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जब पाकिस्तान में चलते मैच के दौरान भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान पर हमला हुआ

1989 के दौरे का किस्सा. के श्रीकांत से आकर भिड़ा फैन. उसके बाद जो किरण मोरे ने किया वो कमाल है

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कप्तान के श्रीकांत, संजय मांजरेकर और विकेटकीपर किरण मोरे.
ये किस्से क्रिकेटर और कमेंटेटर संजय मांजरेकर की किताब में दिए ब्यौरों पर आधारित हैं. ये उनकी आत्मकथा है. टाइटल है इमपरफेक्ट. इसे हार्पर कॉलिन्स ने पब्लिश किया है.
1989 का भारतीय टीम का पाकिस्तान दौरा कमाल का था. पाकिस्तान की तरफ से एक मैच में 13 लोग खेलते थे. 11 प्लेयर और दो अंपायर. सकूर राणा जैसे कुख्यात अंपायर. जो पाकिस्तानी बॉलर की गेंद बैट्समेन के पैड पर लगते ही एलबीडब्लू करार देते थे. इमरान खान को पाकिस्तान की इस इमेज की चिंता थी. वह चाहते थे कि भारत को अपने दौरे में ये शिकायत करने का मौका न मिले. इसलिए उन्होंने पाकिस्तानी क्रिकेट बोर्ड पर अपने प्रेशर का इस्तेमाल कर सीरीज के लिए इंग्लैंड से दो अंपायर बुलाए.
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ये सीरीज कई वजहों से चर्चित हुई. पहला, सचिन तेंदुलकर का डेब्यू. दूसरा, अरसे बाद एक सीरीज जिसमें चार टेस्ट हुए और कोई विजेता नहीं. इसकी वजह ये थी कि चारों टेस्ट ड्रॉ हुए थे. तीसरा, भारतीय टीम का भारतीय बोर्ड से विवाद. जिसके चलते इस सीरीज के बाद टीम के कप्तान श्रीकांत को हटा दिया गया. ये विवाद सैलरी को लेकर था. पांचवा, इसी सीरीज के दौरान एक मैच के बाद अजहरुद्दीन से उस वक्त क्रिकेट बोर्ड चला रहे राज सिंह डूंगरपुर ने पूछा था, मियां कप्तान बनोगे.
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1989 के उस दौरे में संजय मांजरेकर की फॉर्म पीक पर थी.

इस सीरीज में संजय मांजरेकर ने डबल सेंचुरी मारी थी. इसी सीरीज में वकार यूनिस और वसीम अकरम का बुलबुला भारतीय बैटिंग के सामने फूटा था. बाकी तो पूरी दुनिया में उनका डंका बज रहा था. हालांकि ये दुर्भाग्य है कि दोनों देशों के हालात के चलते ये आखिरी दौरा साबित हुआ. इसके बाद अगला दौरा 15 साल बाद 2004 में हुआ था. इसके चलते दुनिया कभी वसीम अकरम-वकार यूनिस वर्सेस सचिन तेंदुलकर देख ही नहीं पाई. तब जब दोनों अपने पीक पर थे.
उस सीरीज में सचिन तेंडुलकर के अलावा ये चेहरे टीम में थे.
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खैर. अब अपनी हेडिंग पर लौटते हैं. कराची में मैच हो रहा था. उन दिनों कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था. पाकिस्तानी मैच के दौरान भी कश्मीर के समर्थन में नारे लगा रहे थे. ये व्यवहार भारतीय टीम के एयरपोर्ट उतरते ही शुरू हो गया था. यहां तक तो सब काबिल ए बर्दाश्त था. हद तो तब हो गई, जब भारतीय टीम की फील्डिंग के दौरान एक दर्शक मैदान में घुस आया. उसने के श्रीकांत के पास जाकर बहस की. कुछ ही देर में हाथापाई शुरू हो गई. अंपायर और पाकिस्तानी खिलाड़ी देखते रहे. कुछ ही सेकंड बाद भारतीय टीम उस दर्शक के इर्द गिर्द जुटने लगी. कोई छुड़ाने में लगा था, तो कोई हाथ साफ करने में. सबसे रोचक दृश्य विकेट कीपर किरण मोरे पैदा कर रहे थे. वह उस बदतमीज गुंडे दर्शक को लतियाना चाहते थे. मगर उन्होंने कीपर वाले पैड बांध रखे थे. इसलिए वह जोर से लात फटकारकर मार नहीं पा रहे थे.
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के श्रीकांत के हाथों टीम की कमान थी.

