछ बराबर हो जाता. लेकिन जहां आलुओं के रेट कम थे वहीं इलाज के रेट ज़्यादा.


# ट्रेड डेफिसिट और ट्रेड सरप्लस क्या है?

विदेशी मुद्रा में लेनदेन का सबसे प्रमुख सोर्स है विदेशी आयात-निर्यात. (चाइना के शंघाई पोर्ट की एक फोटो.)
विदेशी मुद्रा में लेनदेन का सबसे प्रमुख सोर्स है विदेशी आयात-निर्यात. (चाइना के शंघाई पोर्ट की एक फोटो.)

और भी कई चीज़ें थीं जिनके चलते (बेशक उस वक्त तक एक येन और एक रुपया बराबर था फिर भी) भारत के पास जापान का फॉरन रिज़र्व ज़्यादा हो गया था. और पैसों की अदला बदली के बावज़ूद भी भारत के पास कुछ येन पड़े रह गए.

यहां पर आप ट्रेड डेफिसिट भी समझ सकते हैं. ट्रेड डेफिसिट मतलब आपका देश निर्यात तो कम पैसों का कर रहा है और आयात ज़्यादा पैसों का. मतलब हर बार वहां से 20 रुपये की चीज़ मंगा रहा है और यहां से 10 रुपये की चीज़ बेच रहा है. तो उसके पास हर बार के ट्रेड में 10 रुपये का ट्रेड डेफिसिट हो जा रहा है. यदि उल्टा हो यानी 20 रुपए की चीज़ बेचे और 10 की मंगाए तो ट्रेड सरप्लस.


# डॉलर का इंटरनेशनल ट्रेड में क्या महत्त्व है?

जापान - छोटा देश, बड़ी इकॉनमी
जापान – छोटा देश, बड़ी इकॉनमी

बहरहाल हम अपनी कहानी में आगे बढ़ते हैं. तो पैसों की अदला बदली में कुछ येन बचे रह गए भारत के पास. फॉरन रिज़र्व के रूप में. तो अब इन पैसों का तो भारत के लिए कोई महत्त्व ही नहीं था. क्यूंकि भारत में तो वो चलने ही नहीं थे. है न?

बिल्कुल!

फिर शुरू हुआ डिमांड एंड सप्लाई का कुचक्र. भारत के पास येन ज़्यादा हो गए तो उनका महत्त्व घट गया. जापान के पास रुपये कम हो गए तो उनका महत्त्व बढ़ गया. अब जब येन और रुपये में एक्सचेंज होता तो जिसके पास रुपये होते वो कहता कि भाई दो येन दोगे तो एक रुपया दूंगा. तो यूं जितना येन का फॉरन रिज़र्व बढ़ता गया उतनी उसकी रुपये के मुकाबले वैल्यू घटती गई.

तो इस काल्पनिक संसार में धीरे धीरे एक रुपये में 100 येन मिलने लगे.

लेकिन उधर दूसरी दिक्कत शुरू हो गई थी. केवल दो ही देश व्यापार नहीं कर रहे थे. हर देश, हर दूसरे देश से व्यापार कर रह था. यानी हर देश को बाकी सभी देशों की मुद्राओं का बैंक बनाना पड़ रहा था. हर देश में डेढ़ सौ से अधिक बैंक हो गए. हिसाब किताब रखना मुश्किल. डिसाइड हुआ कि पूरी दुनिया की मुद्रा एक ही कर दी जाए.

लक्समबर्ग, जॉर्जिया का एक साइन बोर्ड जो बताता है कि शेनेगन ज़ोन शुरू हो गया है.
जॉर्जिया का एक साइन बोर्ड जो बताता है कि शेनेगन ज़ोन शुरू हो गया है.

