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जिसे कोई दावेदार नहीं मान रहा था, उसी ने विंबलडन में लिख दी 25 साल बाद नई कहानी

Wimbledon Semi-finals Lineup: विंबलडन 2026 में 23 साल के ब्रिटिश वाइल्ड कार्ड खिलाड़ी Arthur Fery ने Flavio Cobolli को हराकर सेमीफाइनल में बनाई जगह. 25 साल पहले भी एक वाइल्ड कार्ड खिलाड़ी Goran Ivanisevic ने विंबलडन में इतिहास रचा था. जानिए आखिर क्या है ये वाइल्ड कार्ड एंट्री का पूरा गणित.

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23 साल के आर्थर फेरी का वो जादुई सफर (फोटो-AFP)

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  • आर्थर फेरी ने विंबलडन 2026 के पुरुष सिंगल्स क्वार्टर फाइनल में फ्लेवियो कोबोली को हराकर सेमीफाइनल का टिकट हासिल किया, वो पिछले 25 सालों में पहला ब्रिटिश वाइल्ड कार्ड खिलाड़ी बने।
  • वाइल्ड कार्ड एंट्री नियम के तहत, ऑल इंग्लैंड क्लब की कमेटी ने आर्थर फेरी को अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग कमजोर होने के बावजूद घरेलू प्रदर्शन के आधार पर प्रतियोगिता में शामिल किया।
  • इस सफलता के बाद आर्थर फेरी का सामना सेमीफाइनल में विश्व के शीर्ष खिलाड़ियों से होगा, जिससे उनकी क्षमता और भविष्य की उपलब्धियों पर सबकी नजरें टिकी हैं।

टेनिस का सबसे बड़ा मंच, सफेद कपड़ों की वो पुरानी परंपरा और विंबलडन की मखमली हरी घास... अमूमन यहां वही नाम चमकते हैं जिनकी रैंकिंग आसमान छू रही होती है या जिनके नाम के आगे बड़े-बड़े खिताब दर्ज होते हैं. लेकिन 8 जुलाई 2026 की ये तपती दोपहरी टेनिस के इतिहास में कुछ अलग ही पन्ने जोड़ने के लिए तैयार थी. जब कोर्ट पर 23 साल का एक ब्रिटिश लड़का उतरा, तो शायद किसी ने नहीं सोचा था कि वो इतिहास की किताबों को नए सिरे से लिखने जा रहा है. नाम है आर्थर फेरी. सामने थे फ्लेवियो कोबोली. मुकाबला था विंबलडन के पुरुष सिंगल्स का क्वार्टर फाइनल. जब करीब 5 घंटे चला वो मैच खत्म हुआ, तो स्कोरबोर्ड चिल्ला-चिल्लाकर गवाही दे रहा था कि टेनिस की दुनिया को एक नया हीरो मिल चुका है.

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आर्थर फेरी ने कोबोली को हराकर सीधे सेमीफाइनल का टिकट कटा लिया है. पिछले 25 सालों में वो पहले ऐसे ब्रिटिश वाइल्ड कार्ड खिलाड़ी बन गए हैं, जिसने विंबलडन के सेमीफाइनल में कदम रखा है. ‘बीबीसी’ से लेकर पूरा सोशल मीडिया, खेल के गलियारे और खेल प्रेमी इस समय इसी लड़के के हुनर के मुरीद हो चुके हैं. कल तक जिसे बहुत कम लोग जानते थे, वो आज दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंट के अंतिम चार में खड़ा है. 

नियमों का खेल: आखिर ये 'वाइल्ड कार्ड' एंट्री क्या बला है?

