The Lallantop

पानी पीने वाले हर शख्स को मुंबई के पास बन रहे इस डेटा सेंटर के बारे में जान लेना चाहिए

Amazon मुंबई के पास ठाणे में अपना डेटा सेंटर बना रही है. REUTERS की रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई के पास घरों के ठीक बगल में बन रहे इस अमेज़न डेटा सेंटर का स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं. उन्हें बिजली और पानी की कमी का डर है. अमेज़न का कहना है कि वह जिम्मेदारी से काम करेगा और न तो कूलिंग के लिए पानी का इस्तेमाल करेगा और न ही घरों की बिजली का.

Advertisement
post-main-image
मुंबई के पास ठाणे में बन रहे Amazon के डेटा सेंटर का विरोध हो रहा है (तस्वीर: एआई)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • इंजीनियर तुषार शेट्टी ने ठाणे में 21वीं मंजिल पर घर खरीदा था, जहां अब उनके सामने अपने घर की खिड़की से लगे पेड़ों की जगह अमेज़न का डेटा सेंटर बन रहा है।
  • इस इलाके में अमेज़न द्वारा डेटा सेंटर बनाने के लिए पेड़ काटे गए और स्थानीय लोग बिजली-पानी की कमी को लेकर विरोध कर रहे हैं, क्योंकि डेटा सेंटर ऊर्जा और पानी की भारी खपत करता है।
  • भारत में डेटा सेंटरों के तेजी से निर्माण की वजह से जल और ऊर्जा संकट बढ़ने की आशंका है, जिसके चलते स्थानीय लोगों का विरोध जारी है और टेक कंपनियां वर्ष 2030 तक समाधान निकालने की योजना बना रही हैं।

इंजीनियर तुषार शेट्टी ने पांच महीने पहले मुंबई से सटे ठाणे में बड़े अरमानों से एक इमारत में 21वीं मंजिल पर घर खरीदा था. 46 वर्षीय शेट्टी अब अपने इस फैसले पर दुख जताते हुए कहते हैं, "अगर मुझे पहले से पता होता, तो मैं यह घर कभी नहीं खरीदता." जानते हैं क्यों? क्योंकि उनकी 21वीं मंजिल की खिड़की के बाहर, जो कभी हरे-भरे पेड़ों का खूबसूरत नजारा हुआ करता था, वह अब लाल मिट्टी का एक गड्ढा बनकर रह गया है. ऐसा इसलिए क्योंकि इस इलाके में ऐमजॉन के लिए पेड़ काट दिए गए हैं.

Advertisement

दरअसल इस जगह पर ऐमजॉन अपना डेटा सेंटर बना रही है. ये Amazon facility भारत में 2030 तक AI इंफ्रास्ट्रक्चर में टेक दिग्गज द्वारा किए जाने वाले 21 अरब डॉलर के निवेश का हिस्सा है. अब इसका विरोध शुरू हो गया है.

डेटा सेंटर ऊर्जा के 'पिशाच' हैं

REUTERS की रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई के पास घरों के ठीक बगल में बन रहे इस ऐमजॉन डेटा सेंटर का स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं. उन्हें बिजली और पानी की कमी का डर है. ऐमजॉन का कहना है कि वह जिम्मेदारी से काम करेगी. न तो कूलिंग के लिए पानी का इस्तेमाल करेगी और न ही घरों की बिजली का. 8 अक्टूबर को इस इलाके के सैकड़ों निवासी निर्माणाधीन डेटा सेंटर के पास एकत्र हुए. उनके हाथों में तख्तियां थीं जिन पर लिखा था: “डेटा सेंटर ऊर्जा के पिशाच (energy vampires) हैं.” 

Advertisement

वे चाहते हैं कि इस प्रोजेक्ट को कहीं और ट्रांसफर किया जाए. 62 वर्षीय वसुधा शेट्टी ने 54 एकड़ के इस डेटा सेंटर के पास फ्लैट खरीदा है. रॉयटर्स से बातचीत में वो कहती हैं, "अगर डेटा सेंटर का काम रुक जाता है, तो हम यहीं रहेंगे. अगर यह आगे बढ़ता है, तो हम यहां से चले जाएंगे." वसुधा ने कहा कि वह अपना रिटायरमेंट शांति से बिताना चाहती हैं.