होने को तो आर्दश स्थिति यही होती, और भविष्य में ऐसा ही होगा इस काल्पनिक विश्व में, देख लेना. लेकिन अभी की बात की जाए तो जैसे क्लास में दो बच्चों के बीच फर्स्ट आने की होड़ और ऑफिस में प्रमोशन या इन्क्रीमेंट की होड़ होती है वैसे ही दो देशों के बीच भी और अमीर और अमीर बनने की होड़ होती है.

और फिर देश का कांसेप्ट ही क्या रहेगा. मुद्राओं को एक करने का मतलब होता देशों के बीच की सीमाएं भी हटा लेना. बल्कि ऐसा यूरोप नाम के एक काल्पनिक कॉन्टिनेंटल में हुआ भी और सफल भी रहा जब यूरोप के कई देशों ने अपनी एक ही मुद्रा कर लेने की ठानी – यूरो. ये सफल रहा और अब तक सफल है क्यूंकि अव्वल तो देशों की माली हालत में कोई अंतर नहीं था. दूसरा अमीर देशों ने थोड़ी बहुत सेक्रिफाईज़ भी किया. और सबसे महत्वपूर्ण अब इन यूरोपीय देशों के बीच सीमाएं केवल कहने भर के लिए रह गईं थीं, इतनी अच्छी तरह से कि आपको इन देशों को घूमने के लिए अलग वीज़ा तक लेने की ज़रूरत नहीं – एक शेनेगन वीज़ा काफी है.

हां तो जब ज़्यादातर देश वन वर्ल्ड, वन करेंसी के सिद्धांत पर सहमत नहीं हुए तो डिसाइड किया गया कि किसी एक देश की करेंसी को पूरे विश्व में यूज़ किया जाए और ऐसे में काम आया – डॉलर. सबने अपने-अपने बैंकों से दूसरे डेढ़ सौ देशों के पैसे निकाले और उनके बदले डॉलर खरीद लिए. अब हर एक को केवल दो करेंसी मेंटेन करनी पड़ती थीं – डॉलर और अपने देश की करेंसी.


# तो क्या सबसे मजबूत वो मुद्रा होती है जिसके बदले सबसे ज़्यादा डॉलर मिलें?

डॉलर और येन विश्व की कुछ सबसे मज़बूत मुद्राओं में से एक है.
डॉलर और येन विश्व की कुछ सबसे मज़बूत मुद्राओं में से एक है.

ये काल्पनिक कहानी यहां पर ख़त्म हो जाती है, अब हम वास्तविक स्थितियों की बातें करेंगे.

उससे पहले एक और सिनेरियो –

आप कोई क्विज़ खेल रहे हैं उस क्विज़ में हर सही सवाल में आपको एक पॉइंट मिलता है. अब आप दूसरी जगह कोई क्विज़ खेल रहे हैं वहां पर हर सही सवाल में आपको टेन पॉइंट्स मिलते हैं. आप तीसरी जगह क्विज़ खेलते हैं वहां पर हर सही सवाल में आपको हंड्रेड पॉइंट्स मिलते हैं. तो यदि आपके पहले क्विज़ में 4 पॉइंट्स है, दूसरे क्विज में 40 और तीसरे क्विज़ में 400 तो आप जानते हैं कि आपका परफोर्मेंस इक्वल रहा है और हर जगह आपने 4 सही जवाब दिए हैं.
वैसे ही यदि आपको ये बताया जाए कि एक डॉलर बराबर 1000 येन, 100 रुपये और 1 यूरो है तो इसका मतलब ये नहीं कि येन कमज़ोर है और यूरो सबसे मज़बूत. फर्क इससे नहीं पड़ता कि किसी विशेष समय में किसी मुद्रा की क्या वैल्यू है, फ़र्क इससे पड़ता है कि दिए हुए टाइम-फ्रेम में मुद्रा में कितना परिवर्तन हुआ.

यानी देश की तरह ही कोई भी मुद्रा कमज़ोर या मज़बूत नहीं होती, उसे मज़बूत बनाना पड़ता है.