अब सबसे बड़ा सवाल कि ये वाइल्ड कार्ड का कॉन्सेप्ट आखिर काम कैसे करता है. टेनिस में किसी भी ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट के मुख्य ड्रॉ में खेलने के लिए आपकी वर्ल्ड रैंकिंग बहुत मजबूत होनी चाहिए. अगर रैंकिंग नहीं है, तो आपको हफ्तों पहले से कड़े क्वालीफाइंग राउंड खेलने पड़ते हैं, जहां शरीर का कोना-कोना टूट जाता है. लेकिन इन तमाम सख्त नियमों के बीच एक खास चोर दरवाजा भी होता है, जिसे हम 'वाइल्ड कार्ड' एंट्री कहते हैं.

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‘विंबलडन’ की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक ये एंट्री हर किसी को खैरात में नहीं मिलती. इसके लिए ऑल इंग्लैंड क्लब की एक बेहद कड़क कमेटी बैठती है. ये कमेटी उन खिलाड़ियों को चुनती है जो किसी चोट की वजह से रैंकिंग में पिछड़ गए हों, या फिर कोई ऐसा लोकल खिलाड़ी हो जिसके खेल में गजब का टैलेंट हो और वो घरेलू दर्शकों का दिल जीत सके.

आर्थर फेरी को भी इसी खास कोटे से एंट्री मिली थी. जब वो कोर्ट पर उतरे थे, तो उनके नाम के आगे कोई बड़ी रैंकिंग का तमगा नहीं था. वो सिर्फ अपने रैकेट और अपनी उम्मीदों के भरोसे इस हरी घास पर आए थे. लेकिन किसे पता था कि कमेटी का ये एक फैसला पूरे टूर्नामेंट का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बन जाएगा. इस नियम के कारण ही टेनिस में कभी-कभी ऐसे चमत्कार देखने को मिलते हैं जो फैंस को बरसों तक याद रहते हैं. 

गुमनामी से विंबलडन के सेंटर कोर्ट तक: आर्थर फेरी का संघर्ष

आर्थर फेरी की ये कहानी सिर्फ एक मैच जीतने की नहीं है, बल्कि सालों की उस गुमनामी और संघर्ष की है जिससे हर जूनियर खिलाड़ी गुजरता है. टेनिस एक बेहद महंगा खेल है. इसमें कोच की फीस, ट्रेवलिंग का खर्चा और गियर का इंतजाम करना किसी भी आम परिवार के लिए एक बड़ा सपना होता है. फेरी ने भी अपने करियर के शुरुआती दिनों में छोटे-छोटे आईटीएफ और चैलेंजर टूर्नामेंट्स में हिस्सा लिया. वहां ना तो बड़ा मीडिया होता है और ना ही हजारों दर्शकों की भीड़. वहां सिर्फ एक खिलाड़ी होता है और उसका खुद से मुकाबला होता है.

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कई बार लगातार हार मिलने के बाद खिलाड़ी का हौसला टूटने लगता है. फेरी के साथ भी ऐसा दौर आया जब लगा कि शायद वो इस बड़े स्तर पर कभी नहीं खेल पाएंगे. लेकिन उन्होंने अपनी ट्रेनिंग पर भरोसा रखा. ‘ईएसपीएन’ के मुताबिक जब विंबलडन के आयोजकों ने उनके घरेलू प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें इस साल वाइल्ड कार्ड देने का फैसला किया, तो वो जानते थे कि ये उनके करियर का सबसे बड़ा मौका है. उन्होंने इस मौके को दोनों हाथों से लपका और कोर्ट पर वो कर दिखाया जिसकी उम्मीद खुद उनके कोच को भी नहीं रही होगी.