इसी किस्म के सेंटर महाराष्ट्र से लेकर दक्षिण के आंध्र प्रदेश तक भी बन रहे हैं. गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा जैसी कंपनियां डेटा सेंटर के निर्माण में अरबों डॉलर लगा रही हैं. अब आपके मन में उठ रहे तीन सवालों का जवाब देते हैं.

# डेटा सेंटर का साफ पानी और बिजली से क्या लेना-देना है?

Advertisement

# टेक कंपनियों को इंडिया में ही क्यों डेटा सेंटर बनाना है?

# दुनिया जहान में डेटा सेंटर को लेकर जनता का क्या रुख है?

‘बिन पानी-बिजली एआई सून’

आप कोई सा भी चैट बॉट इस्तेमाल करते हैं, उसको चलाने के लिए चाहिए होता है GPU. एक कंप्यूटर चिप जिसका उपयोग कंप्यूटर से लेकर लैपटॉप, स्मार्टफोन और अन्य डिवाइसेज में पिक्चर, वीडियो, 2D और 3D एनिमेशन को डिस्प्ले करने के लिए किया जाता है. आम भाषा में इसे ग्राफिक्स कार्ड और वीडियो कार्ड भी कहते हैं.

इसी चिप की मदद से इमेज और वीडियो स्क्रीन पर जल्दी लोड होते हैं. नॉर्मल लैपटॉप तो बेसिक सा जीपीयू और अगर तगड़ा गेमिंग लैपटॉप तो जबर वाला. अब इसी GPU की जरूरत चैटबॉट को होती है. मतलब, उनके सिस्टम से लेकर क्लाउड स्टोरेज को. मसलन, चैट जीपीटी के एक मॉडल को ट्रेन करने के लिए 10,000 जीपीयू यूनिट्स की जरूरत पड़ी थी.

Residents fight Amazon data centre rising metres from homes near Mumbai
2027 तक AI सर्वर को 6.6 billion m³ पानी की जरूरत होगी (तस्वीर: एआई)

बड़े-बड़े डेटा सेंटर्स में इन जीपीयू के काम करने से एनर्जी जनरेट होती है और वहां का तापमान बढ़ जाता है. इसको ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल होता है पानी. जो चिलर्स जैसे सिस्टम से बहता है. ये एक किस्म का सिस्टम है, जिसमें पानी के पाइप के जरिए बहुत बढ़े हुए तापमान को कंट्रोल किया जाता है. ऐसी जगह पर परंपरागत AC काम नहीं आते. खाड़ी के देशों में इनका इस्तेमाल बहुत आम है.

Forbes की एक रिपोर्ट के मुताबिक, टेक कंपनियों ने इन डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल बहुत बढ़ा दिया है. रपट के मुताबिक, एक kWh एनर्जी से जो हीट पैदा होती है, उसके लिए 9 लीटर पानी लगता है. ऐसे शायद ये आंकड़ा छोटा लगे मगर United Nations Environmental Report के मुताबिक, 2027 तक AI सर्वर को 6.6 billion m³ पानी की जरूरत होगी. इसमें सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि सारे तामझाम में फ्रेश वाटर इस्तेमाल होता है. क्योंकि समुद्र के पानी में नमक होता है और वो चिलर्स के काम का नहीं.

भारत में ताजा पानी की उपलब्धता

दुनिया की 18 फीसदी आबादी के हिस्सेदार भारत में ताजा पानी का केवल 4 फीसदी हिस्सा उपलब्ध है. अकेले ऐमजॉन ने ही साल 2025 में अपने डेटा सेंटर के लिए दुनियाभर में 2.5 अरब गैलन (करीब 9.46 अरब लीटर) पानी का इस्तेमाल किया था. S&P Global का अनुमान है कि इस दशक में भारत के 60 फीसदी से 80 फीसदी डेटा सेंटरों को पानी की गंभीर किल्लत का सामना करना पड़ सकता है. रिसर्च फर्म मॉर्डोर इंटेलिजेंस (Mordor Intelligence) के अनुसार, 2025 में डेटा केंद्रों ने लगभग 150 अरब लीटर पानी का उपयोग किया था, जिसके 2030 तक दोगुने से भी अधिक होने का अनुमान है

अब बात करें बिजली की तो साल 2030 तक इन डेटा सेंटरों द्वारा बिजली की खपत दोगुनी होकर 945 TWh होने का अनुमान है. इतनी बिजली जापान में इस्तेमाल होती है. 1 TWh में 100 करोड़ यूनिट बिजली होती है. माने साफ पानी और बिजली की खपत दबाकर होने वाली है.