क्यूंकि यदि जापान में किसी चीज़ की कीमत भारत के मुकाबले दस गुनी हुई लेकिन वहां की सैलरी भारत के मुकाबले बीस गुनी हुई तो वहां के लोग ज़्यादा अमीर हैं.

यानी ये कथन हमेशा ग़लत होगा कि – अमुक करेंसी एक मज़बूत करेंसी है. सही ये होगा कि अमुक करेंसी ‘पिछले पांच सालों’ में ‘डॉलर के मुकाबले’ मज़बूत हुई है.


# क्या एक डॉलर बराबर एक रुपया हो सकता है?

रुपया और डॉलर बराबर हो जाएंगे. बस इसके लिए एक बार और कतारों में लगना होगा मित्रों!
रुपया और डॉलर बराबर हो जाएंगे. बस इसके लिए एक बार और कतारों में लगना होगा मित्रों!

एक डॉलर बराबर एक रुपया करना कोई मुश्किल काम थोड़ी न है. सरकार से कहो एक करेंसी छपवाओ जिसमें अभी के 100 रुपये के बराबर एक नया रुपया कर दो. फिर ये वाले नोट रातों रात बंद कर दो. पचास दिन का समय और एक डॉलर बराबर एक रुपया. (ठीक वैसे ही जैसे पहले क्विज़ का एक पॉइंट दूसरे क्विज़ के दस पॉइंट के बराबर).

मगर फिर आपको सैलरी भी उसी हिसाब से मिलेगी.

बिना नए नोट छपवाए ही एक डॉलर बराबर एक रुपया करना है, तो वो भी पॉसिबल है. रुपये छापना कम कर दो. उन्हें फाड़ने लग जाओ. जितने पैसे मार्केट में कम होंगे धीरे-धीरे उनकी वेल्यू उतनी ही बढ़ जाएगी. (पता है डिमांड एंड सप्लाई) और एक दिन एक डॉलर एक रुपये के बराबर हो जाएगा. मगर याद रखिए इसका कोई फायदा नहीं. क्यूंकि हर चीज़ उसी प्रपोश्नेट में घटने बढ़ने लगेंगी.

लोग कहते हैं कि सबको अमीर करना है तो सरकार को ढेरों पैसे छापने चाहिए. लेकिन सरकार ऐसा नहीं करती क्यूंकि जितने पैसे छपेंगे चीज़ों के रेट उनके महंगे हो जाएंगे. यानी आज जो चीज़ एक रुपये की है वो, अगर दस गुने नोट छप गए और यदि बाकी परिस्थितियां सेम रहें तो, दस रुपये की हो जाएगी.

ठीक ऐसे ही आज जो चीज़ एक रुपये की है वो दस पैसे की हो जाएगी अगर मार्केट में अभी के केवल 1/10 नोट रह गए.

लेकिन उसी हिसाब से सैलरी मिलेगी, उसी हिसाब से बाकी खर्चे. और इसलिए ही सरकार न एक निश्चित सीमा से ज़्यादा पैसे छापती है न कम.


# रुपये के मुकाबले डॉलर का इतिहास क्या रहा है?

जब घड़ियाल ने रात के बारह बजाए और जब सारी दुनिया सो रही थी और भारत आज़ाद हो रहा था तब तेरह रुपए का मूल्य एक पाउंड था.
जब घड़ियाल ने रात के बारह बजाए और जब सारी दुनिया सो रही थी और भारत आज़ाद हो रहा था तब तेरह रुपए का मूल्य एक पाउंड था.

जब भारत आज़ाद हुआ था तो रुपये और डॉलर में नहीं रुपये और पाउंड में तुलना होती थी. ठीक तब 1 पाउंड 13 रुपये  (13.33, अगर बिल्कुल शुद्ध नापें) के बराबर था.