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23 साल के खिलाड़ी ने विंबलडन में 25 साल पुराना इतिहास जगा दिया (फोटो-AFP)

इतिहास का झरोखा: जब 25 साल पहले गोरान इवानिसेविच ने रचा था इतिहास

जब भी विंबलडन के इतिहास में किसी वाइल्ड कार्ड खिलाड़ी का नाम आता है, तो टेनिस प्रेमियों के जहन में साल 2001 का वो दौर तैर जाता है. ‘गार्डियन’ की रिपोर्ट के मुताबिक उस समय क्रोएशिया के दिग्गज खिलाड़ी गोरान इवानिसेविच अपनी चोटों से परेशान थे और उनकी रैंकिंग इतनी गिर चुकी थी कि उन्हें सीधे एंट्री नहीं मिल सकती थी. उन्हें वाइल्ड कार्ड दिया गया. इसके बाद जो हुआ, वो टेनिस के इतिहास का सबसे बड़ा चमत्कार था. इवानिसेविच ने एक के बाद एक दिग्गजों को धूल चटाई और विंबलडन का खिताब अपने नाम कर लिया. वो इतिहास में वाइल्ड कार्ड के जरिए चैंपियन बनने वाले इकलौते खिलाड़ी बने थे.

आज पूरे 25 साल बाद, आर्थर फेरी ने उसी पुराने जादुई अहसास को कोर्ट पर दोबारा जिंदा कर दिया है. एक ब्रिटिश खिलाड़ी के तौर पर विंबलडन के सेमीफाइनल में पहुंचना अपने आप में एक बहुत बड़ा भावनात्मक पल है. पूरा ब्रिटेन इस समय झूम रहा है क्योंकि उन्होंने अपने घर में एक ऐसे 'अंडरडॉग' को उगते देखा है, जिसने बिना किसी रसूख के दुनिया के बेहतरीन टेनिस खिलाड़ियों के पसीने छुड़ा दिए.

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क्रोशिया के गोरान इवानिसेविच ने 25 साल पहले रचा था इतिहास (फोटो- पीटीआई आरकाइव)

मेंटल गेम: जब खोने को कुछ ना हो, तो स्टार्स कैसे होते हैं पस्त?

अब जरा इस पूरे मुकाबले के दिमागी खेल यानी साइकोलॉजी को समझने की कोशिश करते हैं. जब कोई टॉप सी़डेड या बड़ी रैंकिंग वाला खिलाड़ी कोर्ट पर उतरता है, तो उसके कंधों पर एक अजीब सा भारी दबाव होता है. उसे अपनी रैंकिंग बचानी होती है, मीडिया के तीखे सवालों का सामना करना होता है और फैंस की उम्मीदों पर खरा उतरना होता है. इस दबाव में कभी-कभी बड़े से बड़े सूरमाओं के हाथ-पैर फूल जाते हैं. 

सीनियर स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट पद्मपति शर्मा मानते हैं कि फ्लेवियो कोबोली के साथ भी क्वार्टर फाइनल में कुछ ऐसा ही देखने को मिला. लल्लनटॉप से बात करते हुए पद्मपति कहते हैं,

कोबोली इस मैच में जीत के प्रबल दावेदार माने जा रहे थे, लेकिन इसी दबाव ने उनका खेल बिगाड़ दिया. वहीं दूसरी तरफ आर्थर फेरी जैसे वाइल्ड कार्ड खिलाड़ी का सीन एकदम सॉर्टेड था. उन्हें पता था कि वो यहां बिना किसी उम्मीद के आए हैं. 

पद्मपति शर्मा के मुताबिक,

जब कोबोली के सामने फेरी खेल रहे थे, तो उनके चेहरे पर एक गजब का सुकून था. हर एक शॉट में एक बेबाकी थी और वो हर पॉइंट पर रिस्क लेने से कतरा नहीं रहे थे. टेनिस में जब कोई खिलाड़ी बिना किसी डर के बेसलाइन से बड़े शॉट्स खेलने लगता है, तो सामने वाले बड़े स्टार की लाइन-लेंथ पूरी तरह बिगड़ जाती है. 