कुछ देर बाद सिक्योरिटी वाले आए और उस दर्शक को ले गए. संजय मांजरेकर लिखते हैं कि ये सब मैदान में हुआ और मैदान में ही खत्म हो गया. अगले दिन मीडिया में इसका हल्ला नहीं मचा. सोचिए आज की तारीख में ये होता. टीवी पर कितना तमाशा होता. दौरा तो फौरन कैंसल हो जाता. लेकिन तब क्रिकेट मैदान के अंदर दोस्ती का भाव था. पाकिस्तान के खिलाड़ी लड़ते तो बहुत थे, मगर इंडिया से नहीं, आपस में ही. संजय मांजरेकर कहते हैं कि पाकिस्तानी टीम का हर दूसरा व्यक्ति गाली बक रहा होता था. लेकिन उनके निशाने पर उनके ही टीममेट्स होते थे. उनकी आपस में बिलकुल भी नहीं बनती थी. ये तो इमरान खान थे, जिनके रुतबे और खौफ के चलते सब एक छतरी तले रहते थे.
मोरे ने मियांदाद से पूछा, कौन सा गाना
स्लेजिंग (यानी कि छींटाकशी और गाली गलौज) क्रिकेट का जरूरी हिस्सा बन गए हैं. संजय मांजरेकर के मुताबिक सिर्फ वेस्टइंडीज की टीम ऐसी थी, जो ये हरकत नहीं करती थी. उनकी तो चुप्पी सामने वालों को परेशान कर देती थी. शायद उन्हें पता था कि वे बेस्ट हैं और उन्हें इन हरकतों की जरूरत नहीं. ऑस्ट्रेलिया के लोग हमेशा से ही मैदान में बदतमीज थे. दुनिया की बाकी टीमों ने, खासकर भारतीय उपमहाद्वीप की टीमों ने बहुत बाद में उन्हें उनकी ही जबान में जवाब देना सीखा. भारत-पाकिस्तान के बीच स्लेजिंग का अलग ही लेवल था. दोनों ही टीमों की जबान एक. दोनों ही टीमों में पंजाबी खिलाड़ियों की भरमार. और दोनों ही टीमों में गरम खून वाले खिलाड़ी. ऐसी ही दुश्मनी थी भारतीय विकेट कीपर किरण मोरे और पाकिस्तानी बैट्समेन जावेद मियांदाद के बीच. भारत के इस दौरे का एक मैच लाहौर में था. जावेद का होम ग्राउंड. और उनका 100वां टेस्ट मैच. उन्होंने अपने रसूख का इस्तेमाल किया. ग्राउंड्समैन को बोलकर सपाट पिच बनाई. बेजान पिच इसलिए ताकि जावेद इस मैच में शतक मार सकें.
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किरण मोरे और जावेद मियांदाद के बीच ये प्रकरण काफी चर्चित हुआ.

किरण मोरे को ये बात पता चल गई. पुराना हिसाब भी था. उन्होंने तय कर लिया कि आते ही जावेद का ध्यान भंग करना है. जावेद भी तैयार होकर आए थे. उन्होंने ध्यान न देने का फैसला न किया. वह एक गाना गाते हुए पिच पर पहुंचे. किरण मोरे भी ढीठ. उन्होंने पूछ ही लिया. कौन सा गाना गा रहे हो मियां. जावेद भी वैसे ही. गार्ड लेना छोड़ा और कविता की तरह गाना पढ़कर सुनाने लगे. फिर दोनों हंस दिए. क्रिकेट की दुश्मनी ऐसी ही थी. जबानी. और इतनी ही होनी भी चाहिए.
और हां, इस मैच में जावेद ने सेंचुरी मारी. हालांकि उनके इस लोभ के चक्कर में पाकिस्तान का नुकसान हुआ. एक और ड्रॉ टेस्ट. जबकि पिच तेज होती तो शायद उन्हें फायदा मिलता. और रही बात जावेद और मोरे की तो इसका चरम दिखा 1992 के वर्ल्ड कप में. किरण मोरे की अपील से तंग आकर जावेद मियांदाद जोर जोर से पिच पर उछलने लगे.
जावेद मियांदाद ने वर्ल्ड कप का आखिरी मैच भी भारत के खिलाफ ही खेला. 1996 में. बेंगलुरु में. पाकिस्तानी टीम ये मैच हारी. उनके सब लोग सदम में. मगर जावेद मियांदाद भारतीय ड्रेसिंग रूम में आकर जश्न में शरीक हो रहे थे.
ऐसा ही है भारत पाकिस्तान के क्रिकेटरों का रिश्ता. कभी नीम नीम, कभी शहद शहद. यहां शोएब अख्तर कमेंट्री के चलते संजय मांजरेकर के अच्छे दोस्त बन जाते हैं. गंभीर संजय मांजरेकर के. और उन्हें कभी भी दो शब्द का मैसेज भेज सकते हैं. शब्द जिन्हें पढ़कर संजय को समझ नहीं आता क्या कहें. मैसेज बस इतना होता है. - हाय बेबी.


क्रिकेट वीडियो देखिए:

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