ऐसा दरअसल 1927 से 1966 तक रहा था. क्यूंकि देश आज़ाद होने से अंग्रेजों के हाथ में था और यूके की करेंसी थी पाउंड. 1966 में डॉलर और रुपये को पहली बार ‘ऑफिशियली’ एक दूसरे के सामने रखा गया था और तब डॉलर की वेल्यू थी 7.5 रुपये. फिर उसके बाद मार्केट ही डॉलर और रुपये के बीच के रिश्ते को कंट्रोल करता रहा.


# मार्केट डॉलर और रुपये के बीच को कैसे कंट्रोल करता है?

आरबीआई, पैसों के लिए वही है जो स्टूडेंट्स के लिए टीचर, और टीचर ने न होने पर मॉनिटर
आरबीआई, पैसों के लिए वही है जो स्टूडेंट्स के लिए टीचर, और टीचर ने न होने पर मॉनिटर

बहुत से कारक होते हैं लेकिन हर कारक एक ही जगह पर आकर टिक जाता है – डिमांड एंड सप्लाई. मांग और आपूर्ति.

जब से डॉलर और रुपये को एक दूसरे के सामने रखा गया है तब से ही डॉलर के मांग में बढ़त आती रही है जिसके चलते वो महंगा और महंगा होता रहा है.


# सरकार क्या कर सकती है?

जैसे तीन तरीके की शादियां होती हैं, वैसे ही तीन तरीके की एक्सचेंज़ पॉलिसी भी.
जैसे तीन तरीके की शादियां होती हैं, वैसे ही तीन तरीके की एक्सचेंज़ पॉलिसी भी.

डॉलर और अपनी देश की गृह मुद्रा (भारत के केस में रुपया) के बीच तीन तरह से रिश्ता हो सकता है.

# ‘फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट’ (लव मैरिज) –

जैसे लव मैरिज में माता पिता का कोई दखल नहीं होता वैसे ही फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट का अनुसरण करने वाले देशों की सरकारें अपने देश की मुद्रा और डॉलर के बीच के रिश्ते में कोई दखल नहीं देतीं और ये मार्केट या डिमांड-सप्लाई पर निर्भर करता है. पूरी तरह से तो कोई भी देश ‘फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट’ सिस्टम को फॉलो नहीं करता, जैसे कितनी ही लव मैरिज कर लो माता पिता का दखल तो रहता ही है. लेकिन सबसे अधिक कौन फॉलो करता है पूछा जाए तो उत्तर होगा कनाडा.

# ‘फिक्स्ड एक्सचेंज रेट’ (अरेंज मैरिज) –

जहां डॉलर और उसक देश की मुद्रा के आपसी रिश्ते को सरकार तय करती है उस देश के सिस्टम को ‘फिक्स्ड एक्सचेंज रेट’ सिस्टम कहा जाता है.

# ‘मैनेज्ड फ्लोट’ (लव कम अरेंज) –

ये भारत में होता है. इसमें कमोबेश मार्केट ही तय करता है कि कितने डॉलर बराबर कितना रुपया, लेकिन आरबीआई (रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया) ज़्यादा ऊपर-नीचे होने की स्थिति में बचाव के लिए आती है. कैसे?
हम जानते हैं कि डॉलर का मूल्य डिमांड एंड सप्लाई पर निर्भर है. अब यदि कभी रुपया गिर रहा है और बहुत तेज़ी के गिर रहा है तो आरबीआई मार्केट में डॉलर भेज देती है. उसके पास बहुत सारा ‘फॉरन रिज़र्व’ है. आए दिन सुनते हैं न कि भारत के पास 420 बिलियन डॉलर का रिकॉर्ड ‘फॉरन रिज़र्व’ हुआ. बस उसी में से कुछेक डॉलर छोड़ दिए जाते हैं.


# ‘फॉरन करेंसी रिज़र्व’ का क्या महत्व है?

भारत के गवर्नर उर्जित पटेल (सोचा लगे हाथों इनके भी दर्शन करवा दें.)
भारत के गवर्नर उर्जित पटेल (सोचा लगे हाथों इनके भी दर्शन करवा दें.)

