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AI Summit India: भारत में ऐसा क्या है जो सुंदर पिचाई, सैम ऑल्टमैन जैसे दिग्गजों को खींच लाया?

AI Summit में OpenAI से लेकर Anthropic जैसी कंपनियों ने भारत की टाटा और रिलायंस जैसी कंपनियों से अरबों रुपयों की साझेदारी की घोषणा की है. ऐसा लगता है मानो हर टेक सीईओ के लिए अमेरिका के बाद इंडिया दूसरी पसंद है. एकदम ठीक बात, लेकिन यह सिक्के का एक पहलू (Secret Behind AI Summit India 2026) है. एक दूसरा पहलू भी है जो अच्छा और बुरा भी है.

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Secret Behind AI Summit India 2026
AI कंपनियों का इंडिया प्रेम
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सूर्यकांत मिश्रा
20 फ़रवरी 2026 (पब्लिश्ड: 10:30 PM IST)
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AI Summit खत्म हो चुका है. पांच दिन चले इस समिट में दुनिया भर के टेक सीईओ ने हिस्सा लिया. Nvidia के CEO Jensen Huang बीमारी की वजह से इस इवेंट में नहीं आ सके. लेकिन Open AI के Sam Altman, गूगल के सुंदर पिचाई, Anthropic के Dario Amodei जैसे बड़े नाम इसमें शामिल हुए. 

इतने बड़े इवेंट को देखकर तो ऐसे लगता (Secret Behind AI Summit India 2026) है मानो हर टेक सीईओ के लिए इंडिया दूसरी पसंद है. ऑफकोर्स अमेरिका पहली है. इंडिया की युवा जनसंख्या वाला यूजर बेस और कमाल टैलेंट से भरे लोग शायद कारण होंगे.

एकदम ठीक बात. युवाओं से भरे और नई तकनीक को अपनाने में माहिर देश किस टेक कंपनी की पसंद नहीं होंगे. AI कंपनियों के LLM मॉडल को सिखाने के लिए इतना बड़ा बेस कहां मिलेगा. लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है. एक दूसरा पहलू भी है जो अच्छा और बुरा भी है.

सवाल इंफ्रास्ट्रक्चर का है?

AI कंपनियों का प्रोडक्ट इस्तेमाल करने वाली कंपनियों का काम तो उनके क्लाउड स्टोरेज से चल जाता है. मगर AI कंपनियों का काम क्लाउड यानी आसमान से नहीं बल्कि बड़ी-बड़ी जमीनों से चलता है. AI कंपनियों के डेटा सेंटर्स जहां GPU से लेकर स्टोरेज डिवाइस लगे होते हैं, उनको रखने के लिए जमीन की जरूरत होती है. जमीन से मतलब यहां किसी खुले मैदान से नहीं है. बड़ी-बड़ी बिल्डिंग जिसमें डेटा स्टोर होता है.

ऐसे डेटा सेंटर्स को रन करने के लिए बहुत ज्यादा बिजली और साफ पानी की जरूरत होती है. बिजली का तो साफ समझ में आता है कि इसके बिना काम नहीं चलेगा. फिर भी थोड़ा बता देते हैं. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका को इस साल अक्टूबर तक 180 गीगावॉट पावर सप्लाई की जरूरत होगी. अभी उसके पास 56 गीगावॉट का जुगाड़ है. यह अभी के हालात हैं तो सोचिए अगले कुछ सालों में क्या होगा.

अगर आपको लगे कि अमेरिका के पास बिजली की कमी है क्या, तो कुछ ऐसा ही है. पिछले दो दशक से वहां बिजली की डिमांड एकदम फ्लैट थी. मगर गुजरे 5 सालों में डिमांड बहुत बढ़ गई है. U.S. इलेक्ट्रिक सिटी डिपार्टमेंट इसके लिए अरबों डॉलर का बजट भी लगा रहा है. मगर इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में सालों लगेंगे. तब तक कंपनियां क्या करेंगी?

बिजली के बाद साफ पानी भी चाहिए. बड़े-बड़े डेटा सेंटर्स में इन जीपीयू के काम करने से एनर्जी जनरेट होती है और वहां का तापमान बढ़ जाता है. इसको ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल होता है पानी. पानी जो चिलर्स जैसे सिस्टम से बहता है. ये एक किस्म का सिस्टम है, जिसमें पानी के पाइप के जरिए बहुत बढ़े हुए तापमान को कंट्रोल किया जाता है. 

