खैर गुजरात में चुनाव की डेट में लेट होने की निम्नलिखित सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, पारिवारिक, तार्रिक, धार्मिक कारण हो सकते हैं.
1. लटकी हुई जन कल्याणकारी योजनाएं

Feeling alone
चुनाव आने के ऐन पहले प्रधानमंत्री जी को याद आया कि "ओह शिट, गुजरात में कितने काम पेंडिंग पड़े हैं जिनको देखने का पांच साल में मौका ही नहीं मिला." फिर वो डेढ़ महीने में पांचवी बार इस वक्त गुजरात में हैं. चुनाव आयोग को लगता है कि डेट लटकाने से अगर पब्लिक का कुछ फायदा होता है तो बुरा सौदा नहीं है.
2. स्याही की बोतल

हम जितनी छोड़ दिया करते थे पैमाने में, उतनी भी नहीं बची पूरे मैखाने में
वोट डालने के बाद जो स्याही मध्यमा में लगाई जाती है उसकी बोतलें खाली हैं. जब तक प्रॉपर स्याही मिल नहीं जाती तब तक चुनाव कराना खतरे से खाली नहीं होगा.
3. केजरीवाल की सहमति

तो करो न भई!
चुनाव आयोग केजरीवाल जी के सब्र का इम्तेहान ले रहा है. उसकी इच्छा है कि अरविंद केजरीवाल खुद अपनी तरफ से साफ साफ कह दें "हम नहीं उठाएंगे ईवीएम पर सवाल, अब तो प्लीज चुनाव करा लो सरकार."
4. बिकाऊ-दलबदलू नेता

बाप बड़ा न भैया
भाजपा-कांग्रेस में रिशफल आंदोलन चल रहा है. कहीं कोई भाजपा से कांग्रेस में जा रहा है तो कहीं कोई कांग्रेस से भाजपा में. कुछ नेताओं की बोली लग गई है. कुछ ने कम रेट देने की शिकायत की है. चुनाव आयोग कह रहा है कि ये सब पहले आराम से निपट लें. हमारी वजह से किसी का नुकसान क्यों हो?
5. 8 नवंबर का इंतजार

याद तो होगा ही
2016 का 8 नवंबर याद है. सबसे बड़ा ऐलान रात 8 बजे हुआ था. मोदी जी ने कहा था "भाइयों और बहनों." फिर सब बदल गया था. चुनाव आयोग भी उसी 8 नवंबर का इंतजार कर रहा है. बिग बैंग होगा.
अब एक वीडियो देख लो लगे हाथ.
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