ऊपर जब हमने काल्पनिक विश्व की बात की थी तब की भी बात की थी. बस अंतर ये है कि येन के बदले भारत के पास जितना डॉलर होगा उतना उसका ‘फॉरन करेंसी रिज़र्व’ माना जाएगा.

और इसका महत्व तो यही है कि ‘फॉरन करेंसी रिज़र्व’ हम भविष्य में घटने वाली ‘उतार-चढ़ाव’ वाली स्थितियों को बेहतर तरीके से मैनेज कर सकेंगे.


# डॉलर को ही रुपये के मुकाबले क्यूं रखा गया है?

‘ब्रेटन वुड्स सिस्टम’ लागू करने के हुई मीटिंग की तस्वीर. इस कांफ्रेंस के बाद कई देशों में सोने के बदले डॉलर को 'फॉरन रिज़र्वस' के रूप में मान्यता मिली.
‘ब्रेटन वुड्स सिस्टम’ लागू करने के हुई मीटिंग की तस्वीर. इस कांफ्रेंस के बाद कई देशों में सोने के बदले डॉलर को ‘फॉरन रिज़र्वस’ के रूप में मान्यता मिली.

अंतर्राष्ट्रीय व्यापर में दुनिया भर में तीन करेंसीज़ सबसे ज़्यादा चलती हैं – डॉलर, यूरो, पाउंड, येन. इनमें से भी डॉलर का शेयर 60% से ज़्यादा है. और ये एक दिन और एक कारक के चलते नहीं है. अव्वल तो ये सबसे शक्तिशाली देश की करेंसी है, इसलिए ज़्यादा स्थिर रहती है. मतलब ये नहीं कि आज डॉलर की वेल्यू 70 है तो कल 20 और परसों 100 हो जाएगी. और अगर ऐसा कभी हुआ भी तो वो डॉलर की अस्थिरता नहीं रुपये की अस्थिरता के चलते होगा.

मतलब ये कि जिस चीज़ से आप भार माप रहे हो यदि उसी बांट का वजन घटता बढ़ता रहे तो उससे क्या ही भार मापा जाएगा.

साथ ही अमेरिका का विश्व की राजनीति में भी गहरा प्रभाव है और एक और महत्वपूर्ण बात डॉलर के खाते में ये जाती है कि यूएस में डेढ़ से दो सदियों से स्थिरता बनी हुई है.

ऐतिहासिक रूप से बात करें तो ‘ब्रेटन वुड्स सिस्टम’ जिसमें अमेरिका, कनाडा, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल थे, ने भी डॉलर को एक वैश्विक मुद्रा बनाने में बड़ी भूमिका निभाई. इस सिस्टम के द्वारा सोने के बदल डॉलर को देशों का ऑफिशियल रिज़र्व बनवाया.

अब इस सबके चलते एक चक्र सा बना. डॉलर और स्ट्रॉन्ग होता गया और जितना स्ट्रॉन्ग होता गया उतना ज़्यादा फैलता गया.

यूं ये रुपये ही नहीं ढेरों अन्य करेंसीज़ को नापने का पैरामीटर बन गयी है.

देखिए जैसा हमने ऊपर एक उदाहरण में भी बताया था कि किसी मुद्रा के स्ट्रॉन्ग होने का मतलब ये नहीं होता कि उसके बदले कितनी दूसरी मुद्रा आ रही है. इसी तरह यहां पर भी साफ़ पता लगता है कि मुद्रा का स्ट्रॉन्ग होना उसकी और जिस देश का वो प्रतिनिधित्व करती है उसकी स्थिरता पर निर्भर करता है.

यानी इस एक सवाल का उत्तर कि डॉलर का मूल्य रुपये के बराबर कैसे लाया जाए के बदले सवाल ये होना चाहिए कि रुपये का मूल्य स्थिर कैसे रखा जाए. और उत्तर है – भारत को आर्थिक रूप से संपन्न बनाकर. करप्शन घटाकर. आलस मिटाकर.