एआई कंपनियों को इंडिया क्यों पसंद है?

वैसे तो टेक और दुनिया की हर कंपनी के लिए चीन सबसे मुफीद जगह है. सस्ती लेबर से लेकर बड़ा इंफ्रा तक यहां आसानी से मिलता है. कंपनियां यहां से माल बनाकर दुनिया भर में सेल करती हैं. मगर डेटा सेंटर के मामले में उनका भरोसा चीन पर नहीं है. इसकी वजह चीन का अमेरिका को लेकर रुख भी है. उस पर अमेरिकी तकनीक को चुराने और कॉपी करने के आरोप तो लगते रहते हैं. ऐसे में डेटा सेंटर वहां बनाने का रिस्क कौन ले. बाकी देश इतना बड़ा सपोर्ट नहीं कर सकते. ऐसे में बचा भारत.

एआई की रेस में इस समय अमेरिका और चीन भारत से कहीं आगे हैं. इसलिए भारत एआई ना सही उसकी बैक बोन या कहें रीढ़ की हड्डी बनना चाहता है. सरकार ने तमाम एआई कंपनियों को भारत में डेटा सेंटर बनाने के लिए जरूरी सुविधाएं दी हैं. इसी साल हुई AI Summit में कई कंपनियों ने अपने डेटा सेंटर इंडिया में बनाने के लिए हामी भरी. रिलायंस और Anthropic की 10 लाख करोड़ की साझेदारी भी इसका बड़ा उदाहरण हैं. 

रिलायंस अमेरिकन कंपनी को इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद करेगा. OpenAI भी Tata Group के साथ मिलकर 100 मेगावॉट का डेटा सेंटर बनाने वाली है जिसे बाद में बढ़ाकर 1 गीगावॉट तक ले जाने की कोशिश होगी. गूगल तो साल 2025 में 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के निवेश का वादा कर चुका है.

डेटा सेंटर्स की वजह से इंडिया में हजारों नौकरियां पैदा होंगी. इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर बनेगा तो उसके आसपास डेवलपमेंट भी होगा. इसमें कोई शक नहीं है. लेकिन पानी और बिजली का क्या? मुंबई कोई अकेला उदाहरण नहीं है. 

रॉयटर्स में छपी Vibhuti Sharma, Munsif Vengattil और Aditya Kalra की रिपोर्ट के मुताबिक आंध्र प्रदेश में, पर्यावरणविद गूगल की 15 अरब डॉलर की डेटा सेंटर परियोजना का विरोध कर रहे हैं. वे वन्यजीवों, पानी और बिजली की आपूर्ति के जोखिमों का हवाला दे रहे हैं. आरोप लगा रहे हैं कि बिना अनुमति के मंदिर की जमीन का इस्तेमाल किया गया. हालांकि, गूगल और राज्य सरकार किसी भी गड़बड़ी से इनकार करते हैं.

दुनिया में डेटा सेंटर को लेकर क्या चल रहा?

अमेरिका के वर्जीनिया के उपनगरों से लेकर एम्स्टर्डम और डबलिन के बाहरी इलाकों तक, स्थानीय निवासी AI डेटा सेंटरों के फैलाव का लगातार विरोध कर रहे हैं. इसका असर भी दिखा है. दुनिया में सबसे ज्यादा डेटा सेंटरों वाले अमेरिकी राज्य वर्जीनिया में ऐमजॉन ने 2024 में आम लोगों की चिंताओं के कारण तीन डेटा सेंटर्स के प्रस्ताव को रोक दिया था. मतलब पीने लायक साफ पानी, बिजली, शोर, हरियाली को लेकर चिंता तो हर जगह हो रही है. देखते हैं आगे क्या होगा. 

वैसे बताया जाता है कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी कंपनियां इसके बारे में गंभीरता से सोच रही हैं. उनका लक्ष्य साल 2030 तक कोई और उपाय निकालने का है.

वीडियो: अमेजन-फ्लिपकार्ट सेल की 7 सबसे धांसू डील्स, कौन-सा प्रोडक्ट खरीदना होगा फायदे का सौदा?

Advertisement