ऐसी जगह पर परंपरागत AC काम नहीं आते. खाड़ी के देशों में इनका इस्तेमाल बहुत आम है. Forbes की एक रिपोर्ट के मुताबिक, टेक कंपनियों ने इन डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल बहुत बढ़ा दिया है. रपट के मुताबिक, एक kWh एनर्जी से जो हीट उत्पन्न होती है, उसके लिए 9 लीटर पानी लगता है. 

kWh एनर्जी मापने की एक इकाई है. कोई भी डिवाइस या प्रोडक्ट एक घंटे में जितनी ऊर्जा की खपत करेगा उसे kWh में मापा जाएगा. माने कि अगर एक चैट बॉट लगातार एक घंटे काम किया तो 9 लीटर पानी हवा हो गया.  

वैसे गूगल समेत सभी AI कंपनियां ऐसे AI मॉडल बनाने पर काम कर रही हैं जिनमें पानी की खपत कम हो, मगर वो अभी दूर की कौड़ी है. AI की डिमांड को रोका नहीं जा सकता इसलिए अमेरिका से इतर नया इंफ्रास्ट्रक्चर तो चाहिए.

चीन से क्यों नहीं चिपक जाते?

वैसे तो टेक और दुनिया की हर कंपनी के लिए चीन सबसे मुफीद जगह है. सस्ती लेबर से लेकर बड़ा इंफ्रा तक यहां आसानी से मिलता है. कंपनियां यहां से माल बनाकर दुनिया भर में सेल करती हैं. मगर डेटा सेंटर के मामले में उनका भरोसा चीन पर नहीं है. इसकी वजह चीन का अमेरिका को लेकर रुख भी है. चीन पर अमेरिकी तकनीक को चुराने और कॉपी करने के आरोप तो लगते रहते हैं. ऐसे में डेटा सेंटर वहां बनाने का रिस्क कौन ले. बाकी देश इतना बड़ा सपोर्ट नहीं कर सकते. ऐसे में बचा भारत.

India में इंटेलिजेंस भी है

इंडिया के इंफ्रास्ट्रक्चर में कितना दम है वो बताने के लिए कुछ उदाहरण ही काफी हैं. गूगल ने साल 2025 में Visakhapatnam (Vizag) में अपना डेटा सेंटर ओपन करने की घोषणा की है. कंपनी इसके ऊपर 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का इन्वेस्ट करेगी. OpenAI भी Tata Group के साथ मिलकर 100 मेगावॉट का डेटा सेंटर बनाने वाली है जिसे बाद में बढ़ाकर 1 गीगावॉट तक ले जाने की कोशिश होगी. 

माइक्रोसॉफ्ट के पास पुणे, मुंबई, चेन्नई में पहले से डेटा सेंटर हैं. हैदराबाद में इसी साल एक और ओपन हो जाएगा. मेटा भी Sify Technologies के साथ मिलकर Visakhapatnam (Vizag) में 500 MW का डेटा सेंटर बना रही है. भारत मे सस्ती लेबर और कम पैसे में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की बात तो करना ही क्यों.

साफ है कि AI कंपनियों के लिए इंडिया से अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर कहां मिलेगा. हाल ही में रिलायंस और Anthropic की 10 लाख करोड़ की साझेदारी भी इसका बड़ा उदाहरण हैं. रिलायंस अमेरिकन कंपनी को इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में मदद करेगा. इंडिया में सरकार और जनता दोनों को AI पसंद है. ChatGPT के पास इंडिया में हफ्ते के 10 करोड़ एक्टिव यूजर हैं.

NITI Aayog CEO Amitabh Kant भी India Today AI Impact Summit 2026 में इंडिया की ताकत का जिक्र कर चुके हैं. उन्होंने बताया कि इंडिया, अमेरिका की तुलना में ChatGPT को 33 फीसदी डेटा मुहैया करवाता है. माने हम बड़ी ताकत हो हैं.

क्या भला और क्या बुरा?

भला यह है कि AI कंपनियां अरबों डॉलर का इनवेस्टमेंट और लाखों नौकरियां लेकर आ रही हैं. लेकिन बुरा यह है कि कहीं यही डेटा सेंटर देश की बिजली और पानी को लील ना जाएं. अगर सरकार ने इसकी तरफ ध्यान दिया तो फिर मौज है. क्या पता अगले कुछ सालों में सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स के लिए अमेरिकन ड्रीम की जगह इंडियन ड्रीम ही असली लाइफ हो.

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