किसी देश की मुद्रा की मज़बूती उस देश की स्थिरता और शांति नापने का भी ज़रिया है. (फोटो प्रथम विश्व युद्ध के बाद बर्बाद हुए जर्मनी की है, जहां पैसे का इतना अवमूल्य हो गया था कि लोग उसे टाइल्स के, घर को सजाने के और तरह तरह के आर्टवर्क बनाने में यूज़ करने लगे.)
किसी देश की मुद्रा की मज़बूती उस देश की स्थिरता और शांति नापने का भी ज़रिया है. (फोटो प्रथम विश्व युद्ध के बाद बर्बाद हुए जर्मनी की है, जहां पैसे का इतना अवमूल्य हो गया था कि लोग उसे टाइल्स के, घर को सजाने के और तरह तरह के आर्टवर्क बनाने में यूज़ करने लगे.)

याद है न, रुपया मतलब ‘डेब्ट’ का उल्टा, रुपया मतलब ‘थैंक्स’. तो ऐसे काम करिए जिनको करके आपको यकीन है कि लोग आपको थैंक्यू कहेंगे. क्यूंकि या तो उन कामों को करके लोग आपको थैंक्यू कहेंगे या आपको पैसे देंगे या फिर आपका एहसान मानेंगे, जिसे कभी नहीं चुका पाएंगे.

होने को ऊपर बताई अन्य करेंसीज़ में भी कमोबेश यही विशेषताएं हैं, इसलिए वो भी डॉलर की तरह ही कमोबेश वैश्विक मुद्राएं हैं.


# डॉलर और रुपये के मुकाबले में किसी एक के जीतने या हारने के भारत को क्या फायदे या नुकसान हैं?

प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि डॉलर के मुकाबले रुपया जितना गिरेगा उतना काम यूएस से भारत आउटसोर्स होगा.
प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि डॉलर के मुकाबले रुपया जितना गिरेगा उतना काम यूएस से भारत आउटसोर्स होगा.

देखिए ये मान के चलिए कि यदि रुपया गिर रहा है तो लॉन्ग टर्म में इसका यही मतलब है कि भारत की अर्थव्यवस्था अमेरिका और विश्व के बड़े देशों के बराबर नहीं बढ़ रही है. इसलिए एक देश के रूप में रुपये का गिरना हमेशा एक नेगेटिव चीज़ ही है. लेकिन कुछ लोगों, संस्थाओं को इसके फायदे हो सकते हैं. देश को भी इसके कुछ शॉर्ट टर्म फायदे हैं.

सबसे पहली बात – हमने डिस्कस किया ही था कि यदि डॉलर का मूल्य एक रुपये भी हो जाए तो भी भारत के अंदर होने वाली खरीद फ़रोख्त में कोई अंतर नहीं आएगा. क्यूंकि तब आप कम कमा रहे होंगे और चीज़ें सस्ती, बहुत सस्ती होंगी.
फर्क पड़ेगा तब जब आप डॉलर और रुपये दोनों में डील कर रहे हो.

यदि रुपया गिरता है तो विदेशों में जॉब करने वाले जो घर पैसा भिजवाते हैं उन्हें फायदा होगा. क्यूंकि जहां पहले वो सौ रुपये भिजवा पा रहे थे अब वो शायद एक सौ दस रुपये भिजवा पा रहे होंगे.

यदि रुपया गिरता है तो एक्सपोर्ट करने वालों को फायदा होगा. क्यूंकि पेमेंट डॉलर में होगा और उसे रुपये में एक्सचेंज करने पर ज़्यादा पैसे मिलेंगे.

यदि रुपया गिरता है तो इंपोर्ट करने वालों को नुकसान होगा. क्यूंकि पेमेंट डॉलर में होगा और रुपयों को डॉलर बनाने में ज़्यादा धन खर्च होगा.