जिसने भी विंबलडन का वो क्वाटरफाइनल देखा, वो मानेंगे कि फेरी ने मैच के दौरान इसी मेंटल स्पेस का पूरा फायदा उठाया. उन्होंने कोबोली की सर्विस को लगातार ब्रेक किया और उन्हें दिमागी तौर पर बैकफुट पर धकेल दिया. जब स्टेडियम में मौजूद हजारों ब्रिटिश फैंस फेरी का नाम चिल्ला रहे थे, तो कोबोली के लिए उस दबाव को झेल पाना नामुमकिन हो गया.

आर्थर फेरी का फर्श से अर्श तक का सफर: एक नजर में

इस जादुई सफर को समझने के लिए हमें उस पूरी टाइमलाइन को देखना होगा कि ये लड़का कैसे हर बाधा को पार करते हुए यहां तक पहुंचा है,

वाइल्ड कार्ड का बुलावा: जून के आखिरी हफ्तों में जब ऑल इंग्लैंड क्लब ने अपने वाइल्ड कार्ड्स की लिस्ट जारी की, तो आर्थर फेरी का नाम उसमें शामिल था. घरेलू फैंस के लिए ये एक अच्छी खबर थी, लेकिन किसी ने उन्हें खिताब की रेस में नहीं गिना था.

शुरुआती राउंड्स का सरप्राइज: पहले और दूसरे राउंड में फेरी ने अपनी तेज तर्रार सर्विस और नेट पर आकर वॉली खेलने के अंदाज से सबको चौंका दिया. उन्होंने सीधे सेटों में जीत दर्ज कर अपने इरादे जाहिर कर दिए थे.

दिग्गजों से टक्कर: तीसरे और चौथे राउंड में जब उनका सामना अनुभवी खिलाड़ियों से हुआ, तो लगा कि अब इस युवा खिलाड़ी का सफर थम जाएगा. लेकिन फेरी ने हार नहीं मानी और पांच सेटों तक चले मैराथन मुकाबलों में अपनी फिटनेस का लोहा मनवाया.

8-9 जुलाई 2026 का वो पल: क्वार्टर फाइनल का वो महामुकाबला जहां सामने फ्लेवियो कोबोली थे. फेरी ने अपने करियर का सबसे बेहतरीन टेनिस खेलते हुए कोबोली को चारों खाने चित कर दिया और सेमीफाइनल का टिकट अपने नाम कर लिया.

ये सफर दिखाता है कि टेनिस सिर्फ ताकत या रैकेट की स्पीड का खेल नहीं है, ये इस बात का भी खेल है कि आप दबाव के क्षणों में खुद को कितना शांत रख पाते हैं. आर्थर फेरी ने साबित कर दिया है कि अगर आपके भीतर जज्बा हो, तो हरी घास पर किस्मत भी आपका साथ देने को मजबूर हो जाती है. 

क्या फेरी दोहरा पाएंगे 2001 का करिश्मा?

इस ऐतिहासिक जीत ने विंबलडन के इस सीजन में एक नई जान फूंक दी है. अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या आर्थर फेरी 25 साल पुराने उस इतिहास को दोहरा पाएंगे जो गोरान इवानिसेविच ने रचा था. सेमीफाइनल की चुनौती आसान नहीं होने वाली है क्योंकि अब उनका सामना दुनिया के सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों से होगा जो उनके खेल की शैली को अच्छी तरह से स्टडी करके आएंगे.

लेकिन इस ब्रिटिश लड़के ने ये तो साफ कर दिया है कि अब टेनिस में सिर्फ बड़े नामों का सिक्का नहीं चलेगा. जो लड़ेगा, जो बिना डरे खेलेगा, वही इस खेल का असली सुल्तान बनेगा. ऑल इंग्लैंड क्लब के कोर्ट पर जब फेरी अगले मुकाबले के लिए उतरेंगे, तो उनके साथ सिर्फ उनका रैकेट नहीं होगा, बल्कि करोड़ों उन फैंस की दुआएं और उम्मीदें भी होंगी जो खेल में किसी अंडरडॉग की जीत को देखना पसंद करते हैं.

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