दिक्कत भारत के साथ ये है कि वो इंपोर्ट ज़्यादा करता है और एक्सपोर्ट कम यानी रुपये के गिरने में कुल मिलाकर इंटरनेशनल ट्रेड में तो नुकसान ही होगा और दूसरी तरफ ट्रेड डेफिसिट के होने से रुपये की वैल्यू और घटेगी. यानी और नुकसान. और ऐसे ये एक कुचक्र बनेगा… बनता आया है…

रुपये के गिरने से इन्ल्फेशन और इन्फ्लेशन से रुपये का गिरना ज़ारी रहेगा. इन्ल्फेशन मतलब महंगाई. मतलब जो चीज़ आज एक रुपये की है कल दस रुपये की हो जाना.

अब हिसाब लगाइए, यदि रुपया गिरता है और बाकी सारी चीज़ें नहीं बदलतीं तो आज जो चीज़ एक डॉलर की है वो कल भी एक ही डॉलर की ही होगी. लेकिन वही रुपये में 68 के बदले 70 की हो जाएगी.

भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, वियेतनाम, इंडोनेशिया, म्यांमार में लेबर सस्ता है. लेकिन इसका कारण वहां की करेंसी का डॉलर के मुकाबले कम होना कतई नहीं है.
भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, वियेतनाम, इंडोनेशिया, म्यांमार में लेबर सस्ता है. लेकिन इसका कारण वहां की करेंसी का डॉलर के मुकाबले कम होना कतई नहीं है.

मुझे ये आश्चर्य होता है कि जब लोग कहते हैं रुपये और डॉलर में अंतर के चलते कॉल सेंटर वगैरह यहां आ रहे हैं. लेकिन हिसाब लगाइए वो इसलिए नहीं आ रहे कि डॉलर के मुकाबले रुपया गिर रहा है, बल्कि वो इसलिए यहां आ रहे हैं क्यूंकि यहां पर लेबर चीप है.

अब आप कहेंगे कि लेबर भी इसलिए ही चीप है क्यूंकि डॉलर के मुकाबले रुपया गिर रहा है. नहीं जनाब. लेबर चीप है क्यूंकि यदि यूएस में किसी को 5000 डॉलर मिलते हैं तो 1,149 डॉलर में आई फ़ोन 10 भी आ रहा है.

यानी इस हिसाब से भारत में उसको 3,45,000 रुपये मिलने चाहिए और आई फ़ोन 80,000 रुपये में आना चाहिए. लेकिन भारत में पैसे मिल रहे हैं साढ़े तीन लाख से कहीं कम और आई फ़ोन है 100,000 का.

तो लेबर चीप है का मतबल ये नहीं कि एक डॉलर बराबर 80 रुपये. बल्कि लेबर चीप है का मतबल लेबर वाकई में चीप है. यानी अगर पूरे विश्व की एक ही मुद्रा कर दी जाए तो भारत के मजदूर की दिहाड़ी अमेरिका के मजदूर से कम होगी.

हो सकता है कि थोड़ी बहुत फायदा इस एक्सचेंज रेट का भी मिल रहा हो, लेकिन बड़ा रीज़न है – भारतीय मजदूरों, कर्मचारियों का शोषण. हां ये ज़रूर है कि बेरोजगारी से फिर भी ये ऑप्शन बेहतर है.

और चलिए मान भी लिया जाए कि रेट ऑफ़ एक्सचेंज की वजह से आउटसोर्सिंग है. तो भी क्या ये अच्छी बात है? आर्दश स्थिति तो ये होती कि हमने भारत में ही जॉब्स जनरेट की होतीं. आउटसोर्सिंग फले-फूले इसके लिए रुपये के कमज़ोर होने की ‘देशद्रोही’ दुआएं तो न करते.


# फॉरेक्स क्या है?

अमेरिका के एक फॉरेक्स ट्रेडिंग कंपनी का कर्मचारी, ट्रंप की जीत को लाइव देखता हुआ.
अमेरिका के एक फॉरेक्स ट्रेडिंग कंपनी का कर्मचारी, ट्रंप की जीत को लाइव देखता हुआ.

फॉरेक्स का फुल फॉर्म होता है – फॉरन एक्सचेंज मार्केट. इस मार्केट में लोग एक मुद्रा को दूसरी मुद्रा में बदलते हैं और मुद्राओं की ट्रेडिंग यानी खरीद फ़रोख्त करते हैं.

मतलब अलग-अलग देशों की मुद्राओं की वैल्यू यहीं निर्धारित होती है.


# फ़ॉरेक्स मार्केट में डॉलर खरीदने और बेचने का मूल्य अलग अलग क्यूं होता है?

जिस तरह कोई हारे, कोई जीते कैसिनो को कभी नुकसान नहीं होता वैसा ही हिसाब फ़ॉरेक्स का भी है.
जिस तरह कोई हारे, कोई जीते कैसिनो को कभी नुकसान नहीं होता वैसा ही हिसाब फ़ॉरेक्स का भी है.

इसे एक दूसरी भाषा में कहा जाए तो दरअसल डॉलर खरीदने और बेचने का रेट तो एक ही होता है लेकिन चाहे आप बेचें या खरीदें, आपको कमीशन दोनों ही स्थिति में देना होगा.

जैसे माना अभी एक डॉलर का मूल्य 70 रुपये है. और हर डॉलर के ट्रांज़ेक्शन में कमिशन एक रुपया लिया जाता है चाहे आप खरीदें या बेचें तो –

आप एक डॉलर देंगे तो आपको उसके एवज़ में सत्तर रुपए दिए जाएंगे और एक रुपया कमिशन काट लिया जाएगा. यानी आपको मिले 69 रुपए. यानी डॉलर को बेचने का रेट (सैलिंग रेट) हो गया 69 रुपया.

आपको एक डॉलर खरीदना है तो आपको सत्तर रुपए तो देने ही होंगे मगर एक रुपया कमिशन भी देना होगा. यानी आपको देने होंगे 71 रुपए यानी डॉलर को खरीदने का रेट (बाइंग रेट) हो गया 71 रुपया.

अब ऊपर के उदाहरण में बेशक काल्पनिक संख्याएं ली गई हैं लेकिन आप गौर करेंगे तो हमेशा डॉलर का सैलिंग रेट सबसे कम, उसके बाद उसका वास्तविक रेट और सबसे अधिक उसका बाइंग रेट होगा.


# अंततः

मोदी सरकार के ट्विटर में फेमस कुछ मंत्रियों में से एक हैं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज.
मोदी सरकार के ट्विटर में फेमस कुछ मंत्रियों में से एक हैं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज.

जाते जाते आपको उस वक्त का एक वाकया बता देते हैं जब कांग्रेस सरकार में थी और रुपया गिर रहा था. अभी की सरकार में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, तब विपक्ष में थीं. सुषमा, जो आज भी ट्वीट से दिक्कतें सॉल्व करने के लिए जानी जाती हैं, ने तब भी एक ट्वीट करते हुए मनमोहन सरकार को कोसा था –

रुपये की वैल्यू गिर रही है, प्रधान मंत्री की छवि धूमिल हो रही है.

इसके जवाब में उस वक्त के सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कवितामय ट्वीट किया –

Leader of opposition Sushma Swaraj, PM Never loses grace.
Fact – BJP has lost its base.
Frustration is setting its political pace
and a leader of opposition who has lost intra- party space.

[विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, प्रधानमंत्री की छवि कभी धूमिल नहीं होती है. तथ्य तो ये है कि बीजेपी ने अपना आधार खो दिया है, निराशा उसकी राजनीतिक गति के आड़े आ रही है और एक विपक्ष का नेता जिसने अपनी पार्टी में ही अपनी जगह खो दी है.]


 

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